अकबर की धार्मिक नीति

अकबर की धार्मिक नीति

मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने किसी व्यवस्थित या योजनाबद्ध धार्मिक नीति की शुरुआत नहीं की थी। निजी तौर पर बाबर एक मजहबी इंसान था और उसका अल्लाह में अटूट भरोसा था। परंतु एक शासक के रूप में उसकी क्या नीति थी यह स्पष्ट नहीं है। खानवा और चंदेरी के युद्धों में उसने धर्म का राजनीतिक उपयोग अवश्य किया था। हुमायूं में आमतौर पर कोई धार्मिक कट्टरता दिखाई नहीं देती और ना ही वह धार्मिक दृष्टि से असहिष्णु था। शेरशाह भी धार्मिक दृष्टि से एक सहिष्णु शासक था और गैर मुस्लिमों के प्रति उसका व्यवहार अच्छा था।

अकबर के सिंहासन पर बैठते ही मुगलों की धार्मिक नीति में एक नए युग का आरंभ होता है। वह बहुत ही उदार तथा व्यापक दृष्टिकोण वाला शासक था। व्यक्तिगत रूप से वह अपने धर्म का पक्का अनुयाई था परंतु उसमें धार्मिक संकीर्णता नहीं थी। अकबर ने इस बात को भलीभांति समझ लिया कि बहुसंख्यक हिंदुओं की सद्भावना और सहयोग के बिना साम्राज्य में स्थायित्व, शांति और स्थिरता कायम नहीं रह सकती। अकबर ने जिस धार्मिक नीति का अनुसरण किया उसे कुल मिलाकर ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति कहा जा सकता है।

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अकबर की धार्मिक नीति को प्रभावित करने वाले तत्व

अकबर की धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति को निर्मित करने में अनेक तथ्यों और परिस्थितियों ने योगदान दिया।

  1. अकबर के पितामह बाबर और विशेषकर उसके पिता हुमायूं ने धार्मिक कट्टरता या असहिष्णुता का कोई माहौल नहीं बनाया था।
  2. अकबर की माता हमीदा बानो बेगम तथा उसका संरक्षक बैरम खां शिया थे। अकबर का प्रमुख शिक्षक अब्दुल लतीफ धार्मिक दृष्टि से बहुत ही उदार व्यक्ति था। इस प्रकार अकबर को अपने माता-पिता, संरक्षक और गुरु से उदारता की सीख मिली।
  3. भारत और यूरोप में 16वीं सदी धर्म सुधार तथा सामाजिक-धार्मिक आंदोलनों का युग था।
  4. अकबर की स्वाभाविक उदारता, जिज्ञासु प्रवृत्ति और मानवीयता ने भी उसकी धार्मिक नीति को अवश्य प्रभावित किया।

अकबर की धार्मिक नीति का विकास एवं स्वरूप

अकबर की धार्मिक नीति के निर्माण में योग देने वाले उक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों के अलावा अपने शासन के समय-समय के अनुभवों के साथ भी अकबर की धार्मिक नीति का विकास और स्वरूप निश्चित होता रहा।

  1. हिंदू राजकुमारियों से विवाह :- 1562 ईसवी में अजमेर से लौटते हुए अकबर का विवाह आमेर (जयपुर) के राजा भारमल की पुत्री से हुआ। इसके पहले भी सल्तनत काल में कुछ मुस्लिम सुल्तानों या सामंतों ने हिंदू कन्याओं से विवाह किए थे लेकिन तब ऐसा करने पर उन्हें मजबूर किया गया था; किंतु अकबर का यह वैवाहिक संबंध दोनों पक्षों की राजी-खुशी से संपन्न हुआ था। इस वजह से राजपूतों और अन्य हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता और मैत्री की नई नीति का आरंभ हुआ। 1570-71 में जैसलमेर और बीकानेर के राजपरिवारों की कन्याओं का विवाह भी अकबर के साथ हुआ। आगे चलकर जहांगीर का विवाह भी भारमल की पोती के साथ हुआ। मुगल हरम में विवाह करने वाली इन हिंदू राजकुमारियों को अपने धर्म का पालन तथा पूजा-पाठ की पूरी आजादी थी। अकबर के धार्मिक दृष्टिकोण पर इन वैवाहिक संबंधों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था।
  2. जजिया और तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति :- अपने शासन के आरंभिक वर्षों में अकबर ने सामाजिक-धार्मिक सहिष्णुता का परिचय देते हुए 1562 ईसवी में दास प्रथा का अंत कर दिया और 1563 में हिंदुओं पर से तीर्थयात्री कब समाप्त कर दिए। 1564 में हिंदुओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिक सिद्ध करने वाले जजिया कर को अकबर ने हटा दिया। दिल्ली और आगरा के बादशाहों में अकबर पहला शासक था जिसने 350 वर्षों से चले आ रहे घृणित जजिया कर को बंद किया था।
  3. उच्च पदों पर हिंदुओं की नियुक्ति :- मोहम्मद तुगलक पहला ऐसा शासक था जिसके काल में उच्च सैनिक और प्रशासनिक पदों पर हिंदुओं की नियुक्ति की जानकारी मिलती है। किंतु इनकी संख्या ज्यादा नहीं थी। अकबर ने गैर मुसलमानों विशेषकर हिंदुओं को मुसलमानों के समान ही सेना और प्रशासन में उच्च पदों पर नियुक्त किया तथा उन पर भरोसा किया। राजा टोडरमल को उच्च पद देकर भूमि विभाग का सारा काम सौंपा गया। बीरबल की गणना अकबर के प्रसिद्ध नवरत्नों में होती थी। राजा भगवानदास तथा मानसिंह को पांच हजारी जैसे उच्च मनसब दिए गए थे। 1594 में 12 वित्त सचिवों की नियुक्ति की गई जिनमें से आठ हिंदू थे। साम्राज्य में ऐसा कोई सरकारी पद नहीं था जो हिंदुओं की पहुंच से बाहर हो।
  4. धार्मिक स्वतंत्रता :- अकबर ने धर्म को राजनीति से अलग रखा। उसके शासनकाल में सभी धर्म के लोगों को अपने धर्म का पालन, पूजा-पाठ तथा धर्मस्थल बनाने की पूरी स्वतंत्रता थी। अकबर ने नए हिंदू मंदिरों को बनवाने की अनुमति दे दी। फलस्वरूप अनेक नये हिंदू मंदिरों का निर्माण संभव हो सका। ईसाइयों को भी आगरा, लाहौर और कड़ा आदि स्थानों पर गिरजाघर बनवाने की इजाजत दी गई। शियाओं को भी मजहबी आजादी प्राप्त थी।
  5. धर्म परिवर्तन पर रोक :-  अकबर ने बलात धर्म परिवर्तन पर रोक लगा दी। कुछ धर्म परिवर्तित बालकों को वापस हिंदू धर्म ग्रहण करने की आज्ञा भी बादशाह ने प्रदान की। धर्म परिवर्तन को सरकारी स्तर पर अब कोई प्रोत्साहन नहीं रहा।
  6. हिंदू धर्म ग्रंथों का अनुवाद :-  अकबर ने कुछ प्रमुख हिंदू धर्म-ग्रंथों का अनुवाद फारसी में करवाया। इनमें रामायण, महाभारत तथा अथर्व वेद विशेष उल्लेखनीय हैं। अनुवाद के साथ ही इन ग्रंथों को प्रसिद्ध चित्रकारों द्वारा चित्रित भी किया गया।
  7. हिंदू प्रथाओं तथा त्योहारों को अपनाना :- अकबर ने अपने दरबार में कई  हिंदू तथा पारसी प्रथाओं को अपनाया। उसने झरोखा दर्शन तथा तुलादान जैसी हिंदू प्रथाओं को दरबार में शुरू किया। होली, दिवाली और वसंत के त्यौहार भी दरबार में मनाए जाते थे। अकबर ने खुद गाय का मांस खाना बंद कर दिया था। सूर्य की तरफ मुंह करके बैठना अग्नि का हमेशा प्रज्वलित रहना तथा पशु-पक्षियों की हत्या पर प्रतिबंध आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो अकबर की सहिष्णुता तथा उसके समन्वित व्यक्तित्व की प्रतीक हैं।
  8. इबादत खाना-सर्व धर्म संसद :- अकबर बड़ी गंभीर और जिज्ञासु प्रवृत्ति का व्यक्ति था। अबुल फजल तथा बदायूनी के ग्रंथों से इस बात की पुष्टि होती है कि अकबर का मन अक्सर विभिन्न धर्म के सिद्धांतों के विश्लेषण तथा सत्य की खोज में लगा रहता था। सत्य की खोज के प्रयास में ही उसने 1575 में फतेहपुर सीकरी में एक इबादत खाना की स्थापना की। इबादत खाना में इस्लाम धर्म के सिद्धांतों पर परिचर्चा एवं व्याख्यानों का आयोजन किया जाता था। अकबर स्वयं इन परिचर्चाओं तथा विश्लेषणों को सुनता था। शेख अब्दुल्ल नबी और अब्दुल्ला जैसे प्रसिद्ध विद्वानों ने इन परिचर्चाओं में हिस्सा लिया। अकबर ने यह महसूस किया कि इस्लाम के सिद्धांतों और व्याख्या पर मुस्लिम विद्वानों और धर्माधिकारियों में न केवल मतभेद है अपितु उनमें वह सहनशीलता और धैर्य भी नहीं है जिसका होना उनमें आवश्यक था। छोटी-छोटी बातों पर ये विद्वान शालीनता की सीमाएं लांग कर एक दूसरे को तुच्छ सिद्ध करने से नहीं चूकते थे। आखिर अकबर इस नतीजे पर पहुंचा कि सत्य उन लोगों की तू-तू मैं-मैं से कहीं बाहर है।

अकबर ने सभी धर्म के मर्म को समझने तथा अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए हिंदू, जैन, पारसी और इसाई धर्म के विद्वानों से व्यक्तिगत मुलाकात की। विभिन्न धर्मों के विद्वानों से बातचीत के बाद अकबर को यह अहसास हो गया कि सत्य सभी धर्मों में है। 1578 में उसने इबादत खाना के दरवाजे सभी धर्मों के लिए खोल दिए। प्रो. राय चौधरी के शब्दों में “इबादत खाना अब सर्व धर्म संसद बन गया।” हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व पुरुषोत्तम और देवी जैसे विद्वानों ने किया तो हीर विजय, शांति चंद्र एवं जिनचंद्र सूरी आदि ने जैन धर्म के बारे में व्याख्यान दिए। प्रसिद्ध पारसी विद्वान दस्तूर जी मेहर जी ने भी इबादत खाना की परिचर्चा में हिस्सा लिया।

  1. मजहर जारी करना (1579) :- इबादत खाना में इस्लाम के सिद्धांतों पर होने वाले विवादों में अकबर ने अक्सर पाया कि मुस्लिम धर्मगुरु एक दूसरे पर क्रुद्ध हो जाते थे तथा कभी-कभी बड़ी संकीर्णता का परिचय देते थे ऐसे में उसने धार्मिक विवादों में अंतिम निर्णय देने का अधिकार स्वयं के पास रखने का निश्चय किया, क्योंकि इसे मतभेदों को कम किया जा सकता था। इस कार्य में शेख मुबारक तथा उसके दो पुत्रों अबुल फजल और फैजी ने बहुत सहयोग दिया। जून 1579 को अकबर ने फतेहपुर सीकरी की मस्जिद में स्वयं खुतबा को पढ़ा। खुतबा के अंतिम शब्द थे ‘अल्ला-हू-अकबर’ अर्थात् अल्लाह ही सबसे बड़ा और महान है। इसके कुछ दिन बाद एक मजहर (प्रपत्र) जारी किया गया जिसके अनुसार भारत में इस्लाम संबंधित विवादों में निर्णय देने का अधिकार अकबर को दिया गया। इस पत्र को शेख मुबारक ने तैयार किया था तथा इस पर अब्दुल नबी मखदूम उल मुल्क जैसे कई इस्लामी विद्वानों के हस्ताक्षर थे।

स्मिथ तथा वुल्जले जैसे कुछ इतिहासकारों ने यह आरोप लगाया कि इस खुदबा और मजहर द्वारा अकबर पोप या पैगंबर बनना चाहता था। यह आरोप इसलिए गलत है कि प्रपत्र में स्पष्ट था कि अल्लाह सबसे बड़ा है और अकबर का अंतिम निर्णय कुरान के सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य धार्मिक विवादों को कम करना, दकियानूसी विचारों तथा कट्टरपन पर रोक लगाना और उलेमा के महत्व को कम करना था। अकबर को केवल इस्लामी कानून की व्याख्या का अधिकार मिला था, कानून बनाने का नहीं।

दीन ए इलाही की स्थापना (1582)

अकबर की धार्मिक नीति और विचारों के विकास का चरमोत्कर्ष था 1582 ईसवी में ‘दीन ए इलाही’ या ‘तौहिद-ए-इलाही’ की स्थापना। मार्च 1582 में अकबर ने विभिन्न धर्मों के आचार्यों, उलेमाओं तथा अमीरों की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा- ‘एक सम्राट द्वारा शासित साम्राज्य के सदस्यों का आपस में बंटा रहना और आपस में मतभेद रखना गलत बात है। हमें उन सब को एक करना चाहिए। लेकिन इस प्रकार से कि वे एक और अनेक दोनों हो जिससे कि यह लाभ हो कि जो अच्छाई एक धर्म में हो वह नहीं छूटे और अन्य धर्म में जो अच्छाई हो वह भी प्राप्त हो जाए। इस प्रकार ईश्वर का सम्मान होगा, लोगों को शांति मिलेगी और साम्राज्य की सुरक्षा होगी।’ यह अनेक को एक करने वाला तथा विभिन्न धर्मों की अच्छाइयों से युक्त मत या संप्रदाय था दीन ए इलाही।

दीन ए इलाही कोई नया धर्म नहीं था। यह एक सामाजिक-धार्मिक भातृ संप्रदाय था जिसका मुख्य उद्देश्य विभिन्न वर्गों और धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाना था। स्वयं सम्राट अकबर दीन ए इलाही का प्रमुख गुरु बना और अबुल फजल इसका प्रधान पुरोहित बनाया गया। जो भी व्यक्ति संप्रदाय में शामिल होना चाहते थे उन्हें रविवार के दिन अकबर द्वारा दीक्षा दी जाती थी। अकबर रविवार को इसलिए पवित्र दिवस मानता था क्योंकि उस दिन सूर्य सबसे अधिक तेजी पर रहता है।

सदस्यों की दीक्षा

जो व्यक्ति दीन ए इलाही का सदस्य बनना चाहता था वह अकबर की कदमों पर अपनी पगड़ी रख कर नतमस्तक होकर इस संप्रदाय में शामिल होने के लिए प्रार्थना करता था। अकबर उसकी पगड़ी वापस करके सर पर रखता था और दीक्षा के रूप में एक शिस्त (अंगूठी जैसी चीज) प्रदान करता था। इस शिस्त पर अल्लाह हू अकबर खुदा रहता था।

सदस्य संख्या

दीन ए इलाही के सदस्यों की संख्या बहुत कम रही। प्रतिष्ठित व्यक्तियों की संख्या 20 से भी कम थी। इनमें भी हिंदू सदस्य केवल बीरबल था। राजा भगवानदास, मानसिंह, टोडरमल आदि ने इसकी सदस्यता ग्रहण नहीं की। उसके साधारण सदस्यों की संख्या भी कुछ हजार तक सीमित रही। अकबर ने दीन ए इलाही का सदस्य बनने के लिए कभी किसी पर दबाव नहीं डाला। अकबर की मृत्यु के साथ ही दीन ए इलाही का अस्तित्व समाप्त हो गया।

दीन इलाही के सिद्धांत एवं व्यवहार

दिन ए इलाही नामक पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक प्रोफेसर राय चौधरी के अनुसार इस संप्रदाय के सदस्यों को जिन सिद्धांतों और गुणों का पालन करना पड़ता था वह इस प्रकार हैं:-

  1. एकेश्वरवाद में विश्वास,
  2. श्रेष्ठ और अद्भुत कार्य करने की इच्छा रखना,
  3. अपने बंधुओं के साथ अच्छा व्यवहार तथा उनकी इच्छा को अपनी इच्छा के ऊपर रखना,
  4. सब के साथ विनम्रता के साथ बात करना और मधुर भाषा का प्रयोग करना,
  5. अपने किए हुए कार्यों पर विचार और मनन तथा भक्ति एवं ज्ञान की अभिवृद्धि करना,
  6. जीवन में उदारता और दानशीलता का अनुशीलन करना।

इन सिद्धांतों और आदर्शों के साथ ही दीन-ए-इलाही के कुछ नियम तथा व्यवहार भी निर्धारित थे। इनमें प्रमुख हैं:

  1. दीन ए इलाही के सदस्य आपस में मिलने पर अभिवादन के लिए ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘जले-जलाले-हू’ कहते थे।
  2. मरने के बाद दिए जाने वाले भोज को अपने जीवन काल में ही देते थे ।
  3. यथासंभव मांस का प्रयोग नहीं करते थे।
  4. कम उम्र की कन्याओं तथा विधावाओं के साथ सहवास न करना।
  5. धन, सम्मान, जीवन और धर्म बादशाह को अर्पित कर देना।

दीन ए इलाही की समीक्षा

किसी भी लिहाज से दीन ए इलाही कोई नया धर्म नहीं था और न ही उसे धर्म कहना चाहिए क्योंकि इसका न कोई धर्मग्रंथ था, न ही निश्चित प्रार्थना, न कोई मंदिर या उपासना का निश्चित स्थान और न ही कोई पुरोहित-पुजारी वर्ग था।

समकालीन इतिहासकारों में बदायूंनी (मुंतखब उत तारीख) ने दीन ए इलाही और अकबर के धार्मिक विचारों की आलोचना करते हुए इस्लाम के खिलाफ बताया है। बार्तोली इसे अकबर की धूर्तता कहता है। तो स्मिथ  इसे अकबर की मूर्खता का उदाहरण बताता है। यदि दीन ए इलाही की निष्पक्ष विवेचना की जाए तो हम पाएंगे कि यह प्रयास अकबर की मूर्खता का नहीं अपितु उसके समन्वित व्यक्तित्व तथा राष्ट्रीय आदर्शवाद का प्रतीक है। यह उसकी राष्ट्रीय चेतना तथा हिंदू-मुस्लिम-एकता की कोशिशों का सफल प्रयास था।

दीन ए इलाही के सिद्धांतों को पढ़ने से पता चलता है कि इसके माध्यम से व्यक्तिगत जीवन की पवित्रता और जीवन व्यवहार के प्रति पवित्र दृष्टिकोण पर काफी जोर दिया गया था। एकेश्वरवाद और सुलहकुल सब के साथ शांति और दोस्ती इसके मूल मंत्र थे।

दीन ए इलाही के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्न उसकी सफलता या असफलता का नहीं है। महत्वपूर्ण बात है इस प्रयास के पीछे निहित विचार या भावना। यह विचार और भावना अकबर की धार्मिक नीति का निचोड़ था। उसने धार्मिक कट्टरवाद की अपेक्षा राष्ट्र और प्रजा को अधिक महत्व दिया। क्या यह कम महत्वपूर्ण बात है कि दीन ए इलाही को शक्तिशाली अकबर ने किसी भी व्यक्ति या समुदाय पर जबरदस्ती थोपने की कोशिश नहीं की।

अकबर की धार्मिक नीति की सफलता इसमें थी कि उसने हिन्दू और मुसलमानों को नज़दीक लाने में कामयाब हुआ। यदि वह हिंदुस्तान को एक राष्ट्रीय राज्य नहीं बना पाया तो इस कारण से कि उस समय की परिस्थितियों में यह संभव ही नहीं था; लेकिन वह एक राष्ट्रीय सम्राट के रूप में अवश्य दिवंगत हुआ।

 

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