अद्वैत दर्शन

अद्वैत दर्शन

अद्वैत दर्शन के प्रतिपादक शंकराचार्य हैं। उनके अनुसार “ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:।” ब्रह्म (निर्गुण ईश्वर) ही एक मात्र सत्य है और आत्मा ब्रह्म का ही रूप है। आत्मा और ब्रह्म में द्वैत नहीं है।

अद्वैत दर्शन में ब्रह्म-विचार

अद्वैत वेदांत के अनुसार केवल ब्रह्म ही परमतत्व है। वह ही परमार्थ सत है। उससे अलग संसार में कोई वस्तु नहीं है। शंकराचार्य इसके समर्थन में अनेक उपनिषद वाक्यों का उल्लेख करते हैं। “एकमेवाद्वितीयम्”, “सर्वं खलु इदं ब्रह्म” आदि। ब्रह्म स्वयं प्रकाश है। निर्गुण और निष्क्रिय है। दिव्य और अनंत है। वह सत् चित् आनन्द है। प्रमाणों द्वारा ज्ञेय नहीं है।

अर्थात् सामान्य तरीके से उसे ज्ञान का विषय नहीं बनाया जा सकता। लेकिन वह परम सत है। एकमात्र ऐसी सत्ता है जो त्रिकाल-अबाधित है। भूत, भविष्य और वर्तमान में कभी उसका निषेध नहीं हो सकता। सम्पूर्ण विश्व परिवर्तनशील है। लेकिन ब्रह्म सभी परिवर्तनों और भेदों से रहित है। वह निर्गुण है। निरपेक्ष है। निरुपाधि है। निर्विशेष है तथा मन और इन्द्रियों की पहुंच से परे है। वह आत्मा ही है। उसे अपरोक्षानुभूति से, स्वयं ब्रह्म होकर जाना जा सकता है।

सगुण और निर्गुण ब्रह्म

अद्वैत वेदांत में ब्रह्म के दो स्वरूप माने गये हैं; नामरूप आदि उपाधियों से युक्त सगुण ब्रह्म और समस्त उपाधियों से रहित निर्गुण ब्रह्म। तात्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। दोनों में भेद नहीं है। सगुण ब्रह्म माया की उपाधि से संयुक्त होने के कारण सोपाधिक, सविशेष ब्रहम या ईश्वर कहलाता है। निर्गुण, निर्विशेष और निरुपाधिक ब्रह पर ब्रह्म कहलाता है। सगुण ईश्वर अपर ब्रह्म है।

ईश्वर ही जगत का पालक, सृष्टिकर्ता एवं संहारकर्ता है। वह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण तथा धर्माध्यक्ष है। वह जगदीश्वर है। माया ईश्वर की स्वाभाविक सर्जनात्मक शक्ति है जिसके द्वारा वह विविधतापूर्ण जगत की सर्जना करता है। ईश्वर अनंत है, पूर्ण है, नित्यतृप्त है। सृष्टि की रचना में उसका कोई प्रयोजन नहीं है। केवल लीला के लिए वह जगत् की सृष्टि करता है।

ब्रह्म ही जगत का निमित्त तथा उपादान कारण है क्यों कि ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। पर व्यवहारिक दृष्टि से माया उपादान कारण और ईश्वर निमित्त कारण है। जैसे मकड़ी स्वयं खुद से जाला बुनती है, वैसे ही ब्रह्म से सृष्टि उत्पन्न होती है।

अद्वैत दर्शन में आत्मा

दर्शन के आत्मा या ब्रह्म संबंधी विचार उपनिषदों पर आधारित है। आत्मा और ब्रह्म में अभेद है। इसे ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूं), ‘तत्त्वमसि’ (वह तुम ही हो, जीव ही ब्रह्म है), ‘अयमात्मा ब्रह्म’ आदि शब्दों में व्यक्त किया गया है।

आत्मा ज्ञान का विषय नहीं है। वह स्वयं ज्ञाता है। वह द्रष्टा है। चेतना आत्मा का गुण नहीं है। वास्तव में आत्मा निर्गुण (ब्रह्म ही) है। चेतना आत्मा का स्वरूप है। आत्मा विभु है। अद्वैत है। निरवयव है। देश और काल से परे है। परमार्थ और परम सत है। आत्मा की सत्ता का निषेध नहीं किया जा सकता क्योंकि जो निषेध कर रहा है वही आत्मा है। आत्मा और ब्रह्म एक ही है लेकिन अविद्या जनित शरीर के कारण आत्मा सीमित जीवात्मा की तरह प्रतीत होता है।

आत्मा ज्ञान स्वरूप भी है और ज्ञाता भी है। सर्वव्यापी ब्रह्म अविद्या या माया के कारण नाना जीवों और जगत के रूप में प्रतीत होता है।

अज्ञान के कारण रस्सी में सर्प का भ्रम होता है और रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प तिरोहित हो जाता है। उसी प्रकार माया जो कि ब्रह्म की ही शक्ति है के प्रभाव से ब्रह्म का वास्तविक निर्गुण रूप छिप जाता है और जगत और जीव सत्य प्रतीत होने लगते हैं।

अज्ञानता से उत्पन्न यही द्वैत-भावना बंधन और दुखों का कारण है। जैसे ही ब्रह्म के वास्तविक रूप को जान लेते हैं समस्त भेद मिट जाता है। आत्मा और परमात्मा का भेद तिरोहित हो जाता है।

समस्त चराचर ब्रह्म ही है यह जान जाने के बाद जानने के लिए कुछ नहीं बचता। यह ज्ञान की चरम स्थिति है क्योंकि ब्रह्म या आत्मा को ब्रह्म होकर ही जान सकते हैं। इस प्रकार आत्म ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अद्वैत दर्शन में सत्ता के स्तर

अद्वैत दर्शन के अनुसार सत्ता के निम्नलिखित स्तर हैं:

  1. प्रातिभासिक सत्ता :- स्वप्न और भ्रम।
  2. व्यवहारिक सत्ता :- दृश्य जगत्।
  3. पारमार्थिक सत्ता :- ब्रह्म।

अद्वैत दर्शन के सुप्रसिद्ध सूत्र ‘ब्रह्म सत्यं जगन्नमिथ्या’ से ऐसा प्रतीत होता है कि शंकराचार्य जगत को पूरी तरह से असत् मानकर उसे माया कहते हैं। अद्वैत दर्शन/अद्वैत वेदांत में दृश्य जगत का वर्णन कभी-कभी ठीक ऐसी ही भाषा में किया गया है जो यह गलतफहमी पैदा करती है कि जगत् वस्तुतः पूरी तरह असत्य है।

उदाहरण के लिए संसार को मरीचिका, रज्जुसर्प (रस्सी में सांप का भ्रम), शुक्ति-रजत (सीपी में चांदी का भ्रम), स्वप्न, माया-निर्मित आदि कहा गया है। माया कह कर उसे मिथ्या बताया ही गया है। लेकिन वस्तुतः हमें ध्यान रखना है कि यह सब सिर्फ रूपक हैं।

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शंकराचार्य ने सत् और असत् इन दोनों शब्दों को सापेक्ष न मानकर निरपेक्ष अर्थ में प्रयोग किया है। सत् वह है जो सर्वदा वर्तमान है, जो सदैव सत्य है। इसकी सत्यता स्वयं प्रकाश है। जिसे सत् बताने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो कभी खंडित नहीं होता। इस अर्थ में केवल ब्रह्म ही सत्य है।

इसी तरह असत् वह है जिसमें सत् का कोई भी लक्षण नहीं होते। निरपेक्ष सत् का उदाहरण आत्मन् या ब्रह्मन् है तो निरपेक्ष असत् का उदाहरण ‘बंध्यापुत्र’ को कहा जा सकता है।

हमारा दृश्य जगत् इस निरपेक्ष अर्थ में न सत् है न असत्। अर्थात वह ब्रह्म की तरह निरपेक्ष सत् भी नहीं है और ना ही बंध्या-पुत्र की तरह पूरी तरह असत् है। बेशक निरपेक्ष रूप से, पारमार्थिक दृष्टि से यह सत् नहीं है लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से यह असत् भी नहीं है।

जिस अर्थ में उसे सत् से वंचित किया गया है वह सर्वकालिक सत् है। उसकी अनित्यता को देखते हुए ही इसे में मिथ्या या माया कहा गया है। कोई यह नहीं कह सकता कि जगत् की वस्तुएं अनित्य नहीं है या कि यह दृश्य जगत् सार्वकालिक सत्य है।

फिर भी हर कोई जगत् को सत्य मानता है; ऐसा इसलिए कि अभी किसी को निरपेक्ष सत्य का ज्ञान नहीं है, हमें ब्रह्मानुभूति नहीं हुई है। जगत् की सत्यता ब्रह्मानुभूति हो जाने पर ही खंडित हो सकती है उससे पहले नहीं।

यह ठीक ऐसे ही है जैसे जब तक हम स्वप्न से जागते नहीं स्वप्न हमें सत्य लगता है। हम केवल जाग जाने पर ही इस निष्कर्ष पर आते हैं कि हम जो सोते समय अनुभव कर रहे थे वह सत्य नहीं स्वप्न था।

जिस तरह जागृत अवस्था स्वप्न संसार को खंडित करती है उसी तरह केवल ब्रह्मानुभूति ही दृश्य जगत् को खंडित कर सकती है। जब तक यह खंडित नहीं होता सत्य बना रहता है। अतः दृश्य जगत् भी सभी व्यावहारिक प्रयोजनों के लिए सत्य है। जब तक हम जगत् में हैं हम दृश्यमान जगत् को असत्य नहीं मान सकते। यह व्यवहारिक सत्ता है। यह एक ऐसी कार्यप्रणाली है जो नितांत आवश्यक है, भले ही उसका अंततः बचाव न किया जा सके।

सच तो यह है कि शंकराचार्य ने अद्वैत दर्शन में ना केवल जगत् को एक विशेष प्रकार की व्यवहारिक सत्ता से संपन्न किया है बल्कि उन्होंने तो भ्रम को भी सत्ता से पूरी तरह वंचित नहीं किया है। जब हम स्वप्न में कोई दृश्य देख रहे होते हैं तो वह दृश्य भी जब तक स्वप्न चलता है, बिल्कुल सत्य ही लगता है। स्वप्न में स्वप्न का जल हमारी स्वप्न की प्यास बुझाता है।

यही बात जाग्रत अवस्था में हमारे भ्रमों के बारे में भी सही है। जब हम गलती से भ्रमवश रस्सी को सांप समझ बैठते हैं तो हम उससे डरते भी हैं। जब तक सांप समझे बैठे रहते हैं, हम डरते रहते हैं लेकिन जैसे ही यह भ्रम खंडित होता है और वास्तविक ज्ञान का उदय होता है रस्सी अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाती है। वह सांप नहीं रहती। सांप भ्रम साबित हो जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अद्वैत दर्शन में, न केवल दृश्य जगत् को जिसे व्यवहारिक सत्ता कहा गया है शंकराचार्य पूरी तरह असत्य नहीं मानते बल्कि स्वप्न जगत् और जाग्रत अवस्था के भ्रम आदि को भी वे तब तक सत्य मानते हैं जब तक कि वे उच्चतर अनुभव से खंडित नहीं होते। अद्वैत में इन्हें प्रातिभासिक सत्ता कहा गया है। यह प्रातिभासिक सत्ता स्पष्ट ही उसी स्तर की नहीं है जिस स्तर की व्यवहारिक सत्ता है लेकिन यह पूरी तरह असत् भी नहीं है।

अतः अद्वैत दर्शन के अनुसार अब यदि हम असत् से सत् की ओर चलते हैं तो सत्ता का एक स्तरीय वर्णन कुछ इस प्रकार किया जा सकता है:

  • वह जो निश्चित रूप से असत् है जैसे बंद्यापुत्र इसे असत् ठहराने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। यह तुच्छ सत्ता है।
  • इससे ज्यादा सत् भ्रम आदि की प्रातिभासिक सत्ता है।
  • उससे ज्यादा सत्य है यह नाना नामरूप वाला जगत् अर्थात् व्यवहारिक सत्ता।
  • परंतु सबसे ज्यादा सत्य है पारमार्थिक सत्ता अर्थात त्रिकालाबाधित निरपेक्ष ब्रह्मन्।

अद्वैत दर्शन में माया की अवधारणा

शंकराचार्य के अनुसार एक मात्र ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या है तो फिर हमें एक ब्रह्म की जगह है अनेकता से युक्त यह जगत क्यों सत्य प्रतीत होता है? शंकराचार्य इसका उत्तर अज्ञान या अविद्या में पाते हैं। जब तक हमें ब्रह्म के अद्वैत का ज्ञान नहीं हो जाता, ब्रह्मानुभूति नहीं हो जाती तब तक हमें जगत की अनेकता वास्तविक प्रतीत होती है।

जिस दिन ब्रह्मानुभूति हो जाएगी जब ब्रह्म के वास्तविक अद्वैत रूप का ज्ञान हमें उपलब्ध हो जाएगा तब सारा अंधकार दूर हो जाएगा और ब्रह्म ही एकमात्र सत्य दिखाई देगा; जगत अपनी अनेकता के साथ स्वत: विलुप्त हो जाएगी। अज्ञान टूट ने पर जगत मिथ्या हो जाएगा। जब तक ब्रह्मानुभूति नहीं होती जगत की सत्ता तभी तक वास्तविक होती है।

शंकराचार्य ने ब्रह्म के प्रति इसी अज्ञान को माया कहा है। माया एक व्यक्तिगत अज्ञान ना होकर सार्वत्रिक अज्ञान है। हम सभी की बुद्धि पर मानो माया का पर्दा पड़ा हुआ है जो ब्रह्म के वास्तविक अद्वैत स्वरूप को छिपाता है।

केवल वे ही बिरले लोग जो ब्रह्मज्ञान या ब्रह्मानुभूति को उपलब्ध कर पाए हैं इस माया से मुक्त हो पाते हैं। वस्तुतः माया का कार्य न केवल ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को छिपाना है बल्कि उसे विकृत करना भी है।

इस प्रकार एक ओर माया से ब्रह्म के वास्तविक अद्वैत रूप पर आवरण पड़ जाता है तो दूसरी ओर उसमें जगत की अनेकता का आरोपण भी हो जाता है। इसे ही ब्रह्म का विक्षेप या विवर्त कहा गया है।

माया की इस प्रकार दो शक्तियां हैं: आवरण और विक्षेप। आवरण माया का नकारात्मक पक्ष है जो वास्तविकता को, ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप को छुपाता है। विक्षेप उसका सकारात्मक पहलू है जो ब्रह्म पर जगत की अनेकता आरोपित/अध्यारोपित करता है।

शंकर के दर्शन में माया और अविद्या ये दोनों शब्द लगभग एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। जिसे व्यक्तिगत स्तर पर अविद्या कहा गया है वही सार्विक स्तर पर माया है। ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का सार्विक अज्ञान माया है। व्यक्तिगत अज्ञान अविद्या है। अविद्या जीव सापेक्ष है, व्यक्ति को प्रभावित करती है।

ब्रह्मा् का वास्तविक ज्ञान होते ही तिरोहित हो जाती है किंतु माया जीव सापेक्ष नहीं है वरन सार्विक है वह कभी तिरोहित नहीं होती।‌ उसे ब्रह्म में निहित शक्ति कहा जा सकता है। वह ब्रह्म से अलग नहीं है। ब्रह्म है तो माया भी है। लेकिन जिस तरह अविद्या जीव को प्रभावित करती है माया ब्रह्म को प्रभावित नहीं करती बल्कि माया स्वयं पूर्णतः ब्रह्म पर निर्भर है।

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