आनुवंशिकी (Genetics) : जीवविज्ञान

आनुवंशिकी (Genetics)

आनुवंशिकी : “जीव विज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत आनुवांशिक लक्षणों के संतान में पहुंचने की रीतियों एवं आनुवंशिक समानता एवं विभिन्नताओं का अध्ययन करते हैं आनुवंशिक विज्ञान या आनुवंशिकी कहलाती है।”

जीवों में प्रजनन के द्वारा संतान उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता होती है। संतानों में कुछ लक्षण माता-पिता से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचते रहते हैं, जिन्हें आनुवंशिक लक्षण कहते हैं। वंशागत लक्षणों (Inherited Characters) का अध्ययन आनुवंशिकता (Heredity) कहलाता है।

ग्रेगर जॉन मेंडल का योगदान

आनुवंशिकी के क्षेत्र में ग्रेगर जॉन मेंडल के महत्वपूर्ण योगदान के कारण इन्हें आनुवंशिकी का पिता कहा जाता है। ये आस्ट्रिया के पादरी थे।  इन्होंने मटर के पौधों पर अनेक प्रयोग किए और उनके आधार पर कुछ निष्कर्षों को प्रतिपादित किया जिसकी रिपोर्ट 1866 में प्रकाशित की गई।
अपने प्रयोगों के आधार पर मेंडल निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुंचे:-

1. आनुवंशिक लक्षणों को पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाने वाले लक्षण को कारक कहा जो अब जीन के नाम से जाना जाता है।
2. संकर संतान में यह कारण अब परिवर्तनशील होता है, फलस्वरुप अगली पीढ़ी में वह लक्षण पूर्ववत् प्रकट होते हैं।

ग्रेगर जॉन मेंडल
ग्रेगर जॉन मेंडल, स्रोत: विकिपीडिया

मेंडल ने कुछ प्रयोगों में दो विपरीत लक्षणों को एक साथ लेकर प्रयोग किए, जैसे पीले और चिकने मटर के बीच तथा हरे और झुर्रीदार बीज। इस प्रकार जब दो लक्षणों को ध्यान में रखकर परीक्षण किया जाता है तो ऐसे क्रास को द्विसंकर क्रास (Dihybrid cross) कहते हैं।

मेंडल ने अपने प्रयासों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाला उसे मेंडल के नियम के नाम से जाना जाता है‌।  मेंडल ने तीन नियमों का प्रतिपादन किया जो निम्नलिखित हैं:-

1. प्रभाविता का नियम (लॉ आफ डोमिनेंस)

इसके अंतर्गत उन्होंने एक जोड़े के विपरीत लक्षणों को ध्यान में रखकर क्रास कराया तो पहली पीढ़ी में उपस्थित होने वाला लक्षण प्रभावी रहा। उदाहरण स्वरूप जब मटर के लाल पुष्प वाले पौधे से सफेद पुष्प वाले पौधे का क्रास कराया गया, तो पहली पीढ़ी केवल लाल पुष्प वाले पौधे ही उगे; इससे नियमानुसार लाल रंग प्रभावी एवं सफेद रंग का अप्रभावी हुआ।

2. मेंडल का पृथक्करण का नियम (लॉ आफ सेग्रीगेशन)

दो विपरीत लक्षणों को क्रास कराया गया जाता है तो एफ1 पीढ़ी में दोनों लक्षण उपस्थित होते हैं लेकिन एफ2 पीढ़ी में दोनों लक्षण पृथक हो जाते हैं।

जैसे जब मटर के लाल पुष्प वाले पौधे का सफेद पुष्प वाले पौधों से क्रास कराया जाता है तो एफ 1 पीढ़ी में केवल लाल पुष्प वाले पौधे ही उगते हैं लेकिन पुनः जब इसी पीढी के पुष्पों में स्वपरागण कराया जाता है तो एफ1 पीढ़ी के पौधे दोनों प्रकार के होते हैं। यहां लाल पुष्प वाले तथा सफेद पुष्प वाले पौधों में 3:1 अनुपात पाया जाता है।

3. स्वतंत्र पृथक्करण का सिद्धांत (लॉ आफ इंडिपेंडेंट एसोर्टमेंट)

दो विपरीत लक्षणों को ध्यान में रखकर पर-परागण कराया जिसे द्वि प्रसंकरण कहा जाता है, इसके अनुसार जब दो स्वतंत्र विपरीत लक्षणों वाले पौधों पर पर-परागण कराया जाता है तो एफ1 पीढ़ी में वे प्रभावी लक्षणों का प्रदर्शन करते हैं तथा युग्मनज के पृथक्करण का नियम लागू होता है।

लिंग गुणसूत्र (सेक्स क्रोमोसोम)

मानव जाति में पुरुषों के 46 गुणसूत्र अर्थात् 23 जोड़ियों में से केवल 22 जोड़ियों के गुणसूत्र समजात होते हैं। इन्हें ऑटोसोम्स कहा जाता है। पुरुष में 23वीं जोड़ी अर्थात् 2 गुणसूत्र असमान होते हैं। यह हेटरो-सैम्स या ऐलो-सोम्स कहलाते हैं। स्त्रियों के विपरीत पुरुषों में 23वीं जोड़ी के गुणसूत्र को XY के रूप में दर्शाते हैं। जबकि स्त्रियों में इस गुणसूत्र को XX रूप में दर्शाते हैं। स्पष्ट है कि मनुष्य में 23वीं जोड़े गुणसूत्र के कारण ही पुरूष व स्त्री का विकास होता है। अतः ये गुणसूत्र लिंग गुणसूत्र या सेक्स क्रोमोसोम कहलाते हैं।

मनुष्य में लिंग निर्धारण

पुरुष विषम-युग्मकी होते हैं। शुक्र जनन में अर्धसूत्री विभाजन के द्वारा दो प्रकार के शुक्राणु बनते हैं – X और Y इसके विपरीत स्त्रियां समयुग्मकी होती हैं अर्थात इनमें अंड जनन द्वारा एक ही प्रकार के अंडाणु बनते हैं। जिनमें प्रत्येक में एक शुक्राणु मिलता है। इस प्रकार निषेचन में यदि किसी अंडाणु से X गुणसूत्र वाला शुक्राणु मिलता है तो युग्मनज (जायगोट) में 23वीं जोड़ी के गुणसूत्र XX होंगे और इससे बनने वाली संतान लड़की होगी। इसके विपरीत यदि किसी अंडाणु से यदि Y गुणसूत्र वाला शुक्राणु मिलेगा तो जायगोट के परिवर्धन से लड़का ( XY) बनेगा। इस प्रकार पिता के द्वारा संतान का लिंग निर्धारण होता है।

अपूर्ण प्रभावी (इनकंपलीट डोमिनेंस Incomplete Dominance)

अपूर्ण प्रभावी मंडल के नियम का एक अपवाद है क्योंकि कुछ ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जिनमें मेंडल के पूर्ण प्रभाविता का नियम सदैव सही नहीं होता और अपूर्ण प्रभाव पाया जाता है जिसे अपूर्ण प्रभाविता कहा जाता है।

आनुवांशिकता की अनियमितता (जेनेटिक डिस्आर्डर्स Genetic Disorders)

क्रोमोसोम की संख्या में परिवर्तन अथवा जीन उत्परिवर्तन के कारण विभिन्न तरह की अनियमितताएं जीन में पाई जाती हैं जो वंशानुगत होती हैं। यह निम्नलिखित प्रकार की होती हैं।

वर्णांधता या कलर ब्लाइंडनेस

वर्णान्ध व्यक्ति लाल और हरे रंग में भेद नहीं कर पाते हैं। इसे डाल्टोनिज्म भी कहते हैं, जो वंशागति के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है।

डाउन्स सिंड्रोम

इनमें 21वीं जोड़ी के गुणसूत्र 2 के बजाय 3 होते हैं अर्थात ऐसे व्यक्ति में गुणसूत्रों की संख्या 47 होती है। इस सिंड्रोम वाला व्यक्ति छोटे कद एवं मंदबुद्धि का होता है। इसमें जननांग समान लेकिन पुरुष नपुंसक होते हैं इसे मंगोली जड़ता भी कहते हैं।

हीमोफीलिया

जो भी मनुष्यों का लिंग सह-लग्न रोग है। हीमोफीलिया की रोगियों में चोट के काफी समय के बाद तक भी खून लगातार बहता रहता है अतः उसे रक्त श्रावण रोग भी कहते हैं। यह रोग प्रायः पुरुषों में ही पाया जाता है। इसकी वंशागति भी वर्णांधता की जैसी होती है।

क्लाइन फेल्टर्सा सिंड्रोम

इसमें लिंग गुणसूत्र दो के बजाय तीन और प्रायः एक्सएक्सवाई होते हैं इनमें एक अतिरिक्त एक्स गुणसूत्र की उपस्थिति के कारण वृषण छोटे होते हैं और इनमें शुक्राणु नहीं बनते अतः यह सिंड्रोम भी नपुंसक होते हैं।

टरनर्स सिंड्रोम

ऐसी स्थिति होती है जिनमें केवल एक एक्स गुणसूत्र पाया जाता है इनका कद छोटा होता है एवं जननांग अल्पविकसित होते हैं। इसमें वक्ष चपटा तथा जनद अनुपस्थित होते हैं यह नपुंसक होते हैं।

फीनाइलकीटोनूरिया

बच्चों की तंत्रिक ऊतक में फीनाइल ऐलेनीन के जमाव से अल्पबुद्धिता हो जाती है।

सिकल सेल एनीमिया

ऑक्सीजन की सप्लाई में कमी की वजह से लाल रक्त कण की हिमोग्लोबिन सिकुड़ कर हंसिया की आकृति के हो जाते हैं। यह रोग भी सुप्त जीन के कारण होता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण लाल रक्त कणिकाएं हंसिया के आकार की होकर फट जाती है जिससे हिमॉलिटिक एनीमिया रोग हो जाता है।

जीव विज्ञान GK

जुड़वां

जुड़वां अर्थात् यमज तीन प्रकार के होते हैं।

1. भ्रात्रीय यमज :- ये अलग-अलग शुक्राणुओं के द्वारा अलग-अलग अंडाणुओं के निषेचन के फलस्वरूप बनता है। इसलिए इसे द्वियुग्मनजी यमज कहते हैं। आमतौर पर एक ही अंडाणु के निषेचन से भ्रूण का विकास होता है। परंतु कभी कभी एक साथ एक से अधिक अंडाणुओं के अलग-अलग शुक्राणुओं से निषेचन के कारण गर्भ में एक से अधिक भ्रूण का साथ साथ विकास हो जाता है। ऐसे जुड़वां अलग-अलग लिंग के भी हो सकते हैं। चूंकि ये अलग-अलग शुक्राणुओं के निषेचन के परिणाम होते हैं इसलिए इनका जीन का ढांचा समान नहीं होता। इनके स्वभाव, आकृति, रंग, रूप भिन्न भिन्न होते हैं।

2. समान यमज :- एक ही भ्रूण के विखंडन के फलस्वरुप बनते हैं। यह एक युग्मनजी यमज भी कहलाते हैं। यह समान लिंग एवं जीन ढांचे के होते हैं अतः उनकी लक्षणों में विभिन्नता केवल वातावरणीय दशाओं के कारण होती हैं।

3. स्यामीज यमज :- यह समान यमज की भांति एक युग्मनज होते हैं किंतु पूरी तरह पृथक ना हो सकने के कारण जुड़े रह जाते हैं।

सार-संक्षेप

  • ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवंशिकी का पिता माना जाता है।
  • मेंडल ने मटर के पौधों में आनुवंशिकी संबंधी प्रयोग किए।
  • मनुष्य में 23 जोड़ियों में कुल 46 गुणसूत्र पाए जाते हैं।
  • पुरुष में 22 जोड़े गुणसूत्र समजात होते हैं लेकिन एक जोड़ा गुणसूत्र विषमजात होता है।
  • विषमजात गुणसूत्र को एक्स वाई के रूप में दर्शाते हैं।
  • विसमजात गुणसूत्र संतानों में लिंग निर्धारण का कारण होता है।
  • पिता के द्वारा संतान के लिंग का निर्धारण होता है।
  • वर्णान्ध व्यक्ति लाल और हरे रंग में अंतर नहीं कर पाता। यह आनुवांशिक बीमारी है।
  • सिकल एनीमिया एक आनुवांशिक रोग है इसमें हिमोग्लोबिन हंसिया की आकृति का हो जाता है तथा लाल रक्त कणिका की जीवन अवधि कम हो जाती है।

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