प्राचीन भारतीय इतिहास के पुरातात्विक स्रोत

इतिहास के पुरातात्विक स्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के लिए पुरातात्विक स्रोत सर्वाधिक प्रमाणिक हैं। जहां साहित्यिक स्रोतों से स्थिति स्पष्ट नहीं होती वहां पुरातात्विक सामग्री हमारे लिए सबसे अधिक उपयोगी हैं। पुरातात्विक स्रोत में अभिलेख, भूमि अनुदान पत्र, मुद्राएं, स्मारक एवं भवन, मूर्तियां, चित्रकला एवं उत्खनन में प्राप्त अन्य सामग्री आती हैं।

अभिलेख

ये अभिलेख पाषाण शिलाओं, स्तंभों, ताम्रपत्रों, दीवारों, मुद्राओं एवं प्रतिमाओं पर उत्खनित हैं। सबसे प्राचीन अभिलेख जिसे पढ़ा जा सका है अशोक के हैं। अशोक के अभिलेखों की भाषा प्राकृत है। कर्नाटक राज्य के रायचूर के पास स्थित मस्की तथा गुज्जर्रा (दतिया) मध्य प्रदेश से प्राप्त अभिलेखों में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है। उसे प्राय: देवानाम पिय पियदस्सी ( देवताओं का प्रिय, प्रियदर्शी) राजा कहा गया है। अशोक के अधिकांश अभिलेख ब्राम्ही लिपि में हैं, जो बाएं से दाएं लिखी जाती थी। पश्चिमोत्तर प्रांत से प्राप्त उसके अभिलेख खरोष्ठी लिपि में हैं जो दाएं से बाएं लिखी जाती थी। पाकिस्तान और अफगानिस्तान से प्राप्त अशोक के शिलालेखों में यूनानी और अमराइक लिपियों का प्रयोग हुआ है। अशोक के अभिलेखों को पढ़ने में सर्वप्रथम सफलता (1837 ईसवी में) जेम्स प्रिंसेप को मिली। सबसे अधिक प्राचीन अभिलेख 2500 ईसापूर्व की हड़प्पा काल के हैं जो मोहरों पर भावचित्रात्मक लिपि में अंकित हैं जिनका प्रामाणिक पाठ अभी तक नहीं हो पाया है; चाहे कितने भी दावे क्यों न किए जाते हों।

अभिलेखों के अनेक प्रकार हैं। कुछ अभिलेखों में अधिकारियों और जनता के लिए जारी किए गए सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक राज्यादेश एवं निर्णयों की सूचना रहती है – जैसे अशोक के अभिलेख। दूसरे प्रकार के वे आनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें बौद्ध ,जैन, वैष्णव आदि संप्रदायों के मातानुयायियों ने स्तंभों, प्रस्तर फलकों, मंदिरों एवं प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण कराया। तृतीय श्रेणी के वे अभिलेख हैं जिनमें राजाओं की विजय प्रशस्तियों का वर्णन का है लेकिन उनके दोषों का उल्लेख नहीं है। प्रशस्ति अभिलेखों में प्रसिद्ध हैं खारवेल का हाथीगुंफा अभिलेख, शक क्षत्रप रुद्रदामन का गिरनार जूनागढ़ अभिलेख, सातवाहन नरेश पुलुमावी का नासिक गुफालेख, समुद्रगुप्त का हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग स्तंभ लेख, मालवराज यशोधर्मन का मंदसौर अभिलेख, चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख (रविकीर्ति), प्रतिहार नरेश भोजराज का ग्वालियर अभिलेख, स्कंद गुप्त का भीतरी तथा जूनागढ़ अभिलेख, बंगाल के शासक विजय सेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादि। गैर राजकीय अभिलेखों में यवनदूत हेलियोडोरस का बेसनगर विदिशा से प्राप्त गरुड़ स्तंभलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिससे द्वितीय शताब्दी ईसापूर्व के मध्य भारत में भागवत धर्म के विकसित होने का प्रमाण मिलता है। एरण मध्यप्रदेश से प्राप्त वराह प्रतिमा पर हूणराज तोरमाण का लेख अंकित है। दक्षिण भारत के पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पांड्य और चोल वंश का इतिहास लिखने में इन शासकों के अभिलेख बहुत ही उपयोगी साबित होते हैं।


विदेशों से प्राप्त अभिलेखों में एशिया माइनर के बोगजकोई नामक स्थल से लगभग ईसा पूर्व 1400 का संधिपत्र अभिलेख मिलता है जिसमें मित्र, वरुण, इंद्र व नासत्य नामक देवताओं के नाम उत्कीर्ण हैं। मिस्र के तेलूअल-अमनों में मिट्टी की कुछ तख्तियां मिली हैं जिन पर बेबीलोनिया के कुछ शासकों के नाम उत्कीर्ण हैं तो ईरान और भारत के आर्य शासकों के नाम जैसे हैं। पर्सेपोलिस व बेहिस्तून अभिलेखों से ज्ञात होता है कि ईरानी सम्राट दारा प्रथम ने सिंधु नदी घाटी पर अधिकार कर लिया था

भूमि अनुदान पत्र

ये प्रायः तांबे की चादरों पर उत्कीर्ण हैं। इनमें राजाओं और सामंतों द्वारा भिक्षुओं, ब्राह्मणों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों और अधिकारियों को दिए गए गांवों, भूमियों और राजस्व संबंधी दानों का विवरण है। ये ताम्रपत्र प्राकृत, संस्कृत, तमिल एवं तेलुगु भाषाओं में लिखे गए हैं। भारी मात्रा में पूर्व मध्यकालीन भूमि अनुदान पत्र प्राप्त होने से यह निष्कर्ष निकाला गया कि पूर्व मध्यकालीन भारत (600 से 1200 ईसवी) में सामंती अर्थव्यवस्था स्थापित हो गई थी‌।

मुद्राएं

206 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईस्वी तक के भारतीय इतिहास का ज्ञान हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही प्राप्त हो पाता है। इसके पूर्व के सिक्कों पर लेख नहीं मिलता और उन पर जो चिन्ह बने हैं उसका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है। ये सिक्के आहत सिक्के या पंच मार्क सिक्के कहलाते हैं। धातु के टुकड़ों पर ठप्पा मारकर बनाई गई बुद्धकालीन आहत मुद्राओं पर पेड़, मछली, सांड, हाथी, अर्धचंद्र आदि वस्तुओं की आकृतियां होती थीं। बाद के सिक्कों पर राजाओं और देवताओं के नाम तथा तिथियां भी उल्लेखित हैं। इस प्रकार की मुद्राओं के आधार पर अनेक राजवंशों के इतिहास का पुनर्निर्माण संभव हो सका है, विशेषकर उन हिंद-यूनानी शासकों के इतिहास का जो उत्तरी अफगानिस्तान से भारत पहुंचे थे और ईसा पूर्व द्वितीय से प्रथम शताब्दी ईसापूर्व तक यहां शासन किये। मुद्राओं का उपयोग दान-दक्षिणा, क्रय-विक्रय तथा वेतन-मजदूरी के भुगतान में होता था। शासकों की अनुमति से व्यापारिक संघ (श्रेणियों) ने भी अपने सिक्के चलाए थे। सर्वाधिक मात्रा में मुद्राएं मौर्योत्तर काल में मिली हैं जो सीसा, पोटीन, तांबा, कांसे, चांदी तथा सोने की हैं। कुषाण शासकों द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों में जहां सर्वाधिक शुद्धता थी, वहीं गुप्त शासकों ने सबसे अधिक मात्रा में स्वर्ण सिक्के जारी किए। मुद्राओं से तत्कालीन आर्थिक दशा तथा संबंधित राजाओं की साम्राज्य सीमा का भी ज्ञान हो जाता है। कनिष्क के सिक्कों से उसका बौद्ध धर्म का अनुयायी होना प्रमाणित होता है। समुद्रगुप्त के कुछ सिक्कों पर यूप (यज्ञ स्तंभ) बना है जबकि कुछ अन्य सिक्कों पर अश्वमेध पराक्रम: शब्द उत्कीर्ण है, साथ ही उसे वीणा बजाते हुए भी दिखाया गया है। इंडो-यूनानी तथा इंडो-सीथियन शासकों के इतिहास के मुख्य स्रोत सिक्के ही हैं। सातवाहन राजा शातकर्णी की एक मुद्रा पर जलपोत अंकित होने से उसके द्वारा समुद्र विजय का अनुमान लगाया गया है। चंद्रगुप्त द्वितीय की व्याघ्र शैली की चांदी की मुद्राओं में उसके द्वारा पश्चिम भारत के शकों पर विजय सूचित होती है।

स्मारक एवं भवन प्राचीन काल के महलों एवं मंदिरों की शैली से वास्तुकला के विकास का पर्याप्त ज्ञान होता है। उत्तर भारतीय मंदिरों की कला शैली नागर शैली कहलाती है। दक्षिण भारतीय मंदिर कला द्रविड़ शैली कहलाती है, जबकि दक्षिणापथ के मंदिर बेसर शैली के मंदिर कहलाते हैं। मंदिरों, स्तूपों, विहारों से तत्कालीन धार्मिक विश्वासों की जानकारी होती है। दक्षिण-पूर्व एशिया से प्राप्त मंदिरों के अवशेष से भारतीय संस्कृति के प्रसार पर प्रकाश पड़ता है। जावा के बोरोबुदुर मंदिर से वहां 9 वीं शताब्दी में महायान बौद्ध धर्म की लोकप्रियता प्रमाणित होती है।

मूर्तिकला

कुषाण काल, गुप्त काल और गुप्तोत्तर काल में जो मूर्तियां निर्मित की गईं उनसे जनसाधारण की धार्मिक आस्थाओं और मूर्तिकला का ज्ञान मिलता है। कुषाणकालीन मूर्तियों में जहां विदेशी प्रभाव अधिक है, वही गुप्तकालीन मूर्तिकला में स्वाभाविकता परिलक्षित होती है जबकि गुप्तोत्तर कला में सांकेतिकता अधिक है। भरहुत, बोधगया, सांची और अमरावती की मूर्ति कला में जन सामान्य के जीवन की यथार्थ झांकी मिलती है।

चित्रकला

अजंता गुफा में उत्कीर्ण माता और शिशु तथा मरणासन्न राजकुमारी जैसी चित्रों की अर्थवत्ता सर्वकालिक है जिनसे गुप्तकालीन कलात्मकता और तत्कालीन जीवन की झलक मिलती है।

अवशेष

पाकिस्तान में सोहन नदी घाटी में उत्खनन से प्राप्त पुरापाषाण युग के पत्थर के खुरदरे हथियारों से अनुमान लगाया गया कि भारत में 400000 से 200000 वर्ष पूर्व मानव रहता था। 10000 से 6000 वर्ष ईसा पूर्व वह कृषि कार्य, पशुपालन, कपड़ा बुनना, मिट्टी के बर्तन बनाना तथा पत्थर के औजार बनाना सीख गया। गंगा-यमुना दोआब में पहले काले और लाल मृदभांड और भूरे रंग के मृदभांड प्राप्त हुए। मोहनजोदड़ो में 500 से अधिक की संख्या में मुहरें प्राप्त हुई हैं जो हड़प्पा संस्कृति के निवासियों के धार्मिक विश्वासों को ओर इंगित करती हैं। बसाड़ (प्रारंभिक वैशाली) से 274 मिट्टी की मुहरें मिली हैं। पुरातत्ववेत्ता वैदिक साहित्य, महाभारत और रामायण में लिखित स्थानों का उत्खनन करके उनकी भौतिक संस्कृति का चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। कौशांबी में व्यापक स्तर पर किए गए उत्खनन कार्य में उदयन का राज प्रासाद तथा घोषिताराम नामक एक विहार मिला है। अतरंजीखेड़ा आदि की खुदाइयों से ज्ञात होता है कि देश में लोहे का प्रयोग ईसा पूर्व एक हजार के लगभग आरंभ हो गया था। दक्षिण भारत में अरिकमेडु नामक स्थल की खुदाई से रोमन सिक्के, दीप का टुकड़ा तथा बरतन आदि मिले हैं इससे यह स्पष्ट होता है कि ईसा की आरंभिक शताब्दियों में रोम तथा दक्षिण भारत के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था।

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