इमैनुएल कांट

इमैनुएल कांट का दर्शन

इमैनुएल कांट का दर्शन समीक्षावाद कहलाता है क्योंकि उसने अनुभववाद और बुद्धिवाद की आलोचनात्मक समीक्षा करके अपनी विचारधारा को स्थापित किया। कांट के अनुसार अनुभववाद और बुद्धिवाद दोनों ही एकांगी विचारधाराएं हैं।

अनुभववादियों के अनुसार ज्ञान का एकमात्र स्रोत अनुभव है। सभी ज्ञान अनुभव से ही प्राप्त होते हैं। मन में ऐसा कुछ भी नहीं है जो अनुभव से पहले का हो। अनुभव से प्राप्त ज्ञान संश्लेष्णात्मक होता है। उसमें गणित के नियमों की तरह निश्चयात्मकता नहीं होती। गणित के नियम अनुभव से नहीं आते इसलिए वे वास्तविक नहीं होते। ये सिर्फ पुनरुक्ति होते हैं। वास्तविक ज्ञान प्राकृतिक विज्ञानों में होता है। प्राकृतिक विज्ञानों के तथ्य केवल संभावना होते हैं। कल पूरब से ही सूरज निकलेगा यह भी केवल एक संभावना है। हम हर रोज़ पूर्व से सूर्य का उदय होता हुआ देखते हैं इसलिए ऐसा मान लेते हैं कि कल भी सूर्य पूर्व से ही निकलेगा।

लेकिन देकार्त, लाईबनिज आदि बुद्धिवादियों का आदर्श गणित है। उनके अनुसार बुद्धि में कुछ जन्मजात प्रत्यय या विचार होते हैं। ये प्रत्यय अनुभव से पूर्व होते हैं। इन्हीं प्रत्ययों के विश्लेषण से समस्त ज्ञान का निगमन होता है। ऐसा ज्ञान ही निश्चयात्मक होता है। अनुभव केवल अवसर प्रदान करता है अन्यथा बतख के बच्चे में तैरने की प्रतिभा जन्मजात होती है।

इमैनुएल कांट के अनुसार अनुभववादियों का यह कहना सही है कि ज्ञान की सामग्री अनुभव से प्राप्त होती है और अनुभव से प्राप्त ज्ञान संश्लेष्णात्मक होता है। लेकिन ऐसा ज्ञान निश्चयात्मक नहीं होता। जबकि विज्ञान के नियम वास्तविक भी माने जाते हैं और संश्लेष्णात्मक भी और निश्चयात्मक भी माने जाते हैं।

लेकिन अनुभववादियों ने किसी भी ऐसे नियम को मानने से इंकार कर दिया जो एक ही साथ वास्तविक भी हो और निश्चयात्मक भी हो। इमैनुएल कांट ने बुद्धिवादियों के इस विचार को अपनाया कि ज्ञान में निश्चयात्मकता बुद्धि से आती है। बुद्धि में कुछ प्रवर्ग या कोटियां होती हैं जो अनुभव से पहले होती हैं। जैसे देश और काल।

बुद्धि की कोटियां ही वे सांचे हैं जिनसे हमारे अनुभवों को आकार मिलता है अर्थात बुद्धि की कोटियां चश्मे की तरह है जिनसे होकर ही अनुभव की सामग्री को जान सकते हैं अन्यथा वस्तुएं अपने आप में क्या हैं वह हमारे लिए अज्ञेय हैं। हमारा ज्ञान ‘हमारे लिए वस्तु’ पर आधारित है न कि ‘निजरूप वस्तु’ पर।

लेकिन हम मुख्य समस्या पर आते हैं जो अनुभववाद के कारण उत्पन्न हो गया था। अनुभववाद ब्रिटिश दार्शनिकों लाक और बर्कले से शुरू हो कर ह्यूम के विचारों में अपनी चरम परिणति पर पहुंच जाता है। ह्यूम तक पहुंचते पहुंचते अनुभववाद संशयवाद में बदल जाता है।

यदि अनुभव ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत है तो ह्यूम के अनुसार हम एक-दूसरे के बाद प्राप्त हो रहे संवेदनों को ही जानते हैं। इनके बीच किसी संबंधों का प्रत्यक्ष हमें नहीं होता। इसलिए सभी ज्ञान जिनमें प्राकृतिक विज्ञान भी सम्मिलित हैं केवल संभावना हैं। उनकी सत्यता संशय के दायरे में है। ह्यूम के इस संशयवाद ने विज्ञान की नींव हिला दी थी।

तो फिर विज्ञान कैसे संभव है? विज्ञान मतलब ऐसा ज्ञान जो वास्तविक भी हो और निश्चित भी। हम देख चुके हैं कि वही ज्ञान निश्चित हो सकता है जो प्रागनुभविक है अनुभव से पहले का है। इस समस्या को कांट एक वाक्य में इस तरह रखते हैं :

प्रागनुभविक संश्लेष्णात्मक निर्णय कैसे संभव है?

इमैनुएल कांट का मानना है कि बुद्धि में स्वयं बुद्धि है जो अनुभव पूर्व है और इसी बुद्धि की कोटियों या प्रवर्गों से ज्ञान में निश्चितता आती है। बेशक ज्ञान की सामग्री अनुभव से मिलती है लेकिन बुद्धि की सांचों में आकार पा कर ही बाह्य जगत के संवेदन ज्ञान के रूप में परिवर्तित हो पाते हैं जो वास्तविक और संशयरहित होता है। इस प्रकार बुद्धि और अनुभव दोनों के योगदान से वैज्ञानिक ज्ञान संभव है।

Advertisement

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.