द्वंद्वात्मक भौतिकवाद

कार्ल मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद

कार्ल मार्क्स के दार्शनिक विचार हेगेल के प्रत्ययवादी द्वंद्ववाद और और फायरबाख के भौतिकवाद की आलोचनात्मक समीक्षा के दौरान निखरे।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद नाम से ही स्पष्ट है कि यह द्वंद्ववाद और भौतिकवाद के मेल से विकसित हुआ है। द्वंद्ववाद का अंग्रेजी रूपांतरण Dialectic यूनानी शब्द Dilego से बना है जिसका अर्थ होता है बातचीत या तर्क-वितर्क करना। इस प्रकार द्वंद्ववाद ‘वादे वादे जायते सत्यबोध:’ के अर्थ में प्राचीन काल से ही प्रचलित है परंतु इसे विकास के वस्तु गत और सामान्य नियम के रूप में सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय हेगेल को जाता है।

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हेगेल ने दर्शाया कि विचार निम्न से उच्च रूपों की ओर प्रगतिशील ढंग से विकसित होते हैं। वस्तुतः घटनाओं में आंतरिक व्याघात या विरोध होता है। उनमें परस्पर विरोधी शक्तियां साथ-साथ पाई जाती हैं। विरोधी शक्तियों के संघर्ष से ही विकास का क्रम चलता है।

हेगेल के अनुसार संसार में प्रत्येक वस्तु या घटना की प्रतिवादी वस्तु या घटना अवश्य होती है। पहले ‘वाद’ होता है तब उसका ‘प्रतिवाद’। इन दोनों के संघर्ष से ‘संवाद’ नामक नयी परिस्थिति पैदा होती है। संवाद में वाद और विवाद दोनों की वांछनीय विशेषताएं सम्मिलित होती हैं। इसलिए यह दोनों से अधिक अच्छा होता है।

परंतु समय के साथ संवाद की प्रगतिशीलता भी पुरानी पड़ जाती है तथा वह स्वयं वाद बन जाता है और इसका भी विवाद होता है जिससे सर्वथा नए संवाद का प्रादुर्भाव होता है। यह संवाद पहले के संवाद से उच्च कोटि का होता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और इसी के कारण जीवन, जगत और मानव जाति का विकास होता रहता है।

मार्क्स ने हेगेल के द्वंद्ववाद को अपनाया लेकिन हेगेल का द्वंदवाद प्रत्ययवादी था। हेगेल के मत में विचार अथवा आत्मा ही एकमात्र परम सत्य है जबकि भौतिकवादी जगत उसकी बाह्य अभिव्यक्ति मात्र है। मार्क्स ने प्रत्ययवाद का विरोध एवं खंडन किया तथा द्वंद्ववाद को भौतिकवाद के साथ संयुक्त किया।

‘दास कैपिटल’ की भूमिका में मार्क्स स्वयं लिखा है:

“मैंने हेगेल के द्वंद्व को सिर के बल खड़ा पाया; मैंने उसे पैरों के बल खड़ा कर दिया।”

इसके अलावा हेगेल ने केवल अतीत के विश्लेषण के लिए ही द्वंद्ववाद के नियमों का उपयोग किया था परन्तु भविष्य पर लागू नहीं किया।

प्रत्ययवादी दर्शन की फायरबाख द्वारा की गई आलोचना ने मार्क्स को कठोर भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाने में मदद की। लेकिन वे फायरबाग के स्थाई अनुयायी नहीं रह सके क्योंकि फायरबाख की पद्धति द्वंद्ववादी नहीं थी। इसके अलावा फायरबाख के सिद्धांत में सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष शामिल नहीं था। इस प्रकार मार्क्स के दार्शनिक विचार हेगेल के द्वंद्ववाद की तथा फायरबाख के भौतिकवाद की आलोचनात्मक समीक्षा के दौरान विकसित हुए।

द्वंद्ववाद की बुनियादी मान्यताएं

द्वंद्ववाद के दो मुख्य बुनियादी उसूल हैं।

(क) सार्वत्रिक संपर्क और अंत:क्रिया

कोई भी एक वस्तु या प्रणाली संबंधों के एक बहुशाखीय जाल द्वारा अन्य वस्तुओं या प्रणालियों के साथ जुड़ी है और इनमें से कुछ में परिवर्तन होने पर अन्य में भी निश्चय ही परिवर्तन होते हैं।

(ख) परिवर्तन और विकास

विकास द्वंद्ववाद की दूसरी आधारभूत मान्यता है। इसके अनुसार वस्तुएं लगातार बदलती रहती हैं। कुछ परिवर्तन आकस्मिक होते हैं, कुछ विपरीत दिशा में होते हैं परंतु इन सबके बावजूद विश्व में अग्रगामी और अविपर्येय परिवर्तन हो रहा है। जैसे सरल आंगिक संरचना वाले जीवों से जटिल और उच्चतर जीवों का विकास।

भौतिकवादी द्वंदवाद के नियम

कार्ल मार्क्स ने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के तीन आधारभूत नियमों का निरूपण किया है।

1. विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम

यह नियम विकास के आंतरिक कारण को उद्घाटित करता है, यह दर्शाता है कि विकास का स्रोत प्रक्रियाओं और घटनाओं के व्याघातक स्वभाव तथा उनमें आंतरिक रूप से विद्यमान विरोधियों की अंतर्क्रिया और संघर्ष में निहित है।

विरोधियों की एकता का मतलब है कि एक दूसरे के बगैर उनका अस्तित्व नहीं हो सकता और ये परस्पर निर्भर हैं। ये विरोधी निश्चित दशा में संतुलित होते हैं और उनमें से कोई एक किसी दूसरे पर हावी नहीं हो पाते। ऐसा संतुलन किसी चीज के विकास में ठहराव का सूचक है। विकास के दौरान संतुलन गड़बड़ा जाता है जिसके परिणाम स्वरूप एक चीज का विलोपन और विरोधियों की नई एकता से सज्जित दूसरी चीज का आविर्भाव हो जाता है।

2. परिमाण का गुण में रूपांतरण का नियम

यह नियम विकास के तरीके को दर्शाता है। गुण को स्थिर रखते हुए किसी वस्तु के परिमाण या मात्रा में एक सीमा के अंदर ही परिवर्तन किया जा सकता है जब परिमाणात्मक परिवर्तन सीमा से बाहर हो जाते हैं तो वस्तु के गुण बदलने लगते हैं। जैसे सामान्य वायुमंडलीय दाब में 0 डिग्री से अधिक ताप तक पानी द्रव रहता है उससे कम ताप में वह बर्फ बन जाता है।

3. निषेध के निषेध का नियम

यह नियम पुराने और नए के बीच के संबंध को दर्शाता है। यह विकास की सामान्य प्रवृत्ति और दिशा को प्रदर्शित करता है। निषेध में पुराना नए के द्वारा हटा दिया जाता है। निषेध विरोधियों की एकता एवं संघर्ष में अंतर्निहित है। पुराना नये द्वारा कभी भी पूर्णतः नष्ट नहीं किया जाता। द्वंद्वात्मक निषेध पुरातन के सकारात्मक तत्वों को संरक्षित करता है और अतीत के विकास की उपलब्धियां नए द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं। कोई भी नई चीज देर सबेर पुरानी पड़ जाती है और चूंकि हर पुरानी अंततः किसी नये को जन्म देती है इसलिए उसका फिर से निषेध हो जाता है, जो कभी स्वयं निषेध थी। इस प्रकार विकास का नियम निषेध का निषेध है।

और पढ़ें: भारतीय दर्शन 

मार्क्स का भौतिकवाद

मार्क्सवादी द्वंद्वात्मक प्रणाली को समझ लेने के बाद अब मार्क्सवादी भौतिकवाद के बारे में जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। मार्क्सवादी भौतिकवाद प्रत्ययवादी दर्शन के बिल्कुल विपरीत है। प्रत्यययवादियों का विश्वास है कि विश्व निरपेक्ष आत्मा का मूर्त रूप हैं इसके विपरीत मार्क्सवादी भौतिकवाद के अनुसार संसार की घटनाओं का आधार गतिमान भौतिक पदार्थ है जो अपने आंतरिक प्रकृति तथा बाह्य दशाओं के सम्मिलित प्रभाव से नाना रूप में प्रकट होता है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है भौतिकवादी दृष्टिकोण प्रकृति को बिना किसी संमिश्रण के उसी रूप में देखता है जिस रूप में वह वास्तव में है।

पदार्थ, प्रकृति और जीव हमारी चेतना से स्वतंत्र हैं। उनका हमारी चेतना से अलग वस्तुगत अस्तित्व है। पदार्थ पहले है और चेतना द्वितीयक है। पदार्थ चेतना की उपज नहीं है, वरन चेतना स्वयं पदार्थ की सर्वश्रेष्ठ उपज है।

मार्क्सवादी भौतिकवाद के अनुसार विश्व ज्ञेय है और उसके सामान्य नियमों को जानकर उसे सामूहिक प्रयासों से सामुदायिक हित में परिवर्तित किया जाना चाहिए।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की विशेषताएं

द्वंद्ववाद भौतिकवाद विश्व और समाज के उद्देश्यपूर्ण और नियोजित परिवर्तन की दिशा और क्रियाविधि बताता है। दुनिया में बदलाव परिकल्पनात्मक विचारधाराओं के जरिए संभव नहीं है। मार्क्सवाद अपने तरीके से सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की वैज्ञानिक विधि प्रस्तुत करता है। मार्क्स ने लिखा है कि अब तक दार्शनिकों ने विविध तरीकों से दुनिया की व्याख्या की है लेकिन सवाल इसे बदलने का है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद प्रकृति, समाज तथा चिंतन के सामान्य नियमों का विज्ञान है जो सभी क्षेत्रों में विकास के वस्तुगत नियमों को दर्शाता है। यह ज्ञान और व्यवहार को नूतन, प्रगतिशील और विकासमान दिशा में ले जाता है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद एक आशावादी विचारधारा है। यह मानव जाति के विकास की असीम संभावनाओं को दर्शाता है। तमाम कठोर नियमानुवर्तिताओं के बावजूद मार्क्स सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए मानवीय प्रयासों की महत्ता को बखूबी रेखांकित करते हैं।

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