क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण

क्रांतिकारी आंदोलन का दूसरा चरण

चौरा चौरी की हिंसक घटना के बाद असहयोग आंदोलन को महात्मा गांधी द्वारा रोक दिया गया। ऐसे में क्रांतिकारी आंदोलन में फिर से तेजी आ गई। बंगाल की पुरानी युगांतर और अनुशीलन समितियों को पुनर्जीवित किया गया। लेकिन राष्ट्रव्यापी तालमेल के लिए एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी संगठन की आवश्यकता को महसूस किया गया। इसलिए सभी भारतीय क्रांतिकारी समूहों का अक्टूबर 1924 में कानपुर में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें सचिन्द्रनाथ सान्याल, जगदीश चन्द्र चटर्जी और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे पुराने क्रांतिकाियों के साथ साथ भगत सिंह, सुखदेव, शिव वर्मा, भगवतीचरण वोहरा तथा चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा क्रांतिकारियों ने भी हिस्सा लिया। इनके सम्मिलित प्रयासों से 1928 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन या आर्मी नामक एक अखिल भारतीय क्रांतिकारी संगठन की स्थापना हुई। बंगाल, बिहार, संयुक्त प्रांत, दिल्ली, पंजाब मद्रास आदि प्रांतों में इसकी शाखाएं स्थापित की गईं।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने तीन मुख्य उद्देयों को लेकर काम शुरू किया।

  1. गांधी जी की अहिंसात्मक नीतियों के खिलाफ जनता में जागरूकता पैदा करना।
  2. पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु प्रत्यक्ष क्रांतिकारी कार्यवाही की आवश्यकता को प्रदर्शित करना। तथा
  3. अंग्रेजी साम्राज्यवादी सरकार के स्थान पर अखिल भारतीय समाजवादी संघीय गणतंत्र की स्थापना करना।

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काकोरी रेल डकैती

9, अगस्त, 1925 को संयुक्त प्रांत (यू पी) के क्रांतिकारियों ने सहारनपुर लखनऊ रेल लाईन पर काकोरी जाने वाली रेलगाड़ी को सफलतापूर्वक लूटा।

साण्डर्स हत्याकांड

सायमन कमीशन के विरोध में लाहौर में निकाले गए जुलूस का नेतृत्व करते समय लाला लाजपत राय पर पुलिस द्वारा भयंकर लाठी चार्ज किया गया था जिससे बाद में उनकी मृत्यु हो गई। पंजाब के क्रांतिकारियों ने भगतसिंह की अगुवाई में दोषी पुलिस अधिकारी साण्डर्स की 17 दिसंबर 1928 को गोली मारकर हत्या कर दी।

सेंट्रल असेंबली बम काण्ड

8, अप्रैल 1929 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी के दो सदस्यों ने केंद्रीय विधानसभा के खाली बेंचों में बम फेंका। सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इस कार्य को अंजाम दिया। उनका उद्देश्य किसी हत्या करना नहीं था। बल्कि ऊंचा सुनने वाले बहरों को जनता की आवाज सुनाना उनका मकसद था। चूंकि सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने भर से उनको फांसी नहीं दी जा सकती थी इसलिए सरकार ने इस कांड को साण्डर्स हत्या कांड से जोड़ कर उन पर लाहौर षड्यंत्र केस चलाया गया तथा भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गयी।

चटगांव शस्त्रागार लूट

इसी प्रकार सूर्यसेन ने बंगाल के चटगांव शस्त्रागार को अप्रैल 1930 में लूटा। बाद में वे पकड़े गए और फांसी पर लटका दिए गए।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1942 में देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया गया। गांधी जी तथा कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफतार कर लिया गया। इसके बाद भारत छोड़ो आन्दोलन जनता का स्वत: स्फूर्त आंदोलन बन गया जिसमें हिंसावादी-अहिंसावादी, समाजवादी और क्रांतिकारी सब ने एक साथ काम किया। जयप्रकाश नारायण आदि समाजवादियों ने आंतरिक तोड़फोड़ की नीति अपनाई तो सुभाषचन्द्र बोस ने जापान और जर्मनी की सहायता से पूर्वोत्तर से ब्रिटिश भारत पर आजाद हिन्द फौज के द्वारा आक्रमण किया। देश के अनेक हिस्सों में समानांतर सरकारों का गठन भी किया गया।

उपरोक्त संक्षिप्त विवरण से स्पष्ट है कि पहले चरण के क्रांतिकारियों और दूसरे चरण के क्रांतिकारियों में कुछ मूलभूत अंतर था।  पुराने क्रांतिकारी भारत के पारंपरिक धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित थे उनके विपरीत दूसरे दौर के क्रांतिकारी समाजवादी सिद्धांतों​ से संचालित थे। बाद वाले क्रांतिकारी अपेक्षाकृत अधिक संगठित थे और वृहत्तर उद्देश्यों को लेकर चले। देश के लिए बलिदान और आत्मोसर्ग इनकी भावना से सम्पूर्ण राष्ट्र अनुप्राणित था। लेकिन गांधी जी के अहिंसात्मक सत्याग्रह की अपार सफलता के चलते क्रांतिकारी विचारधारा भारत में प्रमुखता नहीं पा सकी।

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