गाहड़वाल, चौहान और परमार

गाहड़वाल, चौहान और परमार

गाहड़वाल वंश

प्रतिहारों के बाद कन्नौज के वैभव को गाहड़वालों ने नया जीवन प्रदान किया। गाहड़वाल वंश का संस्थापक चंद्रदेव था। चंद्रदेव ने प्रतिहार शासक को हराकर कन्नौज पर अपना आधिपत्य स्थापित किया और 1100 तक शासन किया। चंद्रदेव का उत्तराधिकारी मदनचंद्र या मदनपाल था। मदनचंद्र का उत्तराधिकारी गोविंदचंद्र (1114 से 1154) एक महत्वकांशी शासक था। उसने पालों से मगध को जीता तथा मालवा पर अधिकार किया। गोविंद चंद्र के पुत्र विजय चंद्र (1156 से 1170 ईस्वी) ने गहड़वाल साम्राज्य को सुरक्षित बनाया। जयचंद (1170 से 1193) इस वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था‌। दिल्ली पर आधिपत्य के लिए चौहान और गाहड़वालों की शत्रुता चल रही थी, जिस पर अंततः चौहानों का कब्जा हो गया।

दिल्ली विजय के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक तथा मोहम्मद गोरी ने जयचंद पर आक्रमण किया 1193 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में जयचंद हार गया और उसे मार डाला गया जयचंद ने देवगिरि के यादव गुजरात के सोलंकी और तुर्कों को कई बार हराया। अपनी विजय के उपलक्ष्य में उसने राजसूय यज्ञ किया। उसके राजकवि तथा संस्कृत के प्रख्यात कवि श्रीहर्ष ने इसके शासनकाल में नैषधीयचरित एवं खंडनखाद्य की रचना की। उसका पुत्र हरीश खोये हूए क्षेत्र को फिर से मुक्त कराने में असफल रहा। इल्तुतमिश ने यहां स्थाई रूप से 1225 ईस्वी में सत्ता स्थापित कर ली।


दिल्ली तथा अजमेर (शाकंभरी) के चौहान

चौहान वंश की अनेक शाखाओं में से सातवीं शताब्दी में वासुदेव द्वारा स्थापित शाकंभरी (अजमेर के निकट) के चौहान राज्य का इतिहास में विशेष स्थान है। वासुदेव के बाद सामान्य पूर्णतल्ल, जयराज, विग्रहराज प्रथम, चंद्रराज, गोपराज आदि अनेक शासक हुए। इस वंश में अजयराज नामक एक महत्वपूर्ण शासक 12वीं शताब्दी में हुआ जिसने अजमेर नगर बसाया और उसी राजप्रासादों व देवालयों से अलंकृत किया। अजयराज का उत्तराधिकारी अर्णोराज (1133 ईस्वी) एक महत्वपूर्ण शासक था। इसने अजमेर के निकट सुल्तान महमूद की सेना को पराजित किया। अर्णोराज का पुत्र विग्रहराज चतुर्थ अथवा बीसलदेल (1153- 1663 ईस्वी) एक कुशल शासक था। इसमें दिल्ली पर पुनः अधिकार करके हांसी को भी जीता। इसने तुर्कों के विरुद्ध युद्ध किए। इसके साम्राज्य में पंजाब, राजपूताना तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अनेक भाग सम्मिलित थे। विग्रहराज चतुर्थ के बाद अपर गांगेय, पृथ्वीराज द्वितीय तथा सोमेश्वर ने कुछ काल तक शासन किया। 1178 ईस्वी में सोमेश्वर का पुत्र इतिहास प्रसिद्ध पृथ्वीराज तृतीय (चौहान) शासक हुआ। इसने 1182 ईस्वी में रेवाड़ी, भिवानी तथा अलवर के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा किया। इसने बुंदेलखंड के चंदेल राजा परमर्दिदेव को रात्रि अभियान में हराया। 1186 ईस्वी में पृथ्वीराज तृतीय गुजरात के भीम तृतीय पर आक्रमण किया। 1191 में मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज के बीच तराईन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें मुहम्मद गौरी पराजित हुआ। 1192 ईस्वी में मोहम्मद गोरी और पृथ्वीराज तृतीय के बीच तराईन का दूसरा युद्ध हुआ जिसमें पृथ्वीराज पराजित हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। तराइन के दूसरे युद्ध के बाद ही भारत में तुर्की राज्य की स्थापना हुई। 1192 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चौहानों का दमन करते हुए दिल्ली पर अपना शासन स्थापित किया।

मालवा के परमार

10 वीं सदी के प्रारंभ में जब प्रतिहारों का आधिपत्य मालवा पर से समाप्त हो गया तब वहां परमार शक्ति का उदय हुआ। कुछ लोग इन्हें राष्ट्रकूटों का वंशज मानते हैं। सीमुक इस वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था। इसका संघर्ष मान्यखेत के राष्ट्रकूटों से हुआ। वाक्पति मुंज (972 से 994 ईस्वी) के समय मालवा के परमार की शक्ति का उत्कर्ष प्रारंभ हुआ। इस की सभा में परिमल गुप्त (नवसाहसांकचरित का रचियता) दशरूपक का लेखक धनंजय, दशरूपावलोक के रचयिता धनिक आदि विद्वान थे। इसने त्रिपुरी, लाट (गुजरात), कर्नाटक, चोल और केरल के राजाओं को युद्ध में हराया। इसकी प्रसिद्ध विजय कल्याणी के चालुक्य राजा तैलप द्वितीय पर थी। भोज परमार (1000 से 1055 ईस्वी) इस वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था जो कविराज के नाम से जाना जाता था। इसे समरांगणसूत्रधार, सरस्वती कंठाभरण, सिद्धांत संग्रह, राज मार्तंड, योगसूत्र वृत्ति, विद्या विनोद, युक्ति कल्पतरु, चारु चर्चा, आदित्य प्रताप, सिद्धांत संग्रह, आर्युवेद सर्वस्व आदि ग्रंथों की रचना का श्रेय प्राप्त है। इसने कल्याणी के चालुक्य राजा विक्रमादित्य तथा कलचुरी राजा गांगेयदेव को पराजित किया। बिहार के पश्चिमी भाग पर परमारों के आधिपत्य के कारण ही आरा और उसके आसपास का प्रदेश भोजपुर कहलाया। 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को अपनी सल्तनत में मिला लिया।

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