गीता का कर्मयोग या निष्काम कर्म का सिद्धांत

कर्मयोग या निष्काम कर्म

निष्काम कर्म गीता का मुख्य उपदेश है। गीता की यह स्पष्ट मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति क्षण भर के लिए कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म करना व्यक्ति का अधिकार एवं कर्तव्य दोनों है। उसे कर्म करते रहना चाहिए। लेकिन गीता में कर्म के प्रति अहंता, ममता और आसक्ति का विरोध किया गया है। इसलिए इस प्रकार का विचार प्रतिपादित किया गया है कि :

“तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, फल में नहीं, इसलिए तुम कर्मफल की वासना वाला मत बनो और कर्मों को छोड़ देने का भी विचार मत करो।”(2/47)

इसीलिए आदेश दिया गया है- ‘मा कर्मफल हेतुर्भू’ अर्थात् फलार्थी मत बनो, कर्मफल की वासना से युक्त मत होओ क्योंकि ‘फलेसक्तो निबध्यते’ फलासक्ति से कर्मबंधन दृढ़ होता है। इसलिए गीता में फल की इच्छा से रहित होकर कर्म करने की शिक्षा दी गयी है। कर्मफल की इच्छा रखने वाले दया के पात्र होते हैं (कृपण: फलहेतव:)।

कर्मों के फल या परिणाम के प्रति लालसा या कामना से विषयों में आसक्ति बढ़ती है। कामना की सिद्धि में विघ्न पड़ने से क्रोध आता है, क्रोध से मति भ्रष्ट हो जाती है, अविवेक पैदा होता है। अविवेक से स्मृति का नाश होता है, भले बुरे के पहचान की क्षमता चली जाती है और व्यक्ति अपने लिए श्रेष्ठ साधन का चयन नहीं कर पाता। इस तरह वह कर्म बंधन में फंसते जाता है।

लेकिन यह प्रश्न उठता है कि कर्मफल की इच्छा या कामना के बिना कर्मों में प्रवृत्ति कैसे होगी? फल की आशा के बिना लोग कर्म कैसे कर पाएंगे? इसका समाधान इस तरह किया गया है कि कामनाओं की पूर्ति के लिए भी कर्म किया जाता है तथा कामनाओं की निवृत्ति के लिए भी कर्म करते हैं। सामान्य जन कामनाओं की पूर्ति के लिए कार्य करते हैं परन्तु ज्ञानी व्यक्ति आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कर्म किया जाना चाहिए न कि कामनाओं के वशीभूत होकर। कर्म करने की प्रक्रिया उद्देश्य से प्रेरित होनी चाहिए न कि कामनाओं से परिचालित।

जब फल में आसक्ति से कर्मबंधन मजबूत होता है तो फिर भी गीता कर्म करने का उपदेश क्यों देती है? कौन सा कर्म किया जाए कौन से न किए जाए? क्या इस पचड़े में पड़ने से सन्यास मार्ग अच्छा नहीं है? अर्जुन ने भी तो यही प्रश्न उठाया था। गीता में श्रीकृष्ण का यह कहना है कि कर्म करने से बंधन होगा या नहीं होगा यह कर्ता के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।

गीता में संकल्प की स्वतंत्रता को स्वीकार किया गया है तथा खास परिस्थिति में विशेष कर्म को करना व्यक्ति का अपना चयन होता है, इसलिए संकल्पित कर्म के प्रति यदि कर्त्ताभाव है तो वह कर्म इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित तीन तरह के फल देता है। परंतु जिस कर्म में “मैं कर्त्ता नहीं हूं” ऐसा भाव रहता है, वह बंधनकारक नहीं होता। उसे ‘चेष्टा’ मात्र कहा गया है। जिस प्रकार कांटे से कांटा निकाला जाता है उसी तरह चेष्टाएं कर्मबंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक होती हैं। निष्काम भाव प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातें भी सहायक होती हैं।

लोकसंग्रह

कर्म सिद्धांत के अनुसार स्वार्थ भावना से प्रेरित होकर कर्म करने से सभी प्रकार की विकृतियां आती हैं। स्वार्थ से कर्म तुच्छ और बंधनकारक हो जाते हैं। परंतु बंधन को तोड़ कर मोक्ष को प्राप्त करना मानव का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्वहित की इच्छा से किए गए कार्य अभीष्ट नहीं हैं। हमारे पास जितनी समझ, समय, सामर्थ्य और सामग्री है, उन्हीं से हम दूसरों की सेवा करें तो वह सेवा लोकहितकारी होगी। परहित के लिए किए गए कर्मों को लोकसंग्रह कहते हैं। गीता में स्पष्ट कहा गया है कि आसक्ति रहित होकर लोक संग्रह को ध्यान में रखकर किए गए कर्म से ही व्यक्ति की संसिद्धि होती है।

गीता में सर्वभूत-हित को सर्वोच्च आदर्श माना गया है। जो व्यक्ति समस्त भूतों (जीवों) के हित में रत है वही ईश्वर को या मुक्ति को प्राप्त होता है। सर्वभूत-हित के लिए ज्ञानी व्यक्ति को अनासक्त होकर कार्य करना चाहिए। आसक्ति रहित एवं हेतु रहित होकर समस्त जीवों के प्रति अहिंसा, अक्रोध, अद्रोह, करुणा, सत्य, सद्भावना, परोपकार आदि का पालन करने से मनुष्य में देवत्व के गुणों का आगमन होता है। इन्हें ही गीता में ‘दैवी सम्पदा’ के लक्षण कहा गया है। ‘दैवी सम्पदा’ देवतुल्य पुरुष के गुण या ईश्वरीय गुणों को कहते हैं जिनके अभ्यास से व्यक्ति परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

स्वधर्म का पालन

सामाजिक कल्याण को महत्व देते हुए गीता में स्वधर्म के पालन पर बल दिया गया है। स्वधर्म को वर्ण-धर्म के रूप में लिया गया है। अपने-अपने वर्ण के अनुसार कर्म करना वर्णधर्म है। यहां ध्यान देने की बात है कि गीता के अनुसार वर्ण-धर्म व्यक्ति पर थोपे गए कर्तव्य नहीं हैं। चार वर्णों की रचना व्यक्तियों के गुणों और कर्मों के अनुसार की गई है (चातुर्वर्ण्य मया सृष्टया गुण कर्म विभागश:)।

इसलिए स्वधर्म या वर्ण धर्म व्यक्ति के स्वभाविक नियत कर्म हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का विभाजन गुण और कर्म के अनुसार किया गया है। प्रत्येक वर्ण के सदस्य को अपने वर्ण के लिए निर्धारित कर्म का फल की आशा से रहित होकर पालन करना आवश्यक है अन्यथा वह कर्त्तव्य पथ से विचलित माना जाएगा। स्वधर्म के पालन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

गीता में स्वधर्म की श्रेष्ठता को स्वीकार किया गया है। आकर्षक परधर्म से गुण रहित लगने वाला स्वधर्म श्रेष्ठ है। स्वभाव से नियत कर्म करने वाला मनुष्य पाप का भागी नहीं होता। गीता का यह आदेश है कि दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए। जैसे अग्नि स्वभाविक रूप से धुएं से ढकी हुई रहती है वैसे ही कर्म किसी न किसी दोष से आवृत्त होते हैं। प्रत्येक कर्म के दोष से आवृत्त होने के बाद भी आसक्ति रहित कर्म करने वाला व्यक्ति नैष्कर्म्य को प्राप्त होता है।

यदि व्यक्ति स्वधर्म का पालन करने में युद्ध में मारा भी जाता है तो भी उसे गीता में कल्याणकारी माना गया है। आधुनिक ब्रिटिश दार्शनिक ब्रैडले के द्वारा प्रस्तुत “मेरा स्थान और उससे संबंधित कर्त्तव्य” की धारणा कुछ इसी प्रकार की है। यदि व्यक्ति समाज में अपनी प्रस्थिति के अनुरूप कर्त्तव्य का पालन करता है तो सामाजिक कल्याण के साथ-साथ स्व हित भी करता है।

कर्म, अकर्म और विकर्म

गीता के अनुसार कर्मों के त्याग को अकर्म कहते हैं। स्वधर्म या नियत कर्म को करना साध्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। नियत कर्मों का त्याग उचित नहीं है और समस्त कर्मों का त्याग तो संभव भी नहीं है। कर्म तो करना ही होगा। हम केवल कर्मफल का त्याग कर सकते हैं। परंतु कुछ कर्म निषिद्ध माने जाते हैं। कर्मों का निषिद्ध या विहित होने का निर्धारण देश, काल, वर्ण, आयु आदि पर निर्भर है। निषिद्ध कर्मों को जो बिना आसक्ति के किए नहीं जा सकते और जो इसलिए बंधनकारक होते हैं विकर्म कहते हैं। हत्या,झूठ बोलना, व्यभिचार आदि विकर्म के उदाहरण हैं।

इस तरह गीता के अनुसार कर्मों के त्याग अर्थात् अकर्म की तुलना में कर्म श्रेयस्कर है। जीवित रहते कर्मों का त्याग असंभव है। इसलिए गीता में फल की आकांक्षा को त्याग कर नियत या विहित कर्म को करने का उपदेश दिया गया है। कर्म तो करना ही पड़ेगा लेकिन उसमें अहंता का, कर्त्तापन का भाव नहीं होना चाहिए।

स्थितप्रज्ञता

हम अपने कर्मों में निष्कामभाव को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अनासक्त होकर कार्य कैसे किया जा सकता है? नैष्कर्म्य (निष्काम कर्म) व्यक्ति से दृढ़ मानसिक स्थिति की मांग करता है। हम अपनी बुद्धि को स्थिर रख कर ही निष्काम कर्म कर सकते हैं। सामान्य व्यक्ति की बुद्धि विभिन्न इच्छाओं के प्रति आकर्षित होती रहती है। उसकी इन्द्रियां अपने विषयों में भटकती रहती हैं। इसके विपरीत जो स्थितप्रज्ञ है वह सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर आत्म-तुष्ट रहता है। जो दुख में मन से उद्विग्न नहीं होता, सुख के लिए लगाव नहीं रखता और राग, भय एवं क्रोध से परे होता है, ऐसे व्यक्ति को मुनि जन ‘स्थितधी’ या ‘स्थितप्रज्ञ’ कहते हैं।

दुखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगत स्पृह:।

वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।

-2/56

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति शुभ वस्तुओं की प्राप्ति पर आनंदित नहीं होता और अशुभ वस्तु की उपलब्धि पर द्वेष नहीं करता। “नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।” 2/57।।

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपनी खोल में समेट लेता है उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ अपनी इंद्रियों को अपने विषयों से समेट कर अपने वश में कर लेता है।

संक्षेप में जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में कर के बिना कामनाओं के, कर्त्तापन के भाव से रहित होकर कर्म करता है, उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

समत्व

स्थितप्रज्ञता को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? समत्व की भावना से व्यक्ति की बुद्धि स्थिर होती है। यह योगी की स्थिति है। चित्त की वृत्तियों के निरोध से समत्व की भावना आती है। समत्व दृष्टि का व्यक्ति लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुख, सिद्धि-असिद्धि को समान समझता है इसलिए कोई भी कर्म और उसके परिणाम कर्मयोगी को विचलित नहीं कर सकते क्योंकि उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

निष्कर्ष

गीता के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति मानव जीवन का परम लक्ष्य है। कर्मों का स्वभाव बन्धन कारक होता है। परंतु कर्म करना भी अनिवार्य है। कोई भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। परंतु वे ही कर्म बन्धन कारक होते हैं जो परिणाम के प्रति आसक्ति से किए जाते हैं। फल की कामना से किये गये कर्म व्यक्ति को बंधन में बांधते हैं लेकिन जो कर्म निजी लाभ हानि से ऊपर उठकर सामाजिक या सार्वत्रिक कल्याण की भावना से किए जाते हैं वे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

इसलिए कर्त्तापन को त्याग कर फल की इच्छा के बिना कर्म करना चाहिए। जिनकी बुद्धि स्थिर हो गई है, जो सुख दुःख से ऊपर हो गये हैं, ऐसे समत्व दृष्टि वाले व्यक्ति आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा लोककल्याण के लिए कार्य करते हुए निष्काम भाव को प्राप्त करते हैं।

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