गुप्त कालीन व्यापार और वाणिज्य

गुप्त कालीन व्यापार और वाणिज्य में कुषाण काल की तुलना में गिरावट के लक्षण मिलते हैं। आंतरिक व्यापार के अंतर्गत ग्राम लगभग आत्मनिर्भर उत्पादक इकाई के रूप में उभरकर सामने आ रहे थे। फाहियान ने लिखा है कि साधारण जनता वस्तुओं की अदला-बदली अथवा कौड़ियों से काम चलाती थी।


विदेश व्यापार

रोमन साम्राज्य के विघटन के पश्चात पश्चिमी देशों से हो रहे व्यापार में गिरावट आयी। फारस वासियों ने रेशम के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया जिससे भारतीय व्यापार को क्षति पहुंची। भारत-चीन के बीच व्यापार वस्तु-विनिमय पर आधारित था। भारतीय वस्तुओं के बदले चीन से रेशम प्राप्त किया जाता था। 550 ईस्वी के लगभग पूर्वी रोमन साम्राज्य के लोगों ने चीन वासियों से रेशम पैदा करने की कला सीख ली जिससे भारत के निर्यात व्यापार पर बुरा असर पड़ा।

ताम्रलिप्ति बंदरगाह से गुप्त नरेश दक्षिण पूर्वी एशिया से व्यापारिक संपर्क स्थापित करते थे। मौर्य काल में समुद्री व्यापार के लिए ऋण पर असंगत रूप से ऊंची ब्याज दर वसूलने की प्रथा अब समाप्त हो गई थी। इस काल में अरब, ईरान और बैक्ट्रिया से घोड़ों का आयात बढ़ गया था। पाटलिपुत्र के स्थान पर उज्जैन का महत्व बढ़ गया था। गुप्त राजाओं ने सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएं जारी की जो उनके अभिलेखों में दिनार कही गई हैं। यद्यपि परिवर्ती कालीन गुप्त मुद्राओं का वजन बढ़ता गया किंतु उनमें सोने का अंश गिरता गया। भारतीय जलयान अरब सागर, हिंद महासागर और चीन सागर की नियमित यात्राएं करने लगे थे। गुप्त साम्राज्य पूर्व और पश्चिम दोनों समुद्रों का स्पर्श करता था इसलिए स्थान और जल दोनों का व्यापार उन्नत था। निगम और श्रेणी के द्वारा आर्थिक जीवन का संचालन होता था। श्रेणियों का संघ भी होता था। निगम बैंकों का कार्य करते थे। मंदसौर लेख से पता चलता है की ढरापुर में जुलाहों की एक श्रेणी थी जिसने सूर्य मंदिर बनवाई थी।

विदेश व्यापार में गिरावट आई लेकिन व्यापार संतुलन अनुकूल था। रोमन सिक्के भारत आते थे। चीन से रेशमी धागे आते थे जिनसे भारत में महीन वस्त्र बनाया जाता था। पाटलिपुत्र, वैशाली, उज्जैन, भड़ौच प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे।

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आयात

विदेशों से आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में घोड़ा, सोना, मूंगा, खजूर, रेशम के धागे, नमक आदि होते थे।

निर्यात

निर्यात की जाने वस्तुओं में रेशमी वस्त्र, ऊन, मलमल, महीन कपड़े, माणिक, मोती, मयूर पंख , हीरे, हाथीदांत, सुगंधित द्रव्य और मसाले प्रमुख थे। लोहा भी भारत से भेजा जाता था। इस समय भारत में अच्छे जलपोतों का निर्माण भी होता था।


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