गुप्तकाल की सांस्कृतिक उपलब्धियां

गुप्तकाल की सांस्कृतिक उपलब्धियां

भारत के सांस्कृतिक इतिहास में गुप्त वंश का बहुत महत्व है। गुप्त सम्राट ब्राह्मण धर्म के भागवत सम्प्रदाय को मानने वाले थे तथा विष्णु और उसके अवतारों के उपासक थे। समुद्रगुप्त तथा कुमारगुप्त प्रथम ने तो अश्वमेध यज्ञ भी किया था। उन्होंने बौद्ध धर्म और जैन धर्म को भी प्रश्रय दिया।

चंद्रगुप्त के समय चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था। उसके विवरणों से पता चलता है कि गुप्त साम्राज्य सुशासित था। हल्के दंड की व्यवस्था के बावजूद अपराध बहुत कम होते थे। कर भार बहुत कम था। राजकाज की भाषा संस्कृत थी। साहित्य की प्रत्येक विधा में संस्कृत ने बहुत उच्च स्थान ग्रहण कर रखा था। विश्वविख्यात नाटक अभिज्ञानशाकुंतलम तथा रघुवंश महाकाव्य के रचयिता कालिदास मृच्छकटिकम नाटक के लेखक शूद्रक, मुद्राराक्षस नाटक के लेखक विशाखदत्त तथा सुविख्यात कोशकार अमर सिंह गुप्त काल में ही हुए। रामायण, महाभारत, वायु पुराण तथा मनु स्मृति अपने वर्तमान रूप में गुप्त काल में ही आए।

महान गणितज्ञ आर्यभट्ट (जन्म 476 ईसवी), वराह मिहिर (505 से 587 ईसवी) तथा ब्रह्मगुप्त (598 ईसवी) ने गणित तथा ज्योतिर्विज्ञान के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया। इसी काल में दशमलव प्रणाली का यहां अविष्कार हुआ जो बाद में अरबों के माध्यम से यूरोप तक पहुंचा। व्यवहारिक ज्ञान के क्षेत्र में यह विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन मानी जाती है। उस काल में वास्तुकला, चित्रकला तथा धातु विज्ञान के प्रमाण झांसी, कानपुर के गुप्तकालीन अवशेषों, अजंता की गुफा नंबर 16, 17 की चित्रकारी, महरौली दिल्ली में स्थित राजा चंद्र का लौहस्तंभ, नालंदा में स्थित 80 फुट ऊंची बुद्ध की मूर्ति तथा सुल्तान गंज स्थित साढ़े सात फीट फुट ऊंची बुद्ध की तांबे की प्रतिमा से मिलते हैं।

मंदिर

गुप्त काल में मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ, इसका विकास बाद में हुआ। यही कारण है कि जहां गुप्तकालीन विहार और मठ आज भी विद्यमान है हिंदू मंदिरों के अवशेष अधिक संख्या में प्राप्त नहीं होते। गुप्त काल की जो मंदिर आज भी विद्यमान हैं वे हैं सांची, लधखान, देवगढ़, भीतरगांव, तिगवा, भूमरा, भीतरी। तथा नालंदा का बौद्ध विहार भी प्रारंभ में ईंटों का बना था। इस युग के मंदिरों के निर्माण में छोटी-छोटी ईंटों अथवा पत्थर का उपयोग किया जाता था।

गुप्त काल की आकर्षक और भव्य मंदिर निर्माण कला का सबसे अच्छा उदाहरण देवगढ़ (झांसी) का खंडित विष्णु मंदिर है।


  • जबलपुर मध्यप्रदेश में तिगवा का विष्णु मंदिर।
  • नागौद (मध्यप्रदेश) में भूमरा का शिव मंदिर।
  • नागौद (मध्यप्रदेश) में खोह का शिव मंदिर।
  • नचना कुठार (मध्य प्रदेश) का पार्वती मंदिर।
  • महासमुंद (छत्तीसगढ़) में सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर।
  • एहोल के लाडखान का मंदिर, दर्श का मंदिर।
  • विदिशा के पास उदयगिरी का विष्णु मंदिर।
  • देवगढ़ में 12 मीटर ऊंचा शिखर है जो भारतीय मन्दिर निर्माण में पहला शिखर है।
  • कानपुर के पास भीतरगांव का मंदिर पूरी तरह ईंटों से बना है।

भीतरगांव के नमूने पर सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर है। तिगवा का विष्णु मंदिर ईटो से बना है। गुप्तकाल काल का सबसे पुराना मंदिर सांची के चैत्य सभा कक्ष के बाए खड़ा है।

इसी समय सारनाथ के धामदेव स्तूप का निर्माण हुआ। यह ईंटों का बना है। ब्राह्मण गुफा मंदिरों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण उदयगिरि का मंदिर है इसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के सेनापति ने बनवाया था। अजंता की गुफा नंबर 16, 17, 19 गुप्त कालीन मानी गई है। ये अलंकृत हैं। गुफा संख्या 19 में बौद्ध स्तूप है जिस पर बुद्ध एवं बोधिसत्व की प्रतिमाएं हैं। बाघ की गुफाओं में भी बौद्ध धर्म से संबंधित चित्रकारी मिलती है।

मूर्ति कला

गुप्तकाल की मूर्ति कला में मुख्यता विष्णु के अवतारों की प्रतिमा ही बनाई गई है। सारनाथ की कला पर गांधार कला का प्रभाव नहीं है। धर्म चक्र प्रवर्तन की मुद्रा में बुद्ध की मूर्ति यहीं पर है।

चित्रकला

गुप्त काल के चित्रों के अवशेषों को बाघ की गुफाएं, अजंता की गुफाएं एवं बादामी की गुफाओं में देखा जा सकता है। अजंता के चित्रों के तीन विषय हैं पहला प्राकृतिक दृश्य, दूसरा बुद्ध और बोधिसत्व, तीसरा जातक कथाएं। बाघ की गुफाओं का सबसे प्रसिद्ध चित्र संगीत और नृत्य का एक दृश्य है। बाघ की गुफाएं भी बौद्ध हैं क्योंकि इनमें विहार, चैत्य, स्तूप और सभागृह हैं।

साहित्य

गुप्तकाल में रामायण व महाभारत को अंतिम रुप दिया गया।

नारद, कात्यायन, पाराशर, बृहस्पति की स्मृतियों की रचना हुई।

कालिदास के काव्य ग्रंथ हैं :- ऋतुसंहार, मेघदूत, कुमारसंभव रघुवंश। नाटक हैं :- अभिज्ञान शाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्र।

शूद्रक का मृच्छकटिकम् एकमात्र दुखांत नाटक है। विशाखदत्त का मुद्राराक्षस एवं देवीचंद्रगुप्तम नाटक हैं।

अमरकोश के रचयिता अमर सिंह भी इसी समय हुए। चंद्रग्रोभी ने चंद्र व्याकरण लिखा।

बुद्धघोष का विशुद्धमग्ग विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ है।

जैन विद्वान सिद्धसेन ने न्यायावतार लिखा।

वसुबंध ने अभिधम्मकोष की रचना की।

गणित और खगोल विज्ञान

आर्यभट्टीयम का लेखक आर्यभट्ट पांचवी शताब्दी में हुआ। उसने पहली बार यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। इन्हीं के प्रयास से ज्योतिष का गणित से अलग शाखा के रूप में विकास हुआ। उन्होंने सर्वप्रथम दशमलव गणना पद्धति का प्रयोग किया लेकिन वह इस के आविष्कारक नहीं थे। आर्यभट्ट के सिद्धांतों पर भास्कर प्रथम 600 इसवी ने टीकाएं लिखीं। यह ब्रह्मगुप्त का समकालीन थे और खगोल शास्त्री थे। उसके तीन ग्रंथ है महा भास्कराचार्य, लघु भाष्कराचार्य और भाष्य।

ब्रह्म गुप्त 598 ईसवी ने ब्रह्मस्फुट सिद्धांत की रचना की।

वराह मिहिर ने पंचसिद्धांतिका की रचना की जिसमें खगोल विज्ञान के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया है। रोमक सिद्धांत और पौलिश सिद्धांत इनके दो प्रसिद्ध सिद्धांत हैं। इसके अलावा वृहत्संहिता, ब्रह्म जातक, लघु जातक की भी रचना वराहमिहिर ने की।

आयुर्वेद और चिकित्सा

छठी शताब्दी में वाग्भट्ट आयुर्वेद ग्रंथ अष्टांग हृदय की रचना की। चंद्रगुप्त द्वितीय के दरबार में धनवंतरी था। नवनीतकम नामक आयुर्वेद ग्रंथ की रचना इसी समय हुई। कायाकल्प नामक पशु चिकित्सक ने हस्त्यायुर्वेद की रचना की।

धातु विज्ञान

बौद्ध विद्वान नागार्जुन रसायन और धातु विज्ञान का विद्वान था। बिहार के सुल्तानगंज में से प्राप्त बुद्ध की खड़ी हुई तांबे की प्रतिमा है जो अब बर्मिंघम संग्रहालय में है। मेहरौली में स्थित चंद्र नामक राजा का लौह स्तंभ भी तत्कालीन धातु विज्ञान का उत्कृष्ट निदर्शन है।

इन उपलब्धियों के कारण गुप्त काल को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग भी कहा गया है।

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