गुप्त कालीन सामाजिक दशा

गुप्त कालीन सामाजिक दशा

गुप्तकाल में समाज का चार वर्णों में विभाजन पहले से कठोर हो गया। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों में समाज का विभाजन वैदिक काल में ही हो गया था। इस विभाजन का आधार गुण और कर्म था। लेकिन गुप्त काल में वर्ण व्यवस्था जन्म पर आधारित हो चली।

स्त्रियों की दशा

गुप्त काल में स्त्रियों की दशा में लगातार गिरावट आई। सभी स्मृतिकारों ने बाल-विवाह पर जोर दिया। विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। उन्हें ब्रह्मचर्य के कठोर नियमों का पालन करते हुए पुत्र के नियंत्रण में रहना पड़ता था। पहला सती स्मारक ऐरण, मध्य प्रदेश में भानु गुप्त का है। इसका समय 510 ई है। इस प्रकार चाहे उच्च वर्ग तक सीमित ही क्यों न हो लेकिन सती प्रथा की शुरुआत गुप्त काल में हुई थी।

समाज में वेश्याओं को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। नागरिक जीवन में उनका भी अपना स्थान था। कालिदास ने विदिशा की गणिकाओं के साथ नारीभक्त तरुणों की प्रेमलीला का वर्णन किया है। मंदिरों में देवदासी रखने की प्रथा थी। देवदासी प्रथा का प्रचलन मौर्यों के समय में ही हो चुका था। वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के रामगढ़ की पहाड़ी के एक गुफा लेख में सुतनता नामक देवदासी का उल्लेख है।

निजी संपत्ति की प्रबल धारणाओं पर आधारित पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष द्वारा नारी निजी संपत्ति मान ली गई थी। स्त्रियों के संपत्ति संबंधी अधिकारों के विषय में याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि पुत्र के अभाव में पुरुष की संपत्ति पर उसकी पत्नी का सर्वप्रथम अधिकार होगा।


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सामाजिक विभाजन

अनेक नयी जातियों की उत्पत्ति होने से वर्ण व्यवस्था ढीली पड़ गई। भारत में बड़ी संख्या में प्रवेश करने वाले हूण क्षत्रियों की श्रेणी में आ गए। बाद में गुर्जर भी राजपूत के रूप में शामिल हो गए। इस तरह संख्या की दृष्टि से क्षत्रिय जाति की वृद्धि हुई। जंगलों में रहने वाली जनजातियों को स्थिर वर्ण समाज में आत्मसात कर लिया गया, जिससे शूद्रों और अछूतों की संख्या बढ़ गई।

भूमि हस्तांतरण अथवा भूमि राजस्व की प्रथा से कायस्थ (लिपिकों) के रूप में एक नई जाति का जन्म हुआ। कायस्थों ने ब्राम्हणों के लेखन संबंधी एकाधिकार को समाप्त कर दिया। कायस्थों का सर्वप्रथम उल्लेख याज्ञवल्क्य किया है।

उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गांव के सरदारों और मुखियों की एक नई श्रेणी उभरकर आई जो महत्तर कहलाने थे। उन्हें जमीन की अदला-बदली की सूचना दी जाती थी।

विभिन्न जाति के लिए सूद या ब्याज की अलग-अलग दरें निर्धारित थी। कानूनी मामलों में भी वर्णभेद को मान्यता दी गई। विधि-ग्रंथों में लिखा है कि ब्राह्मणों के साथ नरमी बरती जानी चाहिए और क्षत्रियों के लिए आग का, वैश्यों के लिए जल का तथा शूद्रों के लिए विष का प्रयोग किया जाना चाहिए। उत्तराधिकार के कानून भी सबके लिए समान नहीं थे। किसी उच्च वर्ण के परिवार में जन्म लेने वाले शूद्रा-पुत्र को सबसे कम हिस्सा मिलता था। बृहस्पति ने कहा कि किसी शूद्र महिला के गर्भ से पैदा होने वाले द्विज पुत्र के लिए पैतृक संपत्ति का कोई भी अधिकार नहीं है।

चांडाल जाति की संख्या में वृद्धि हुई जो 5 वीं ईस्वी में प्रकट हुए थे। शूद्रों और अछूतों में विभिन्नता थी।

इसी समय कुछ विशेष व्यवसाय में लगे लोगों के जन्म पर आधारित समूहों को अस्पृश्य या अछूत मानने की प्रवृत्ति शुरू हुई। इन्हें शूद्रों से भी बदतर माना गया तथा पंचम वर्ण में स्थान दिया गया। इस प्रकार इन्हें वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया। शेष समाज से इनकी अंत:क्रिया को कठोर प्रतिबंधों के द्वारा सीमित कर दिया गया।

वर्ण व्यवस्था को विरोध का भी सामना करना पड़ा। महाभारत के अनुशासन पर्व में शूद्रों को राजा का संहारक कहा गया है ।

अनेक वर्णसंकर जातियों का भी उल्लेख मिलता है। ब्राह्मण पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान अंबष्ट, वैश्य पुरुष और शूद्र स्त्री की संतान उग्र, क्षत्रिय पुरुष और शूद्र स्त्री की संतान भी उग्र मानी है। ब्राह्मण पिता और शुद्ध स्त्री की संतान पारशव कही जाती थी।

गुप्तकाल में दास प्रथा कमजोर हो गई और दासमुक्ति के अनुष्ठान का विधान सर्वप्रथम नारद ने किया। लगभग 600 ईस्वी में रचित मनु स्मृति पर भारुचि की टीका में दासों की संपत्ति विषयक अधिकारों की भी पर्याप्त चर्चा है।

बंटवारे और धार्मिक भूमि दानों के फलस्वरुप भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गई थी। अतः छोटे कृषि क्षेत्र में स्थाई रूप से अधिक दास और मजदूर रखने की आवश्यकता नहीं थी। अतः दासों की छटनी करनी पड़ी। यह दास प्रथा कमजोर होने का मुख्य कारण था।

इस प्रकार संक्षेप में, गुप्त कालीन समाज में जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था पहले से कठोर हो गई। अनेक विदेशी और वनवासी समूहों का वर्ण व्यवस्था में विलय हुआ। कायस्थ नामक लिपिक जाति की उत्पत्ति इसी समय हुई। शूद्रों और महिलाओं की दशा गिरती चली गयी। विधवा-विवाह वर्जित हो गया। तथा कथित अछूत जातियों को वर्ण व्यवस्था से बाहर रखा गया।

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