जॉन डिवी का उपकरणवाद

जॉन डिवी का उपकरणवाद

जाॅन डिवी का उपकरणवाद अमेरिकी उपयोगितावाद की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्त है। उन्होंनेे इस विचारधारा का व्यवहारिक क्षेत्रों में सफल अनुप्रयोग किया। शिक्षा, शासन-प्रशासन आदि के क्षेत्र में उनका योगदान विश्वविख्यात है।

उपकरणवाद

डिवी के अनुसार हमारे विचार, सिद्धांत और अवधारणाएं कोरे बुद्धि विलास नहीं होते। इनका व्यवहारिक प्रयोजन होता है। हमारे विचार और ज्ञान व्यवहारिक जीवन की समस्याओं के समाधान के साधन या उपकरण ( इंस्ट्रुमेंट) होते हैं। इसलिए इनका मत उपकरणवाद कहलाता है।

दर्शन के क्षेत्र में तत्त्वमीमांसा का तथा विज्ञान के क्षेत्र में भौतिकी और जैव विकासवाद का डिवी के विचारों में स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। तत्त्वमीमांसा में अक्सर ऐसे परम सत् पर विचार किया जाता रहा है जो अनुभव से परे है, शाश्वत सत्य है। लेकिन डिवी ऐसे किसी भी पारमार्थिक सत्य को नकार देते हैं तथा एक ऐसे दर्शन को विकसित करते हैं जो विचार को अनुभव में आने वाली वास्तविकता के अनुरूप समस्याओं के समाधान के उद्देश्य की ओर अग्रसर करा सके।

डिवी के अनुसार सत्ता किन्हीं निश्चित गुणों की संहति नहीं है बल्कि किसी विषय-वस्तु के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप सत्ता का स्वरूप स्पष्ट होता है। इस प्रकार सत्ता परिवर्तनशील है।

डिवी पर सबसे अधिक प्रभाव जैविक उद्विकास के सिद्धांत ने डाला है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपने वातावरण से समायोजन की आवश्यकता के कारण जीवों का विकास होता है। नई परिस्थिति में नये तरह से समायोजन की जरूरत होती है। इससे जीवों में कुछ नये लक्षणों का उद्भव होते जाता है। मानव भी एक जीव ही है। हालांकि कि मनुष्य की जैविक मांगें अलग तरह की हैं, लेकिन हैं जैविक ही।

समायोजन के लिए जब विचारवान जीव की जरूरत पड़ी तब किसी कपि प्रजाति से उच्च स्तर के जीव के रूप में मनुष्य का विकास हुआ। हमारे विचार भी जैविक आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन हैं। विचारों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, अन्यथा विचार अवास्तविक और काल्पनिक बन सकते हैैं। अनुभव और उपयोगिता की अवहेलना होने के कारण ही तत्त्वमीमांसा के विचार काल्पनिक एवं अव्यवहारिक हो जाते हैं।

इस प्रकार डिवी ने माना है कि सत्ता अनुभवात्मक है। अनुभव से ही हमारे ज्ञान में वृद्धि होती है। लेकिन डिवी के यहां ज्ञान निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं है, जैसा लाक बर्कले आदि मानते थे। उपकरणवाद में ज्ञान सोद्देश्य और चयनात्मक होता है इसलिए सक्रिय है। मनुष्य सक्रिय होकर विचारवान होता है तथा अपने वातावरण की नई मांगों के अनुरूप समायोजन का प्रयत्न करता है।

हम विचार क्यों करते हैं? क्योंकि ऐसी परिस्थिति आ जाती है। परिस्थितियों से जुड़ने के अनेक पुराने तरीके हैं लेकिन नयी परिस्थिति में वे सब असफल हो जाते हैं। इसलिए हमें नये तरीके से सोचना पड़ता है। जब परिस्थितियां सामान्य होती हैं तो हम प्रतिक्रिया देने के स्थापित तरीकों से काम चला सकते हैं। लेकिन जब नई परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है तो दिन प्रतिदिन काम आने वाली स्थापित प्रतिक्रियाओं का प्रवाह थम जाता है। तब हम सोचने को मजबूर हो जाते हैं। नई जैविक मांगों के कारण नये विचार का उद्भव होता है। जब जूझने के पुराने ढर्रे असफल हो जाते हैं तब नये विचार उत्पन्न होते हैं।

अतः डिवी के अनुसार, कोई भी ज्ञान शुद्ध सैद्धांतिक ज्ञान नहीं होता, वह क्रिया-प्रतिक्रिया का माध्यम है, परिस्थितियों से समायोजन के उपकरण हैं। तो क्या गणितीय ज्ञान भी समायोजन के साधन हैं? बीजगणित के सूत्रों का कौन सा क्रिया-व्यवहार या व्यवहारिक प्रयोजन है? डिवी के अनुसार गणित की विभिन्न संक्रियाएं वास्तविक क्रिया व्यवहार के प्रतीकात्मक रूप हैं जो वास्तविक क्रिया व्यवहारों के संभावित परिणामों का अनुमान लगाने में सहायता करते हैं। डिवी का यह भी तर्क है कि हो सकता है कि गणित के सूत्रों को साधने वाला व्यक्ति भी इसके व्यवहारिक उपयोग से अनभिज्ञ हो लेकिन व्यवहारिक उपयोग के अज्ञान को उपयोगिता की कमी मानना अतार्किक है।

उपकरणवाद के कुछ व्यवहारिक अनुप्रयोग

डिवी ने अपने विचारों का व्यवहारिक क्षेत्रों में सफल अनुप्रयोग करके यह दिखाया है कि उनका दर्शन बहुत उपादेय है।

1. नया दार्शनिक दृष्टिकोण

डिवी ने दार्शनिक विचारों को व्यवहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्गठित करने की जरूरत पर बल दिया। आवश्यकताएं और समस्याएं बदलती रहती हैं इसलिए कोई भी विचार, कोई भी समाधान अंतिम नहीं होता। वैचारिक क्रियाशीलता जारी रहेगी, पुरानी की जगह नये विचार लेते रहेंगे।

2. दर्शन का सामाजिक संदर्भ

विचार और व्यवहार समस्याओं से समायोजन के उपकरण हैं। इस विचारधारा में जिन समस्याओं की बात होती हैं वे नितांत निजी न होकर सामाजिक होती हैं। क्रिया व्यवहार की प्रासंगिकता सामाजिक संदर्भ में है। वैसे तो मार्क्सवादियों ने भी दर्शनशास्र को सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक परिवर्तन का एक विचारधात्मक अस्त्र बनाया था। परंतु यहां एक खास अंतर है। मार्क्स संघर्ष के पुजारी थे। उनके यहां वर्ग संघर्ष अनिवार्य है।

लेकिन डिवी का जोर समायोजन पर है न कि संघर्ष पर। हालांकि कि संषर्ष या प्रतियोगिता के बाद भी समायोजन हो सकता है परंतु इन्हें टालने के लिए भी समायोजन किया जाता है। मार्क्स के मत में समझौते के लिए कोई स्थान नहीं है। मार्क्स ऐतिहासिक निर्धारणवाद के भी पैरोकार हैं। हम चाहें या न चाहें सामाजिक विकास का अगल चरण साम्यवादी समाज होगा। परंतु डिवी किसी पूर्व निर्धारितता को स्वीकार नहीं करते। वैसे भी वे लोकतंत्रात्मक जीवन पद्धति के सबसे बड़े पैरोकार हैं।

3. शिक्षा के क्षेत्र में अनुप्रयोग

डिवी ने अपने विचारों का सर्वाधिक सफल अनुप्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में किया। यदि विचार या ज्ञान क्रिया-व्यवहारों में संचित होता है तो सीखने का सबसे अच्छा तरीका है करके सीखना। डिवी का यह शिक्षण सिद्धांत बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में तो उनका यह विचार क्रांतिकारी साबित हुआ। चाहे शिक्षा प्रणाली कुछ भी हो करके सीखने के तरीके को सबसे अच्छा माना जाता है। इसमें बच्चों को समस्यात्मक परिस्थितियां दे दी जाती हैं, विद्यार्थी इनसे खेल खेल में जूझते हुए क्रिया-व्यवहार करके सीखते हैं।

4. रूढ़िवाद का विरोध

उपकरणवाद में परम सत्य और परम शुभ जैसी कोई वस्तु नहीं होती। सत् और शुभ की कसौटी भी अर्थ क्रियाकारित्व में है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप सत्य और शुभ का फिर-फिर निर्माण करता है। रूढ़ियां और परंपराएं वहीं तक ठीक हैं जहां तक ये उपयोगी हैं। लेकिन इनका अंततः बचाव नहीं किया जा सकता और करना भी जरूरी नहीं है।

5. लोकतंत्र का दर्शन

डिवी ने उपकरण वाद के आधार पर लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का महिमा मंडन किया है। यह सिर्फ एक शासन प्रणाली न होकर एक जीवन पद्धति है। यह समान अधिकारों और व्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती है। इसलिए उनका विचार है जीवन के हर क्षेत्र में लोकतांत्रिक व्यवस्था को महत्त्व एवं स्थान दिया जाना चाहिए। नीतियों के निर्माण के लिए उनका सुझाव है कि एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नीत बनाने समय किसी दूसरे लक्ष्य के फायदों को छोड़ा नहीं जाना चाहिए। इसी तरह उसने व्यक्ति की स्वतंत्रता को समानता और भाईचारे से संतुलित करके व्यवहारिक बनाने का भी सुझाव दिया है।

समीक्षा

जाॅन डिवी का उपकरणवाद अत्यंत सकारात्मक और रचनात्मक दर्शन है। यद्यपि डिवी ने तत्त्वमीमांसा के अनुभवातीत परम सत्य की धारणा को नकार दिया लेकिन वह अनुभव और व्यवहारिकता की बात अधिक करते हैं। इस संबंध में वह बुद्ध के अनुगामी प्रतीत होते हैं। जिस तरह बुद्ध ने तत्त्वमीमांसा के प्रश्नों से बचते हुए दुःख की समस्या पर ध्यान केंद्रित किया वैसे ही डिवी सक्रिय आनुभविकता पर जोर देते हुए जीवन के व्यवहारिक समस्यायों के समाधान के एक साधन या उपकरण के रूप में ज्ञान और विचार को समझाने का सफल प्रयत्न करते हैं।

इसीलिए डिवी, मूर की तरह तत्त्वमीमांसा के पीछे हाथ धोकर नहीं पड़ जाते। मूर ने प्रत्ययवाद के खंडन में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी थी लेकिन मूर इसी गंभीरता से सहज बुद्धि के समर्थन में काम नहीं कर सके। परंतु डिवी अपने व्यवहारिक दर्शन को जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक लागू कर पाते हैं।

डिवी ने किसी भी शाश्वत और कठोर सत्य को नकार दिया। उनके अनुसार ज्ञान की प्रक्रिया भी वातावरण से समायोजन का एक तरीका है। चूंकि परिस्थितियों की मांगों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। अतः सत्य शाश्वत न होकर सतत होता है। सत्य परिवर्तित होता रहता है। इसी तरह शुभ या कल्याणकारी वही है जो उपयोगी हो। उपयोगिता भी समय के अंतराल में बदलती रहती है इसलिए शुभ भी परिवर्तनशील होता है। इस संबंध में भी डिवी बुद्ध के निकट है। ज्ञान क्रिया-व्यवहार की उपलब्धि है। बुद्ध के यहां भी आत्म की सत्ता स्थायी नहीं होकर चेतना का अनवरत प्रवाह है। निरंतर संभवन की स्थिति है।

डिवी के विचारों के केंद्र में मानव है। सार्त्र ने भी तो अस्तित्ववान मनुष्य को अपनी विचारधारा के केंद्र में लिया था। परंतु डिवी का व्यक्ति सामाजिक मानव है जिसकी समस्याएं अस्तित्वजनित अमूर्त और अहंकेंद्रित व्यक्ति की निजी समस्याएं न होकर सामाजिक परिस्थितियों से उत्पन्न वास्तविक समस्याएं हैं जिनके समाधान के तरीकों की सामाजिक उपयोगिता भी है। डिवी के यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता समानता और भाईचारे की भावना से संतुलित है।

दर्शन के सामाजिक-व्यवहारिक सरोकार पर तो मार्क्स ने भी बल दिया था लेकिन वह संघर्ष को प्रमुख मानते हैं। परंतु डिवी ने समायोजन पर जोर दिया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि डिवी का दर्शन पूरी तरह से व्यवहारिक है। उसने स्वयं इसे जीवन के विविध क्षेत्रों में लागू करके दिखाया है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को दुनिया के हर भाग में पर्याप्त महत्व दिया गया है।

हमारे संविधान का दर्शन भी डिवी के लोकतंत्र से संबंधित विचारों से प्रभावित है। डिवी की यह सोच थी कि हम एक लक्ष्य को पाने के लिए दूसरे लक्ष्य को पाने की आशा को समाप्त नहीं कर सकते। इसी के अनुरूप संविधान में पिछड़ों और दलितों के लिए प्रावधान करते समय भाईचारे की भावना को भी अक्षुण्ण रखा गया है।

इस प्रकार डिवी का दर्शन सदा-सदा प्रासंगिक रहेगा क्योंकि यह व्यवहारिक है, क्योंकि इसमें सत्य और शुभ परिस्थितियों से परिभाषित हैं।

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