पल्लव वंश

पल्लव वंश : पल्लवों का राजनीतिक इतिहास

आरंभ में पल्लव सातवाहनों के अधीनस्थ थे परंतु बाद में उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली तथा दक्षिण भारत की राजनीति में अपना विशेष स्थान बना लिया।

सिंहविष्णु

पल्लवों का पहला प्रमुख राजा सिंहविष्णु (575 से 600ई०) था। उसने अवनीसिंह की उपाधि धारण की। वह एक वीर और पराक्रमी राजा था। उसने चोल, मलय, कलभ्र, मालव और सिंहल के राजा तथा केरल को युद्ध में पराजित किया। उसने अपने राज्य की सीमा को कावेरी नदी तक विस्तृत कर लिया। उसकी सत्ता तमिल प्रदेश पर पूरी तरह स्थापित हो गयी। उसने कला और साहित्य के विकास को भी बढ़ावा दिया। किरातार्जुनीय के रचयिता प्रसिद्ध महाकवि भारवि उसी के समय में हुआ।

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महेंद्रवर्मन प्रथम

पल्लव वंश का दूसरा महान शासक महेंद्रवर्मन प्रथम (600-630ई०) था। वह युद्ध और शांति दोनों में निपुण था। महेंद्र वर्मन के समय में पल्लव-चालुक्य संघर्ष आरंभ हुआ। चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय ने आक्रमण करके महेंद्र वर्मन के राज्य के उत्तरी भाग पर कब्जा कर लिया। लेकिन महेंद्र वर्मन ने चालुक्यों को पराजित कर दिया एवं पुल्लुर पर विजय प्राप्त कर ली। महेंद्र वर्मन ने कला और साहित्य और संरक्षण प्रदान किया। उसने मत्तविलास प्रहसन की भी रचना की। आरंभ में उसकी अभिरुचि जैन धर्म में थी लेकिन वह बाद में शैवमतावलंबी हो गया।

नरसिंह वर्मन ‘महामल्ल’ (630-668 ई०)

नरसिंह वर्मन प्रथम ‘महामल्ल’ ने वातापीकोंड की उपाधि धारण की। उसने विरासत में मिले पल्लव राज्य को स्थायित्व प्रदान किया। चोल, पांड्य, चेर और कदम्ब शासकों को पराजित किया। सिंहल के राजा मानवर्मा को गद्दी प्राप्त करने में सहायता प्रदान की। नरसिंह वर्मन प्रथम महामल्ल का चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के साथ भी संघर्ष हुआ। आरंभ में पल्लव शासक पराजित हुआ, परंतु उसने हार नहीं मानी। कांची के निकट हुए युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय को उसने पराजित कर उसने चालुक्यों की राजधानी वातापी पर भी आक्रमण कर दिया। इसी युद्ध में पुलकेशिन द्वितीय मारा गया और पल्लवों की राजनीतिक श्रेष्ठता स्थापित हो गयी। नरसिंह वर्मन के समय ही 641 ई० में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांची गया था।

महेंद्र वर्मन द्वितीय (668-670ई०)

इसके संक्षिप्त राज्यकाल में कोई विशेष घटना नहीं हुई।

परमेश्वर वर्मन प्रथम (670-695ई०)

इसने पेरुवालत्रलूर के युद्ध में चालुक्य राजा विक्रमादित्य को निर्णायक रूप से हरा कर भागने को मजबूर कर दिया।

नरसिंह वर्मन द्वितीय ‘राजसिंह’ (695-720ई०)

नरसिंह वर्मन द्वितीय का शासनकाल सुख समृद्धि और शांति का युग था। उसने अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। संस्कृत के महान साहित्यकार दंडिन उसी के दरबार में रहता था। उसने व्यापारिक संबंधों को विकसित करने के उद्देश्य से एक दूत मंडल को चीन भेजा।

परमेश्वर वर्मन द्वितीय (720-731ई०)

राजसिंह के बाद चालुक्य-पल्लव संघर्ष एक बार फिर शुरू हुआ। चालुक्य राजकुमार विक्रमादित्य द्वितीय ने गंग शासकों की सहायता से कांची पर आक्रमण कर दिया। अतः उसे चालुक्यों से समझौता करना पड़ा। गंग शासकों ने परमेश्वर वर्मन द्वितीय को युद्ध में पराजित कर मार डाला।

नंदिवर्मन द्वितीय (731-795ई०)

परमेश्वर वर्मन द्वितीय की मृत्यु के बाद गद्दी के अनेक दावेदार उठ खड़े हुए। अब राजसत्ता पल्लवों की दूसरी शाखा (सिंहविष्णु के भाई भीम के वंशजों) के हाथों में चली गई। इस वंश का प्रथम शासक नंदिवर्मन द्वितीय था। उसे चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय तथा राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग के आक्रमणों का सामना करना पड़ा। पांड्यों से भी उसका युद्ध हुआ। यद्यपि नंदिवर्मन ने बल्लभ, कलभ्र, केरल आदि राज्यों पर विजय पाई, लेकिन वह पांड्यों से पराजित हो गया। नंदिवर्मन ने अनेक पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा नये मंदिरों का निर्माण भी कराया। उसके द्वारा बनाए गए मंदिरों में सबसे प्रमुख मंदिर बैकुंफपेरुमाल का मंदिर है।

दंतिवर्मन (796-847ई०) को भी राष्ट्रकूटों के आक्रमण का सामना करना पड़ा। गोविन्द तृतीय राष्ट्रकूट ने पल्लव राजधानी कांची पर आक्रमण कर इसे लूटा।

नंदिवर्मन तृतीय (847-869ई०) के समय तक पांड्य बहुत अधिक शक्तिशाली हो चुके थे। अपनी सुरक्षा के लिए पल्लव राजा ने राष्ट्रकूटों, गंगों और चोलों की सहायता से पांड्यों पर आक्रमण किया लेकिन सफल नहीं हो पाया।

नृपतुंग (870-878ई०) नंदिवर्मन तृतीय का उत्तराधिकारी था जिसे अपराजित वर्मन ने गंगों और चोलों की सहायता से गद्दी से हटाकर खुद सत्ता हथिया लिया।

अपराजित वर्मन (878-897ई०) को चोल राजा आदित्य प्रथम ने 897 में पराजित कर पल्लव राज्य पर अधिकार कर लिया इसके साथ ही पल्लव राजवंश का शासन समाप्त हो गया।

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