भारतीय दर्शन की प्रमुख पद्धतियां : संक्षेप में

भारतीय दर्शन के प्रमुख पद्धतियां

चार्वाक दर्शन

लोकायत के रूप में प्रसिद्ध इस भौतिकवादी दर्शन की स्थापना ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आसपास चार्वाक द्वारा की गई। इसके अनुसार ईश्वर का अस्तित्व नहीं है।


सांख्य दर्शन

सांख्य दर्शन की व्युत्पत्ति संख्या शब्द से हुई है। भौतिक दर्शन का अस्तित्व सर्वप्रथम हम सांख्य दर्शन में ही पाते हैं। इस दर्शन के संस्थापक कपिल, 500 ईसा पूर्व के लगभग उत्पन्न हुए थे। सांख्य दर्शन में ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना गया है। इसके अनुसार आत्म ज्ञान के साधन प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द हैं। इस दर्शन के अनुसार सृष्टि ईश्वर ने नहीं अपितु ‘प्रकृति’ ने रची है तथा संसार और मानव जीवन की निर्मात्री स्वयं प्रकृती है। चौथी सदी में ‘प्रकृति’ के अतिरिक्त इसमें ‘पुरुष’ नामक एक उपादान और जुड़ गया और यह दर्शन अध्यात्मिकता की ओर मुड़ गया।

योग दर्शन

पतंजलि (योगसूत्र) द्वारा प्रवर्तित इस दर्शन के अंतर्गत मोक्ष, ध्यान और शारीरिक व्यायाम तथा प्राणायाम (श्वास) सुझाए गए हैं। ऐसा करने से चित्त का सांसारिक मोह दूर हो जाता है और उसमें एकाग्रता आती है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि प्राचीन समय में इनसे शरीर-क्रिया और शरीर-रचना संबंधी ज्ञान के विकास का पता चलता है। इसमें समस्याओं से पलायन की प्रवृत्ति भी परिलक्षित होती है।

न्याय दर्शन

प्रथम शती ईसवी में ‘गौतम’ द्वारा प्रवर्तित इस दर्शन में न्याय या विश्लेषण मार्ग का विकास तर्कशास्त्र के रूप में हुआ है। इसके अनुसार भी मोक्ष, ज्ञान की प्राप्ति से होता है। इस दर्शन में तर्क के प्रयोग का जो महत्व प्रतिपादित हुआ, उससे भारतीय विद्वान तार्किक पद्धति से सोचने और बहस करने की ओर अग्रसर हुए।

पूर्व मीमांसा

जैमिनी (पूर्व मीमांसा) द्वारा प्रवर्तित इस दर्शन में मीमांसा का तात्पर्य है- तर्क करने और अर्थ लगाने की कला। इसके अनुसार वेद में कही गई बातें सत्य हैं। तर्क द्वारा इसमें वैदिक कर्मों के अनुष्ठान केऔचित्य को सिद्ध किया गया है। इस दर्शन का मुख्य लक्ष्य स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति है, जिसके लिए यज्ञ करना चाहिए।

वेदांत या उत्तर मीमांसा

भारतीय दर्शन
आचार्य शंकर/शंकराचार्य

बादरायण (वेदांत सूत्र या ब्रह्म सूत्र) द्वारा स्थापित इस दर्शन में वेदांत का अर्थ है- वेद का अंत। इस दर्शन के मूल ग्रन्थ ब्रह्म सूत्र (बादरायण) पर दो विख्यात भाष्य लिखे गए, प्रथम 9वी सदी में शंकराचार्य द्वारा और दूसरा 12वीं सदी में रामानुजाचार्य द्वारा। आचार्य शंकर ब्रह्म को ‘निर्गुण’ बताते हैं, जबकि आचार्य रामानुज के अनुसार उसका स्वरूप ‘सगुण’ है। शंकर, ज्ञान को मोक्ष का कारण मानते हैं जबकि रामानुज के अनुसार मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भक्ति है। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है, अन्य सभी वस्तुएं अवास्तविक अर्थात माया हैं। आत्मा और ब्रह्म में अभिन्नता है। कोई भी, जो आत्मा को या स्वयं को पहचान लेता है, उसे ब्रह्म ज्ञान हो जाता है और मोक्ष मिल जाता है। ब्रह्म और आत्मा दोनों शाश्वत और अविनाशी हैं।

वैशेषिक दर्शन

द्वितीय सदी में ‘कणद‘ या ‘उलूक‘ द्वारा स्थापित यह दर्शन द्रव्य इत्यादि भौतिक तत्वों के विश्लेषण को महत्व देता है। यह दर्शन परमाणुवाद की स्थापना करता है। इसके अनुसार भौतिक वस्तुएं परमाणुओं के संयोजन से बनी हैं। इस प्रकार वैशेषिक दर्शन ने ही भारत में भौतिक शास्त्र का आरंभ किया।

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