प्राचीन भारत में कला

प्राचीन भारत में कला

प्राचीन भारतीय कला का आरंभ हड़प्पा संस्कृति से होता है। हड़प्पावासी नगरों की योजना बनाने में कुशल थे और उन्होंने विभिन्न प्रकार के भवनों का निर्माण किया। सर्वसुविधायुक्त निवासगृह, अन्न भंडार, विशाल स्नानागार, आदि से पता चलता है कि ये लोग निर्माण कार्य में अत्यंत निपुण थे। इस काल में पकी मिट्टी, पत्थर और धातुओं की मूर्तियों का निर्माण हुआ। मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांसे से बनी नर्तकी की मूर्ति और कलापूर्ण मोहरों से इनकी कुशलता का पता चलता है।

मौर्य काल

भारतीय कला का दूसरा चरण मौर्य काल से शुरू हुआ। मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त के राजमहल की बहुत प्रशंसा की। मौर्य काल में भवन लकड़ी और पत्थर दोनों से बनाए जाते थे।

अशोक के एकाश्म स्तंभ  जिन पर उनके शिलालेख  खुदे हुए हैं, मौर्य काल के महान स्मारक हैं। अशोक के स्तंभों की सबसे बड़ी खासियत उनके भव्य शीर्ष हैं जिनमें पशुओं की आकृतियां बारीकी से खोदकर बनाई गई हैं। सारनाथ का अशोक स्तंभ  जिसके शीर्ष में परस्पर पीठ सटाये हुए चार सिंह मूर्ति हैं तथा राम पूरवा का बैल की मूर्ति वाला स्तंभ पशुओं की मूर्ति के सबसे अच्छे उदाहरण हैं। अशोक के स्तंभों की पालिश और चिकनापन हैरान कर देने वाले हैं।

सांची का प्रसिद्ध स्तूप इस काल की एक और कलात्मक उपलब्धि है। सांची का स्तूप सम्राट अशोक के द्वारा बनवाए गए हजारों स्तूपों में से एक है। स्तूपों की बाहरी धरातल आम तौर पर पकी हुई ईंटों का बना होता है। स्तूपों के भीतरी भाग में एक छोटा कक्ष होता है जिसमें कशल के अंदर बुद्ध या बौद्ध संतों या भिक्षुओं की अस्थियां,बाल आदि पार्थिव अवशेष रखे गए हैं। सांची के स्तूप में मोग्गलिपुत्त तिस्स  और महा मोगलायन  के अवशेषों को संरक्षित किया गया है। मूल स्तूपों का समय-समय पर विस्तार और सौंदर्यीकरण भी होता रहा है। आज की स्थिति में सांची के स्तूप का प्रदक्षिणा पथ पत्थर की बाड़ से घिरा है। पहले यहां लकड़ी की बाड़ होती थी। इस बाड़ में चारों दिशाओं में एक-एक दरवाजा भी है। लकड़ी के इन दरवाजों पर बहुत ही सुंदर कारीगरी की गई है। दरवाजों के चौखटों पर जातक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। इनमें पेड़ों और फूलों की, पशु और पक्षियों, यक्षों और यक्षणियों तथा नर नारियों के भी सुंदर चित्र हैं।


गांधार कला शैली (50 ईसापूर्व से 500 ईसवी)

भारतीय कला के विकास के अगले महत्वपूर्ण चरण का संबंध पश्चिमोत्तर में स्थित गांधार से है। इस समय तक बुद्ध की मूर्तियों की पूजा बहुत प्रचलित हो चुकी थी। कुषाण शासकों ने, विशेषकर कनिष्क ने गांधार के कलाकारों को प्रोत्साहित किया कि वे बुद्ध के जीवन तथा जातक कथाओं में वर्णित घटनाओं को पत्थरों में उतारें। इस काल में बुद्ध और बोधिसत्वों की बहुत सी मूर्तियां बनाई गई। गांधार कला शैली को ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहा गया है। इसके अंतर्गत मूर्तियों में शरीर की आकृति को सर्वथा यथार्थ दिखाने का प्रयास किया गया है। पारदर्शी परिधान तथा यूनानी देवता अपोलो की तरह बुद्ध की मुखानुकृति गांधार कला शैली की विशिष्टता है।

मथुरा कला शैली (150 से 300 ईसवी)

ईसवी सन् की आरंभिक सदियों में मथुरा में एक और कला शैली का विकास हुआ। देशी मूर्ति कला की श्रेष्ठ परंपराओं को मथुरा के शिल्पियों ने सुरक्षित रखा और समृद्ध बनाया। बुद्ध और बोधिसत्वों की शुद्ध भारतीय मूर्तियां सबसे पहले मथुरा में बनीं। मथुरा कला का आरंभ जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया गया। इसे कुषाण शासकों का संरक्षण मिला। मथुरा कला शैली यथार्थ न होकर आदर्शवादी थी, जिसमें मुखाकृति में आध्यात्मिक सुख व शांति व्यक्त की गई थी। इसमें बलुआ लाल पत्थर प्रयुक्त होता था।

अमरावती कला (150 ईसापूर्व से 500 ईसवी)

आंध्र-सातवाहन राजाओं के संरक्षण में अमरावती में भी कला का विकास हुआ। अमरावती से एक स्तूप के बहुत से सुंदर अंश मिले हैं । सांची के स्तूप की तरह इसमें भी बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं की घटनाओं का चित्रण है। इन चित्रों में एक चित्र बुद्ध द्वारा राजगृह में एक पागल हाथी को साधे जाने के दृश्य अत्यंत सुंदर बन पड़े हैं। पागल हाथी का दौड़ना-चिंघाड़ना, आतंक और अफरातफरी के माहौल में नर-नारियों की प्रतिक्रियाएं और आखिरी में हाथी को बुद्ध के आगे नतमस्तक होते हुए दिखाया गया है । और यह सब एक ही पैनल या चौखट में उकेरा गया है। सफेद संगमरमर से बनने वाली इस शैली की प्रतिमाओं का विकास दक्षिण भारत में कृष्णा और गोदावरी नदियों के मध्य अमरावती नामक स्थान पर हुआ। इस शैली की प्रतिमाओं में शारीरिक सौंदर्य के साथ साथ मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। सातवाहन राजाओं के संरक्षण में नासिक भोज विदिशा और कार्ले में निर्मित बौद्ध चैत्यों पर इस शैली का प्रभाव है।

अमरावती शाखा में बुद्ध को देवता मानकर पूजा गया है। गांधार कला में बुध गुरु या उपदेशक के रूप में अवतरित हुए हैं। मथुरा में वह स्थानीय संत बन गए हैं।

गुप्त कालीन कला

गुप्त काल में प्राचीन भारतीय संस्कृति खूब विकसित हुई। यह वही समय था जब मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ। देवगढ़ का मंदिर, सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, आदि। इस काल में मंदिरों को वर्गाकार चबूतरों में बनाया जाता था। चबूतरे पर चढ़ने के लिए चारों ओर सीढ़ियां होती थीं। मंदिर के चारों तरफ चबूतरे में ही परिक्रमा करने के लिए पर्याप्त जगह होती थी। मंदिर के भीतर एक छोटा गर्भगृह होता था जहां देवता की मूर्ति रखी जाती हैं। लेकिन उदयगिरि की गुफा में चित्रित वराह-अवतार का दृश्य बहुत ही प्रभावशाली है। इसमें समुद्र में डूबी पृथ्वी का उद्धार करते हुए दिखाया गया है। नारी रूप में चित्रित पृथ्वी को वराह-अवतार के दांतों को हाथों से पकड़ कर समुद्र से ऊपर आई हुई दिखाई गई है। इस काल की बुद्ध की सादी परंतु सुंदर मूर्तियां सारनाथ से मिली हैं। अजंता और एलोरा की कुछ गुफाएं भी गुप्त कालीन हैं।

गुफाओं की वास्तुकला

गुफाओं की वास्तुकला भारतीय कला का एक महत्वपूर्ण चरण है। अधिकांश गुफाओं की कला की विषयवस्तु बौद्ध धर्म से संबंधित है पर कुछ हिंदू और जैन धर्मों से भी संबंधित हैं। सुंदर चैत्य, विहार,मंडप,रथ और गुफा मंदिर चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। चट्टानों को काटकर बनाया गया पहला पूजा स्थल कार्ले का चैत्य है। यह ईसवी सन् की आरंभिक सदियों में बनाया गया है। यह अच्छी तरह पालिश की हुई, अलंकृत खंभों और गुम्बदाकार छत युक्त एक हाल है।

गुफा वास्तुकला के दूसरे चरण की उपलब्धियां और भी शानदार हैं। अजंता, एलीफेंटा और एलौरा के गुफा मंदिर,मंडप, महाबलीपुरम के रथ और एलौरा का कैलाश मंदिर इस समय की उत्कृष्ट कला को प्रर्दशित करते हैं।

एलीफेंटा की गुफा में त्रिमूर्ति के नाम से ईश्वर के तीनों अवतारों की एक विशाल मूर्ति है।

अजंता में कुल 27 गुफाएं हैं। प्राचीन भारत के बेहतरीन चित्र यहां मौजूद हैं।

एलौरा में 35 गुफाएं हैं। यहां की कला का सबसे सुंदर नमूना कैलाश मंदिर है जो राष्ट्रकूट शासकों की देन है। कैलाश मंदिर को राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम (752-772ई०) द्वारा बनवाया गया।इसे एक पर्वत को काटकर बनाया गया।

द्रविड़ शैली

दक्कन तथा दक्षिण में चालुक्य, राष्ट्रकूट तथा पल्लव राजाओं ने भी अनेक भव्य स्मारक बनवाए। दक्षिण भारतीय मंदिर के प्रारंभिक नमूने कर्नाटक प्रदेश के बीजापुर जिले में एहोल के पाषाण निर्मित मंदिरों में मिलते हैं। इनका निर्माण 450 से 600 ईसवी के बीच चालुक्य नरेशों द्वारा करवाया गया था।

द्रविड़ शैली के मंदिरों के प्राचीनतम उदाहरण छठी सदी ईस्वी के हैं जो पल्लव राज्य के प्राचीन बंदरगाह महाबलीपुरम मामल्लपुरम एवं कांची से प्राप्त हुए हैं। द्रविड़ शैली की मुख्य विशेषताएं हैं:-

  1. मंदिर आयताकार और शिखर पिरामिड के आकार के होते हैं।
  2. शिखर के ऊपर का प्रत्येक खंड क्रमशः छोटा होता जाता है।
  3. शीर्ष भाग में गुंबदाकार स्तूपिका होती है। चौकोर गर्भगृह के चारों ओर प्रदिक्षणा होता है।
  4. स्तंभ युक्त मंडप, गलियारे, विशाल गोपुरम (मुख्य प्रवेश द्वार)।

पल्लव युगीन वास्तुकला की शैलियां

1.महेंद्र वर्मन शैली (600 से 640 ईसवी)

इस शैली के मंदिरों का निर्माण पहाड़ियों की ठोस चट्टानों को तराशकर अथवा काटकर किया गया है। वृत्ताकार शिव लिंग एवं विशिष्ट प्रकार के द्वार इस शैली के मंदिरों की विशेषताएं हैं। मंडप,रथ एवं विशाल मंदिरों का उद्भव यही समय हुआ इन्हें महेंद्र मंडप भी कहा जाता है। इनमें खंभों वाले बरामदा तथा भीतर की ओर खोदकर निर्मित किए गए एक दो कमरे हैं। त्रिचनापल्ली, पल्लवरम एवं मामण्डूर आदि के मंदिर महेंद्र शैली के उत्कृष्ट नमूने हैं।

2.मामल्ल शैली

नरसिंह वर्मन प्रथम (630- 655 ईसवी): इसने मामल्ल की उपाधि धारण की। इसी से मामल्ल शैली कहा जाता है। इसने महाबलीपुरम (मामल्लपुरम) नगर की स्थापना की थी। इस शैली में मंडप और रथ शैली के मंदिरों का निर्माण किया गया।

इस शैली में द्रविड़ शैली की दो विशेषताएं मिलती हैं, एक तो गर्भगृह के ऊपर विमान जिसका शीर्ष भाग पिरामिड नुमा होता है; दूसरा अलंकृत और भव्य प्रवेश द्वार जिसे गोपुरम कहा जाता है। मामल्ल शैली मंडप कला के लिए विख्यात है। इसकी कलात्मकता को वराह, महिष तथा पंच पांडव मंडपों में स्पष्ट देखा जाता है।

3.राजसिंह शैली (695-772)

राज सिंह शैली में मामल्ल शैली के विरुद्ध पत्थरों एवं ईंटों द्वारा मन्दिरों का निर्माण किया गया। मामल्लपुरम के तटीय मंदिर, कांची का कैलाश मंदिर एवं वैकुण्ठ पेरूमाल मंदिर राजसिंह शैली के उत्कृष्ट नमूने हैं।

4.अपराजित शैली

कांची के मुक्तेश्वर और मातंगेश्वर मंदिर एवं गुडिमल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर इस शैली के मंदिरों के उदाहरण हैं।

चोल कला

चोलों ने पल्लवों की वास्तुकला को आगे बढ़ाया। चोलों की द्रविड़ शैली की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं : वर्गाकार विमान,मंडप, गोपुरम्, कलापूर्ण स्तंभों से युक्त वृहत्सदन, सजावट के लिए पारंपरिक सिंह, ब्रैकेट तथा संयुक्त स्तंभों के प्रयोग आदि। राजराज प्रथम का तंजौर का शिव मंदिर जिसे राजराजेश्वर मंदिर कहा जाता है द्रविड़ शैली का एक शानदार नमूना है। इसका निर्माण 1011 ईसवी में हुआ। यहां शैव और वैष्णव धर्म का समन्वय देखा जा सकता है। अन्य उदाहरण गंगैकोंड चोलपुरम (जिसे राजेंद्र प्रथम ने नयी राजधानी बनवाया था), मदुरै, श्रीरंगम्, रामेश्वरम् तथा चोलमंडलम तट के स्थान आदि हैं। चोल कालीन मंदिर अपनी विशालता और भव्यता के लिए विख्यात हैं। इनमें अनेक मंजिलों वाले शिखर होते हैं। चोल मंदिर अधिस्ष्ठान पीठ से लेकर शीर्ष बिंदु तक प्रतिमाओं से सजे होते हैं। विशाल और भव्य प्रवेशद्वार जिसे गोपुरम कहा जाता है इन मंदिरों की एक अन्य विशेषता है। कहीं कहीं गोपुरम मुख्य मंदिर से भी बड़ा और भव्य है। गोपुरम से आगे एक के बाद एक कई प्रांगण होते हैं, जो गौण मंदिरों और स्तंभों से युक्त होते हैं। चोल युग में कांसे से बनी नटराज शिव की मूर्तियां अपनी कलात्मक श्रेष्ठता के लिए विख्यात हैं।

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.