ब्रह्माण्ड और इसकी उत्पत्ति

ब्रह्माण्ड और इसकी उत्पत्ति

ब्रह्माण्ड और इसकी उत्पत्ति के बारे में जिज्ञासा ने मानव जाति को सदा से आकर्षित किया है। मंदाकिनियों, तारों, ग्रहों, उपग्रहों तथा अन्य खगोलीय पिंडों से मिलकर ब्रह्माण्ड बना है। इस प्रकार ये पिंड ब्रह्माण्ड के अवयव हैं। ब्रह्माण्ड के सभी अवयव द्रव्य एवं ऊर्जा से बनते हैं। अतः ब्रह्माण्ड को ‘अस्तित्वमान द्रव्य एवं ऊर्जा के सम्मिलित रूप’ के तौर पर परिभाषित कर सकते हैं।

ऊर्जा और द्रव्य के अतिरिक्त ब्रह्माण्ड में डार्क एनर्जी और डार्क मैटर का भी अस्तित्व है। देश और काल (Space and Time) भी हैं। परंतु देश और काल पदार्थ (Matter) सापेक्ष हैं। जब पदार्थ नहीं था तो देश और काल भी नहीं थे। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से पहले देश और काल नहीं थे।

बिग बैंग थ्योरी

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के संबंध कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें सबसे अधिक मान्य मत महाविस्फोट का सिद्धांत (Big Bang theory) है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बारे में बिग बैंग थ्योरी का प्रतिपादन बेल्जियम के खगोलशास्त्री ऐब जार्ज लैमेन्तेयर ने किया; जो एक पादरी थे।

बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से पहले सम्पूर्ण द्रव्य और ऊर्जा एक बिंदु में संघनित थे जो आकार में परमाणु से भी छोटा था। अनंत घनत्व, अपरिमित ऊर्जा, अनंत तापमान इस अत्यंत सूक्ष्म संरचना में निहित थे, जिसमें विस्फोट होने के कारण आकाश और उसमें व्याप्त परमाणु,अणु आदि सूक्ष्म कणों; नक्षत्रों, ग्रहों, उपग्रहों, क्षुद्रग्रहों, धूमकेतु आदि खगोलीय पिंडों का निर्माण हुआ।

बिग बैंग थ्योरी के अनुसार ब्रह्मांड का जन्म 13.7 अरब वर्ष पहले अनंत घनत्व वाले बिंदु में विस्फोट से हुआ। इस विस्फोट और विस्तार ने  ऊर्जावान अंतरिक्ष को जन्म दिया। यह अंतरिक्ष क्षण भर के सृजन का परिणाम है। महाविस्फोट के एक सेकंड के अंदर सारे मूलभूत कणों जैसे इलेक्ट्रान, प्रोटोन,  न्यूट्रान, फोटान आदि का प्रादुर्भाव हो गया। तीन सेकेंड में हाइड्रोजन, हीलियम आदि के अणुओं की रचना हो गई।

महाविस्फोट के तीस करोड़ वर्ष बाद अंतरिक्ष के ऐसे हिस्सों में जहां गैसों के बादलों का घनत्व बढ़ गया था नक्षत्रों और उनके समूहों (मंदाकिनियों) का जन्म हुआ। वैसे नई मंदाकिनियों का निर्माण अब भी जारी है। आज से 4.5 अरब वर्ष पहले हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति हुई।

इस प्रकार बिग बैंग या महाविस्फोट की घटना से ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। आकाशगंगाओं के बीच निरन्तर बढ़ती जा रही दूरियों से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्माण्ड का निरंतर विस्तार होता जा रहा है। इसका यह मतलब भी है कि पहले ब्रह्माण्ड अपेक्षाकृत कम विस्तृत रहा होगा तथा सृष्टि से पहले इसका फैलाव या आयतन नगण्य या लगभग शून्य रहा होगा।

ब्रह्माण्ड के विस्तार का सबूत जुटाने में एडबिन हब्बल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अंतरिक्ष में अतिसूक्ष्म तरंगों की उपस्थिति, रेडशिफ्ट की परिघटना तथा सुपरनोवा विस्फोट आदि से ब्रह्माण्ड का सतत विस्तार होते रहना प्रमाणित होता है।

नासा के 2001 के MAP (Microwave Anisotropy Probe) नामक अनुसंधान परियोजना से प्राप्त चित्रों से बिग बैंग की पुष्टि होती है।

CERN, (फ़्रान्सीसी में) = यूरोपीय नाभिकीय अनुसन्धान संगठन) ने 30 मार्च 2010 को जेनेवा में लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर नामक महाप्रयोग किया। इसमें हिग्स बोसोन के निर्माण का प्रयास किया गया। हिग्स बोसोन कण को  ब्रह्माण्ड की मूलभूत ईकाई माना जाता है। हिग्स बोसोन में ही ब्रह्माण्ड के रहस्य छुपे हुए हैं इस लिए इसे सामान्य भाषा में गाॅड पार्टिकल भी कहा गया है।

CERN ने 04 जुलाई, 2012 को हिग्स बोसोन से मिलता जुलता सब एटमिक कण की खोज करने में सफलता पाई है जो कि इस दिशा में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

# गाॅड पार्टिकल की अवधारणा ब्रिटिश वैज्ञानिक हिग्स के द्वारा 1964 में दी गई जो भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस की बोसोन थ्योरी पर आधारित थी।

# अरबों खरबों तारों के समूह को मंदाकिनी कहते हैं।

# हमारी पृथ्वी और सौर मंडल जिस मंदाकिनी में है उसे मिल्की वे (दुग्ध मेखला) या आकाशगंगा कहते हैं। आकाशगंगा का आकार सर्पिल है।

# हमारी आकाशगंगा को सबसे पहले गैलीलियो ने देखा था।

# आकाशगंगा की सबसे पास वाली मंदाकिनी एंड्रोमेडा (देवयानी) है।

# निहारिका या नेब्युला अत्यंत तप्त धूल और गैसों के बादल होते हैं। इसमें हाइड्रोजन, हीलियम और कुछ अन्य गैसें (आयनीकृत) प्लाज्मा अवस्था में होती हैं। इन्हीं से निहारिकाओं में तारों और उनके ग्रह आदि पिंडों का जन्म होता है। इसलिए निहारिकाओं को ब्रह्माण्ड की नर्सरी कहा गया है।

निहारिकाएं दो कारणों से बनती हैं। एक तो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय और दूसरा किसी विस्फोटक तारे से बने सुपरनोवा से भी निहारिकाएं बनती हैं।

डार्क मैटर :

वैज्ञानिकों का यह मानना है कि ब्रह्माण्ड में ऐसे भी पदार्थ हैं जिन्हें न तो देखा जा सकता है और न ही उनका प्रयोगशाला में परिक्षण किया जा सकता है। यह अदृश्य पदार्थ डार्क मैटर और डार्क एनर्जी के रूप में है, हमारे ब्रह्माण्ड के 85 फीसदी से अधिक हिस्से का निर्माण करता है। हमारा दृश्यमान जगत जिसमें अणु, परमाणु, ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु मंदाकिनियां आदि हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के 5% से भी कम है।

ये सब सामान्य पदार्थ हैं लेकिन डार्क मैटर की प्रकृति बिलकुल असामान्य है। डार्क मैटर प्रकाश को अवशोषित नहीं करता; उसे परावर्तित भी नहीं करता। इसलिए इसे किसी भी तरह से देखा जाना संभव नहीं है। यह प्रायोगिक परीक्षण से भी परे है। परंतु गणितीय गणनाओं से इसके अस्तित्व का पता लगाया गया है।

डार्क एनर्जी :

ब्रह्माण्ड का सतत विस्तार हो रहा है। बिग बैंग पाइंट से आकाशगंगाओं की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन आकाशगंगाएं एक समान गति से न फैल कर त्वरण में है, अर्थात् प्रति सेकंड गति में बढ़ोतरी हो रही है। परंतु न्यूटन के गति के नियम के अनुसार एक समान गति में कमी या वृद्धि किसी बाहरी बल के दबाव से ही हो सकता है। स्वयं आकाशगंगाओं का गुरुत्वाकर्षण उसे फैलने से रोक देता।

परंतु आकाशगंगाएं न केवल तेजी से फैल रही हैं बल्कि उनके फैलने की गति बढ़ती ही जा रही है। इससे यह स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि ऐसा कोई अदृश्य बल हमारे ब्रह्माण्ड में काम कर रहा है जिसमें ऋणात्मक गुरुत्वाकर्षण हो या जो गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम कर रहा है। यही अदृश्य बल डार्क एनर्जी है।

सुपरनोवा :

जब तारों की ऊर्जा कम हो जाती है तो वे अपनी समाप्ति को बढ़ने लगते हैं। किसी तारे का अंत किस प्रकार होगा यह उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। मरते हुए तारे में होने वाले भयंकर विस्फोट को सुपरनोवा कहते हैं। इससे इतनी अधिक ऊर्जा निकलती है जितनी ऊर्जा सूर्य अपने पूरे जीवन काल में उत्सर्जित नहीं कर पाएगा।किसी तारे का अंत किस प्रकार होगा यह उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है।

यदि समाप्त होते तारे का वजन सूर्य के वजन के 1.4 से कम होगा तो वह सुपरनोवा के बाद सफेद बौना बनेगा। 1.4 गुणा भारी तारे न्यूट्रान तारा बनेगा जबकि सूर्य से चार गुना बड़ा तारा ब्लैक होल बन जाता है।

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