राजपूत चित्रकला

राजपूत चित्रकला

राजस्थान में लोक चित्रकला की समृद्ध परंपरा रही है। मध्यकाल में यहां की चित्रकला में मुगल तथा क्षेत्रीय दरबारों का अवश्य प्रभाव पड़ा। थोड़े बहुत अंतर से विभिन्न उप शैलियों का भी प्रचलन हुआ।

मुगल प्रभाव

राजपूत चित्रकला मुगल चित्रकला से कम विकसित होते हुए भी बहुत महत्वपूर्ण थी। मुगल चित्रकला के साथ-साथ यह भी सारे मुगल काल में खूब ही फली-फूली। यह अपनी पतनोन्मुख अवस्था में राजस्थान के कुछ भागों में और विशेषकर नाथद्वारा में अभी भी प्रचलित है। राजपूत चित्रकला की मुगल चित्रकला से कैसे संबंध थे इस पर मतभेद है।

सर जदुनाथ सरकार के अनुसार:

“ना तो इसकी उत्पत्ति स्थानीय हिंदू है और ना इसका राजस्थान से कोई स्वभाविक संबंध ही है। मुगल साम्राज्य के अधीन राजा शाही दरबार में प्रशिक्षित चित्रकारों को रख लिया करते थे और उनसे हिंदू महाकाव्यों, प्रेमगाथाओं तथा विशुद्ध हिंदू विषयों पर चित्र बनवाया करते थे, लेकिन इन चित्रकारों की शैली और कला संबंधी आदर्श ठीक वही होते थे जो कि मुगल दरबार के चित्रकारों के होते थे।”

यह दृष्टिकोण  उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि हमारे पास इसके ठोस प्रमाण हैं कि राजस्थान की कला परंपराएं प्रस्तर युग तक जाती हैं। राजस्थान के सबसे पुराने चित्र चंबल की घाटी में स्थित मोरी, इंदरगढ़, हिंगलाजगढ़ आदि की गुफाओं में पाए जाते हैं। ये चित्र नाचती हुई मानव आकृतियों और प्राकृतिक दृश्यों के हैं। इस प्रकार राजस्थान में गुफाओं के चित्रों से लेकर आज तक चित्र बनाने की परंपरा चली आती है।

इसलिए यह कहना सही नहीं है कि राजपूतों चित्रकला ने मुगलों से सीखी थी। जो हुआ वह यह था कि राजपूत चित्रकला अकबर के समय से मुगल चित्रकला से बहुत प्रभाव होने लगी थी और मुगल दरबार से संबंधित हो जाने से इसका लगभग रुप ही बदल गया था।

मुगल पूर्व राजपूत चित्रकला

मुगल काल के पूर्व राजपूत चित्रकला दो प्रकार की थी एक तो भित्ति चित्रकला और दूसरी साधारण चित्रकला। प्राकृत, संस्कृत और मारवाड़ी के हस्तलिखित ग्रंथों को चित्रों से सुसज्जित करने की आम प्रथा चली आ रही थी। पुस्तकों के चारों ओर किनारे भी विभिन्न प्रकार की बेल-बूटों से सजा दिए जाते थे। जैसलमेर के ग्रंथ भंडार में इस प्रकार से सुसज्जित बहुत से हस्तलिखित ग्रंथ हैं जिनमें इस मत की पुष्टि होती है।

इस ग्रंथालय में भैबाऊ स्वामी कृत कल्पसूत्र नामक चित्रों से सुसज्जित भोजपत्र में हस्तलिखित एक ग्रंथ है। मेवाड़ में भी 1422 से 23 ईसवी के चित्र युक्त हस्तलिखित ग्रंथ उपलब्ध हैं। भित्ति चित्रों के सबसे सुंदर नमूने कुंभलगढ़ के महाराणा कुंभा के महलों और चित्तौड़गढ़ की आल्हा कब्र की हवेली में मिलते हैं। इन चित्रों से पता चलता है कि राजस्थान में 12वीं से 15वीं सदी तक चित्रकला का अच्छा दौर था।

मुगल युगीन राजपूत चित्रकला

मुगल युग में राजपूत चित्रकारों ने मुगल शैली अपना ली और यह हो सकता है कि कभी-कभी ये चित्रकार वेशभूषा तथा अस्त्र-शस्त्रों में मुगल चित्रों की ज्यों की त्यों नकल कर देते थे। राजपूत चित्रकार अपने चित्र के विषय अधिकतर हिंदू पौराणिक गाथाओं, रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों से लिया करते थे। कभी-कभी वे परंपरागत श्रृंगारिक भावनाओं के चित्र बनाते थे। इन्हें राग-रागनियां कहते हैं और राग-रागिनियों के चित्रों को राग-मालाएं कहा जाता है। जयपुर की सेंट्रल जेल में राग-मालाओं की बहुत से चित्र सुरक्षित हैं।

मेवाड़ी, नाथद्वारा तथा कांकरोली शैली

राजस्थान में जितनी राजपूत रियासत थीं उतनी ही चित्रकला शैलियों भी थीं। लेकिन मुख आकृतियों और विशेषकर नाक, आंखों, दाढ़ी मूछें और कभी पहनावे के साधन हेरफेर को छोड़कर ये सब प्राय: एक से ही थी। इनमें मेवाड़ की शैली सर्वाधिक महत्वपूर्ण थी। मेवाड़ी शैली से मिलती-जुलती दो और शैलियां भी प्रमुख रूप से प्रचलित थीं। इनमें से एक तो नाथद्वारा और कंकरौली की थी और दूसरी जयपुर, जोधपुर, बूंदी, किशनगढ़ और दतिया (बुंदेलखंड) में विशेष प्रचलित थी।

मेवाड़ शैली मैं दरबारी दृश्य, शिकार के दृश्य, राजाओं तथा राजकुमारों के चित्र बनाए जाते थे। नाथद्वारा और कंकरौली के विषय धार्मिक थे। जैसे मंदिरों, श्रीनाथजी की मूर्ति, वल्लभाचार्य संप्रदाय के उत्सव और नाथद्वारा तथा कांकरोली के महंतों आदि के चित्र।

राजपूत चित्रकला नाथद्वारा शैली
नाथद्वारा शैली, साभार : Wikipedia

अन्य शैलियों में प्रायः महाभारत, रामायण और पुराणों की कथाओं पर चित्र बनाए जाते थे। रियासतों के राजाओं के चित्रों के सिवा कुछ चित्रों में लोक गीतों, लोक गाथाओं जैसे ढोला-मारू और रुक्मणी हरण के दृश्यों को भी रंगों में अंकित किया जाता था। 16 वीं और 17 वीं सदी के राजपूत शैली के चित्र मुगल तकनीक और मुगल रंगों के प्रयोग से बहुत ही प्रभावित हुए थे।

कांगड़ा शैली

मुगल काल के अंतिम भाग में कांगड़ा शैली नामक एक अन्य चित्रकला शैली प्रचलित हो उठी थी। जैसा कि सर जदुनाथ सरकार का कथन है “यह शैली हिंदू विषयों से संबंधित इंडो-सरासेन ( हिंदू-मुस्लिम) शैली का पश्चात कालीन…. स्वरूप है।” कांगड़ा शैली का सबसे प्रसिद्ध चित्रकार भोलाराम था। वह गढ़वाल का था और 18वीं सदी के अंत में मुगल साम्राज्य के पतन से उत्तरी भारत के मैदानी भागों में जो अराजकता छा गई थी उससे गढ़वाल की पहाड़ियों के सुरक्षित प्रदेश बच गए थे।

कांगड़ा शैली साभार : https://hpkangra.nic.in/hi/gallery/कला-दीर्घा/

यह प्रदेश यूरोपीय कला के उस विकृत कर देने वाले प्रभावों से मुक्त थे जोकि बक्सर के युद्ध (1664 ईसवी) के पश्चात उत्तरी भारत के ऊपरी मैदानों में फैल रहा था। यही कारण है कि इन गढ़वाली राज्यों के चित्रकार उस शुद्ध भारतीय शैली पर एक चित्र बनाते रहे जो कि गंगा के मैदानों से लुप्तप्राय हो चुकी थी। भोलाराम का रंगों का प्रयोग बहुत ही सुंदर है और पशुओं, पेड़-पौधों आदि के उसके चित्र अपनी स्पष्ट प्राचीन परंपराओं के बावजूद कूंची के बारीक काम और सौंदर्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनके रात्रि के चित्र तो विशेष रूप से सुंदर हैं।

राजपूत चित्रकला शैली की विशेषताएं:

  • लोक जीवन का प्राकृतिक परिवेश में चित्रण।
  • भाव प्रवणता।
  • दरबार और महलों के दृश्य।
  • विविध ऋतुओं के श्रृंगारिक प्रभावों का चित्रण।
  • दरबारी तड़क भड़क, विलासिता आदि के रूप में मुगल चित्रकला का प्रभाव। फिर भी राजपूत चित्रकला लोक जीवन और प्रकृति के अधिक निकट थी।
  • विषय वस्तु का उसके परिवेश के साथ समग्र अंकन।
  • नारी सौंदर्य का चित्रण।

आदि।

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