लोकसभा : संरचना, शक्तियाँ एवं कार्य

लोकसभा

लोकसभा जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित प्रतिनिधियों का सदन है। ज्ञातव्य है कि भारत में लोकसभा का प्रथम आम चुनाव कुल 489 सीटों के लिए अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 के मध्य हुआ। 13 मई 1952 को नयी गठित लोकसभा का प्रथम सत्र प्रारम्भ हुआ था। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 में लोकसभा का गठन 5 वर्ष के लिए किये जाने का प्रावधान है। यह भारतीय संसद का निम्न सदन है। लोकसभा के सदस्यों का चुनाव सार्वभौमिक व्यस्क मताधिकार के आधार पर होता है, जिसमें प्रतिनिधि जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनें जाते है।

अनुच्छेद 326 के अनुसार भारत का हर वह व्यक्ति जिसने 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो, पागल व दिवालिया न हो, मत देने का अधिकारी होगा।

लोकसभा की संरचना

भारतीय संसद के निम्न सदन लोकसभा का अनुच्छेद 81 में विवरण दिया गया है।

लोकसभा में राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से अधिकतम 530 सदस्य तथा संघ शासित प्रदेशों से अधिकतम 20 सदस्य चुने जा सकते हैं। इसके अलावा आंग्ल भारतीय समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने पर राष्ट्रपति इस समुदाय के अधिकतम 2 लोगों को नामज़द (अनुच्छेद 331) करते हैं। इस प्रकार लोकसभा में अधिकतम 552 सदस्य हो सकते है।

लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के आधार पर (अनुच्छेद 330) निर्धारित की गई है। प्रारंभ में यह 10–10 वर्षो के लिए थी, जिसे अभी 95वे संशोधन के अनुसार 2020 तक बढ़ा (अनुच्छेद 334) दिया गया।

लोकसभा के सदस्य की अर्हताएं एवं निर्हर्ताएं

लोकसभा के निर्वाचन के लिए किसी व्यक्ति की अर्हताएं अनुच्छेद 84 में निर्देशित हैं।

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसने 25 वर्ष की आयु पूर्ण कर ली हो।

सदस्यों की निर्हर्ताएं

सदस्यों की निर्हर्ताओं का वर्णन संविधान के अनुच्छेद 101 एवं 102 के अनुसार निम्न हैं:

  • भारत का नागरिक नहीं है अर्थात विदेश की नागरिकता प्राप्त कर चूका हो।
  • न्यायालय द्वारा विकृत चित्त घोषित हो।
  • केन्द्र या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो।
  • अनुन्मोचित दिवालिया घोषित किया गया हो।
  • संविधान की दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल कानून के आधार पर अयोग्य घोषित किया गया हो।
  • किसी अपराध के लिए 2 वर्ष से अधिक के कारावास के दंड का पात्र हो।

विशेष- संसद के किसी भी सदस्य की निर्योग्यताओं का निर्णय राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय पर करेगा (अनुच्छेद 103) तथा राष्ट्रपति का विनिश्चय अंतिम होगा। जबकि दल-बदल कानून के आधार पर निर्योग्यताओं का निर्णय लोकसभा स्पीकर द्वारा किया जायेगा। इस सम्बन्ध में न्यायालय का हस्तक्षेप वर्जित है।

संसद भवन

लोकसभा की अवधि

  • लोकसभा के सदस्यों का कार्यकाल प्रथम बैठक की तिथि से पांच साल का होता है। अनुच्छेद 83 के अनुसार 5 वर्ष के पश्चात स्वयं इसका विघटन हो जाता है।
  • आपातकाल के दौरान संसद लोकसभा की अवधि एक बार में एक साल तक बढ़ा सकती है। परन्तु आपातकाल की घोषणा न होने पर छः माह से अधिक नहीं।
  • मंत्रिमंडल की सिफारिश पर इसे राष्ट्रपति नियत अवधि के पहले भी विघटित कर (अनुच्छेद 85(2)b) सकता है।

लोकसभा की शक्तियाँ और कार्य

लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती है। कानून निर्माण की अंतिम शक्ति इसी लोकप्रिय सदन के पास है। लोकसभा के बहुमत दल का नेता ही प्रधानमंत्री बनाया जाता है। किंतु मंत्रिपरिषद के सदस्य किसी भी सदन के हो सकते हैं।

सदन के कुछ महत्वपूर्ण शक्तियां निम्न है-

  • विधायी शक्ति: लोकसभा को संघ एवं समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने की महत्वपूर्ण शक्ति प्राप्त है।
  • वित्तीय शक्ति: धनविधेयक और वित्त विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते है। धनविधेयक में लोकसभा की स्वीकृति मान्य है। राज्यसभा में यह 14 दिन बाद स्वतः स्वीकृत हो जाता है। कर प्रस्ताव, बजट, वार्षिक विवरण तथा अनुदानों की मांग लोकसभा में ही प्रस्तुत होते है। तथा उन्हें स्वीकृति का एकाधिकार होता है।
  • कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्ति: संघीय कार्यपालिका लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। सरकार के मंत्रीगण तब तक ही पद धारण करते है। जब तक उन पर अविश्वास प्रस्ताव न लाया जाय ।अविश्वास प्रस्ताव पारित करके प्रधानमंत्री व मंत्रीगण को पदच्युत किया जा सकता है।
    • प्रश्न पूछकर, कर में कटोती करके, विधेयको में संशोधन करके, काम रोको प्रस्ताव लाकर लोकसभा कार्यपालिका में अपना नियंत्रण रखती है।
लोकसभा कक्ष

लोकसभा का अध्यक्ष

  • लोकसभा का अध्यक्ष सदन का मुखिया होता है। वह सदन की कार्यवाहियों का संचालन संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाओ के अनुरूप करता है। सदन को अनुशासित रखता है।
  • वह लोकसभा की बैठक स्थगित तथा गणपूर्ति न होने की दशा में उसे निलंबित कर सकता है।
  • कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इसका निर्णय अध्यक्ष करता है।
  • दोनों सदनों की संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता भी लोकसभा का अध्यक्ष करता है।
  • उसे सदन में मत देने का अधिकार नहीं है, किन्तु वह निर्णायक मत देता है।
  • लोकसभा अध्यक्ष संसद की समस्त समितियों पर नियंत्रण रखता है।
जी वी मावलंकर
जी वी मावलंकर – प्रथम लोकसभा अध्यक्ष

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • स्थगन: संसद को स्थगित करने का तात्पर्य है क्रियाकलाप को रोक देना। अध्यक्ष सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर सकता है।
  • सत्रावसान: सत्रवासन का तात्पर्य सदन की एक सत्र की बैठक की समाप्ति से है। सदन के सत्रावसान और उसकी बैठक पुनः आमंत्रित करने का अधिकार राष्ट्रपति को है।
  • विघटन: सदन के विघटन का तात्पर्य सदन के कार्यकाल की समाप्ति से है। विघटन के पश्चात आम चुनाव द्वारा सदन का पुनः निर्वाचन किया जाता है। समय से पूर्व सदन का विघटन राष्ट्रपति द्वारा मत्रिमंडल की सिफारिश से किया जाता है।
मीरा कुमार : प्रथम महिला अध्यक्ष

भारत की पहली लोकसभा के अध्यक्ष श्री जी वी मावलंकर (1952 – 1956) थे, जबकि श्रीमती मीरा कुमार (2009 – 2014) पहली महिला लोकसभा अध्यक्षा थीं। 16 वीं लोकसभा (2014 – 2019) की अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन थीं।

लोकसभा (ऑफिसियल वेबसाइट): https://loksabhahindi.nic.in/

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