वित्त आयोग
वित्त आयोग

वित्त आयोग

अनुच्छेद 280 से 281

वित्त आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इसका गठन अनुच्छेद 280 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष की समाप्ति पर या आवश्यकता पड़ने पर पहले भी किया जा सकता है। भारतीय वित्त आयोग की स्थापना 1951 में की गयी थी।

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इसकी स्थापना का उद्देश्य भारत के केन्द्रीय सरकार एवं राज्य सरकारों के बीच वित्तीय सम्बन्धों को परिभाषित करना था। भारतीय संविधान में राज्य सरकारों को संघ से वित्तीय सहायता प्रदान किए जाने की व्यवस्था की गई है, जो वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

अनुच्छेद 280 के तहत, केंद्र के वित्त आयोग की तर्ज पर 1993 से भारत के सभी राज्यों में राज्य वित्त आयोगों की स्थापना की गयी थी, जिसका उद्देश्य पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करना और इसके लिए निम्नलिखित रूपों में सिफारिश करना होता है :-

  1. राज्य द्वारा लगाये गये करों, शुल्कों, टोल और फीस की विशुद्ध आय का पंचायतों तथा राज्य के बीच आवंटन करना जिसे दोनों के मध्य विभाजित किया जा सकता है और पंचायत के विभिन्न स्तरों पर खर्च या आबंटित किया जा सकता है।
  2. पंचायतों को अनुदान सहायता।
  3. पंचायतों को कितने कर, शुल्क, टोल और फीस सौंपी जा सकती है, का निर्धारण करना।

वित्त आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की योग्यताएँ

वित्त आयोग एक अध्यक्ष एवं 4 अन्य सदस्यों से मिलकर बनी संस्था है।

आयोग के सदस्यों की अर्हताओं का निर्धारण संसद द्वारा किया जाता है। वित्त आयोग अधिनियम 1951 के अनुसार –

  • आयोग का अध्यक्ष एक ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे सार्वजनिक कार्यों का अनुभव हो।

सदस्यों के लिए योग्यताएँ निम्नलिखित हैं:-

  • उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या उसके समकक्ष योग्यता रखने वाला
  • सरकार के वित्त एवं लेखा का विशेष ज्ञान रखने वाला
  • वित्तीय मामलों और प्रशासन का विस्तृत अनुभव रखने वाला
  • अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान रखने वाला

वित्त आयोग के कार्य

अनुच्छेद 280 (3) के तहत वित्त आयोग का यह कार्य होगा कि वह राष्ट्रपति को निम्नलिखित विषयों पर सिफारिश दे।

  1. संघ व राज्य के बीच करों का शुद्ध आगम का वितरण और राज्यों के बीच उनका आबंटन।
  2. भारत की संचित निधि से राज्यों को सहायता अनुदान निर्धारित करने वाले सिद्धाँत।
  3. राज्य के वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों तथा नगरीय निकायों के संसाधनों की पूर्ति राज्य की संचित निधि से।
  4. वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करना, राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट कोई अन्य विषय।
  5. इस संबंध में वित्त आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं निर्धारित करता है। राष्ट्रपति वित्त आयोग की प्रत्येक सिफारिश को उन पर की गई कार्यवाही सहित संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष विचार के लिए (अनुच्छेद 281) रखवाता है।

14वां वित्त आयोग

  • भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डॉ. वाई.वी. रेड्डी की अध्यक्षता में 14वें वित्त आयोग का गठन 2 जनवरी, 2013 को किया गया था।
  • इस आयोग की सिफारिशें 1 अप्रैल, 2015 से पांच वर्ष की अवधि के लिए लागू हैं।
  • स्पष्ट है कि इस आयोग की सिफारिशें वित्त वर्ष 2019-20 तक के लिए वैध हैं।
  • 14वें वित्त आयोग ने 15 दिसंबर, 2014 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी थी।
  • इस आयोग ने केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी के विस्तार व स्थानीय निकायों को ज्यादा संसाधनों के हस्तांतरण सहित सहयोगपूर्ण संघवाद को बढावा देने, वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन, राजकोषीय मजबूती, सार्वजनिक सेवाओं और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की मूल्य नीति आदि के संबंध में सिफारिशें दी हैं।

15वां वित्त आयोग

  • ‘वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951’ [Finance Commission (Miscellaneous Provisions) Act, 1951] के उपबंधों के साथ पठित संविधान के अनुच्छेद 280 के खंड (1) के अनुसरण में भारत सरकार ने राष्ट्रपति की स्वीकृति से 27 नवंबर, 2017 को 15वें वित्त आयोग के गठन की घोषणा की।
  • 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष श्री एन.के. सिंह होंगे।
  • श्री सिंह भारत सरकार के पूर्व सचिव एवं पूर्व संसद सदस्य हैं।
    • वे वर्ष 2008-2014 तक बिहार से राज्य सभा के सदस्य रहे।

आयोग के अन्य सदस्य

वित्त आयोग में अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य होते हैं जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

15वें वित्त आयोग के चार अन्य सदस्यों का विवरण निम्नवत है –

  1. शक्तिकांत दास (भारत सरकार के पूर्व सचिव) सदस्य
  2. डॉ. अनूप सिंह (सहायक प्रोफेसर, जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय, वाशिंगटन डी.सी.अमेरिका) सदस्य
  3. डॉ. अशोक लाहिड़ी [अध्यक्ष (गैर-कार्यकारी, अंशकालिक) बंधन बैंक] सदस्य (अशंकालिक)
  4. डॉ. रमेश चंद्र (सदस्य, नीति आयोग) सदस्य (अंशकालिक)

श्री अरविंद मेहता आयोग के सचिव होंगे।

15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एवं अन्य सदस्य कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से रिपोर्ट प्रस्तुत करने की तारीख या 30 अक्टूबर, 2019 तक, जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेंगे।

15वां वित्त आयोग निम्नलिखित विषयों के बारे में सिफारिशें करेगा-

  1. केंद्र और राज्यों के मध्य करों के शुद्ध आगमों के वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों के तत्संबंधी भाग के आबंटन के बारे में,
    उल्लेखनीय है कि संविधान के भाग 12 के अध्याय 1 के अधीन करों के शुद्ध आगमों का केंद्र एवं राज्यों के मध्य विभाजन किया जाना है।
  2. भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांत और संविधान के अनुच्छेद 275 के खंड (1) के परंतुक में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए अनुच्छेद 275 के अधीन राजस्वों में सहायता अनुदान के रूप में राज्यों को संदत्त की जाने वाली धनराशियां,
  3. राज्य के वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य में पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए किसी राज्य की संचित निधि के संवर्धन हेतु आवश्यक अध्युपाय।

यह आयोग केंद्र और राज्यों की वर्तमान वित्त व्यवस्था, घाटे, ऋण स्तरों, नकदी शेष और राजकोषीय अनुशासन कायम रखने के प्रयासों की स्थिति की समीक्षा करेगा और मजबूत राजकोषीय प्रबंधन के लिए राजकोषीय समेकन की रूपरेखा की सिफारिश करेगा।

नोट –

  • यह आयोग अपनी सिफारिशें देने के लिए वर्ष 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों का प्रयोग करेगा।
  • 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें 1 अप्रैल, 2020 से 5 वर्ष की अवधि के लिए लागू होंगी।
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