शेरशाह सूरी
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शेरशाह सूरी 

शेरशाह सूरी का मूल नाम फरीद था। शेरशाह का जन्म 1472 ईस्वी में बजवाड़ा होशियारपुर में हुआ था। शेरशाह के पिता का नाम हसन खां था। वह सासाराम का जमींदार था। शेरशाह ने एक बार शेर को तलवार के एक ही वार से मार गिराया इसी कारण मोहम्मद बहार खान लोहानी ने उसे शेरखान की उपाधि प्रदान की ।

  • शेरखान 1529 ईस्वी में बिहार एवं 17 मई 1540 ईस्वी में मैं हुए बिलग्राम युद्ध में हुमायूं को हराकर हिंदुस्तान का बादशाह बना। दिल्ली की गद्दी में बैठते समय उसने शेर खान से शेरशाह की उपाधि धारण की।
  • शेरशाह ने लाड मलिका नाम की एक विधवा से शादी कर चुनार का दुर्ग प्राप्त किया। 1539 ईस्वी में शेरशाह ने चौसा पर अधिकार कर लिया। 1540 में शेरशाह ने कन्नौज के बाद लाहौर पर कब्जा किया।
  • शेरशाह सूरी ने मुगलों से अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमा की सुरक्षा के लिए वहां रोहतासगढ़ नामक एक सुदृढ़ किला बनवाया। वहां की सुरक्षा के लिए हैबात खां और खवास खां नामक सेनापतियों को शक्तिशाली सेना के साथ नियुक्त किया।
  • 1542 ई. में मालवा व 1543 ई. में रायसीन को जीत कर अपने साम्राज्य में मिला लिया। रायसीन आक्रमण के दौरान शेरशाह ने वहां के राजपूत शासक पुरनमल को धोखे से मारा। इस आक्रमण के दौरान वहां की स्त्रियों ने जौहर किया।
  • 1544 ई. में शेरशाह ने मारवाड़ के शासक मालदेव पर आक्रमण किया। जहाँ जयता और कुप्पा नामक राजपूत सरदारों ने अफ़ग़ान सेना को हरा दिया।

1545 ईस्वी में कालिंजर अभियान के दौरान बारूद के ढेर में आग लगने के कारण शेरशाह की मृत्यु हो गई। शेरशाह के साम्राज्य में कश्मीर को छोड़कर लगभग संपूर्ण उत्तर भारत शामिल था। शेरशाह के बाद उसका पुत्र जलाल खां इस्लाम शाह (1545 से 53) शासक बना। 1555 हुमायूं ने मच्छी वाला युद्ध मेंं अफगानों को बुरी तरह परास्त किया तथा मुगल वंश की पुनर्स्थापना की। शेरशाह के मकबरे का निर्माण सासाराम बिहार में हुआ। रोहतास गढ़ के किले एवं किला ए कुहना मस्जिद (दिल्ली) का निर्माण शेरशाह ने करवाया ।

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शेरशाह सूरी का प्रशासन

केन्द्रीय प्रशासन

शेरशाह के शासन में सुल्तान या शासक ही सभी शक्तियों का केंद्र बिंदु था और एक निरंकुश शासक के रूप में कार्य करता था। शेरशाह का संपूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों (जिलों) में विभक्त था।

शेरशाह का केन्द्रीय प्रशासन अत्यधिक केन्द्रीकृत था।

मन्त्री और विभागीय व्यवस्था
विभागकार्य एवं मन्त्री
दीवाने-विजारतलगान निर्धारण व् आय-व्यय निरीक्षक
दीवाने आरिजसेना संगठन व भर्ती
दीवाने रसालतराज्यों से पत्र-व्यव्हार
दीवाने इंशासुल्तान के आदेशों का लेखांकन
दीवाने-ए-क़ज़ान्याय विभाग, प्रधान काज़ी होता था
दीवान-ए-बरीदगुप्तचर विभाग, प्रमुख बरीद-ए-मामलिक

इनके अलावा शाही परिवार के प्रभारी अधिकारी को दीवान-ए-समन कहा जाता था।

सरकारों का शासन
  • शेरशाह ने अपने सम्पूर्ण साम्राज्य को 47 सरकारों में विभाजित किया था। बंगाल सूबे को 19 सरकारों में बाँट दिया गया था। प्रत्येक सरकार को एक सैनिक अधिकारी (शिकदार) के नियंत्रण में छोड़ दिया गया था। उनकी सहायता के लिए एक असैनिक अधिकारी आमिर-ए-बंगाल की नियुक्ति होती थी। इसके शासन में शिकदार-ए-शिकदारान एक सैनिक अधिकारी होता था। यह सामान्य प्रशासन के लिए जिम्मेदार था।
  • मुन्सिफ़-ए-मुन्सिफान मुख्यता एक न्यायिक अधिकारी होता था।
परगने का शासन 
  • प्रत्येक प्रशासन अनेक परगने में बँटी होती थी जिसमें एक शिकदार, एक मुन्सिफ़, एक फोतदार (खजाँची) तथा दो कारकून होते थे।
  • मुन्सिफ़ का कार्य दीवानी मुकदमों का निर्णय करना तथा भूमि की नाप एवं लगान की व्यवस्था करना था।
ग्राम प्रशासन
  • शेरशाह ने गाँव की परंपरागत व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया। गाँव के परम्परागत मुखिया, चौकीदार, पटवारी को सरकार स्वीकार करती थी।  ग्राम पंचायत ही गाँव की सुरक्षा, शिक्षा और सफाई आदि का प्रबन्ध करती थी।
सैन्य प्रशासन 
  • शेरशाह सूरी ने सैनिकों को नकद वेतन दिया यद्यपि सरदारों को ज़ागीरें दी जाती थीं। बेईमानी रोकने के लिए घोड़ों को दागने की प्रथा तथा सैनिकों की हुलिया रखे जाने वालों का प्रथाओं  को अपनाया था।

भू-राजस्व प्रशासन

  • केन्द्रीय सरकार की आय का मुख्य स्रोत लगान, लावारिस सम्पत्ति, व्यापर कर, टकसाल, नमक कर आदि थे। स्थानीय आय जिसे कई प्रकार के  एकत्र करते थे, आबवाब कहा जाता था।
  • शेरशाह सूरी की वित्त-व्यवस्था के अन्तर्गत राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि पर लगने वाला कर था, जिसे लगान कहा जाता था। शेरशाह की लगान व्यवस्था मुख्य रूप से रैयतवाड़ी थी। यह मुल्तान को छोड़कर सभी जगह लागू थी।
  • शेरशाह ने उत्पादन के आधार पर भूमि को 3 श्रेणियों में विभाजित किया – अच्छी, मध्यम और खराब।
लगान निर्धारण और व संग्रहण

शेरशाह ने लगान निर्धारण के लिए मुख्यतः तीन प्रकार की प्रणालियाँ अपनाईं 

  1. गलाबख्शी अथवा बटाई
  2. नश्क या मुक्ताई अथवा कनकूत
  3. नकदी अथवा जब्ती (जमई)।
  • भूमि कर निर्धारण के लिए राई (फसल दरों की सूचि) को लागू करवाया गया। भूमि की किस्म और फसलों के आधार पर उत्पादन का औसत निकालकर और उसके बाद उत्पादन का 1/3 भाग कर के रूप में वसूल किया जाता था। शेरशाह के समय लगान नकद या जिंस (अनाज) दोनों रूपों में देने की छूट थी।
  • मालगुजारी (लगान) के अतिरिक्त किसानों को जरीबाना (सर्वेक्षण-शुल्क) एवं महासिलाना (कर-संग्रह शुल्क) नामक कर भी देने पड़ते थे, जो क्रमशः भू-राजस्व का 2.5% तथा 5% होता था।
  • किसानों को सरकार की तरफ से पट्टे दिए जाते थे जिससे उनको वर्ष में निश्चित लगान देना पड़ता था। किसान कबूलियत-पत्र द्वारा पट्टे को स्वीकार करता था।
  • शेरशाह सूरी ने भूमि की माप के लिए सिकन्दरी गज एवं ‘सन की डण्डी’ का प्रयोग करवाया। माप की इकाई के लिए शेरशाह ने जरीब का प्रयोग किया।

मुद्रा व्यवस्था 

  • शेरशाह की मुद्रा व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी। उसने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध चाँदी का रुपया (180 ग्रेन) और ताँबे का दाम (322 ग्रेन) चलाया। उसने 167 ग्रेन के सोने के सिक्के (अशर्फी) जारी किए। इसके अतिरिक्त उसने दाम के आधे, चौथाई और सोलहवें भाग के भी अनेक सिक्के चलाए।
  • शेरशाह के समय 23 टकसालें थीं। शेरशाह के सिक्कों पर शेरशाह का नाम सुर पद अरबी या नागरी लिपि में अंकित होता था।

न्याय व्यवस्था

  • शेरशाह साम्राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश था। उसे सुल्तान-उल-अदल की उपाधि धारण कर रखी थी। शेरशाह की न्याय व्यवस्था अत्यन्त कठोर थी जिसमे कैद, कोड़े से पीटना, अंग-विच्छेदन तथा जुर्माना जैसे दण्ड शामिल थे।
  • लगान सम्बन्धी मुकदमों का निर्णय मुन्सिफ, (परगने में) तथा मुन्सिफ-ए-मुन्सिफन (सरकारों में) करते थे, जबकि फौजदारी मुकदमों का निर्णय क्रमशः शिकदार और शिकदार-ए-दारान करते थे।
  • गाँवों में कानून-व्यवस्था स्थापित करने का काम चौधरी और मुकद्दम नामक स्थानीय मुखिया करते थे।

निर्माण कार्य

  • शेरशाह ने अनेक सड़कों का निर्माण कराया एवं पुरानी सडकों की मरम्मत कराई।
      • बंगाल में सोनारगाँव से शुरू होकर दिल्ली, लाहौर होते हुए पंजाब में अटक सड़क-ए-आजम तक। इस सड़क मार्ग को ही ग्राण्ड-ट्रंक रोड कहा जाता है।
      • आगरा से बुरहानपुर तक।
      • आगरा से जोधपुर होती हुई चित्तौड़ तक तथा
      • लाहौर से मुल्तान तक।
  • शेरशाह सूरी ने शिकदारों के अधीन 1700 सरायों का निर्माण कराया, जिनमें हिन्दुओं और मुसलमानों के ठहरने की अलग-अलग व्यवस्था थी।
  • शेरशाह ने बिहार के सासाराम में अपना मकबरा बनवाया जिससे स्थापत्य कला की एक नवीन शैली का प्रारम्भ हुआ।
  • शेरशाह ने हुमायूँ द्वारा निर्मित दीनपनाह को तुड़वाकर उसके ध्वंसावशेषों से दिल्ली में पुराने किले का निर्माण करवाया। किले के अन्दर शेरशाह ने किला-ए-कुहना का निर्माण करवाया।
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