शोषण के विरुद्ध अधिकार
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शोषण के विरुद्ध अधिकार : संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में समाज के कमजोर तबकों, महिलाओं और बच्चों आदि के शोषण को रोकने के कुछ उपाय किए गए हैं।

मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का निषेध

अनुच्छेद 23/1 इस बात की गारंटी देता है कि “मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात् श्रम प्रतिषिद्ध किया  जाता है….“।

‘मानव का दुर्व्यापार’ एक व्यापक वाक्यांश है जिसमें शोषण के सभी प्रकार आ जाते हैं। समय के साथ शोषण के नये रूप और प्रकार उत्पन्न हो जाते हैं। बदली हुई परिस्थितियों में दासता, बेगार आदि शब्दों से शोषण के सभी रूपों को व्यक्त नहीं किया जा सकता लेकिन मानव के दुर्व्यापार शब्द में ये सब समाहित हैं ही इनके अलावा यह महिलाओं, बच्चों या दिव्यांग व्यक्तियों के अनैतिक या अन्य प्रयोजनों के लिए दुर्व्यापार का भी निषेध करता है।

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संविधान में बेगार आदि सभी बलात् श्रम को भी निषिद्ध और दंडनीय बना दिया गया है। बेगार सामंती सामाजिक व्यवस्था का एक कुप्रचलन था जिसमें सामंत या जागीरदार या भूस्वामी या प्रभु वर्ग का व्यक्ति किसान या जोतदार या कृषि मजदूर या रियाया को मुफ्त में सेवा करने के लिए बाध्य करता था: परंतु अब किसी व्यक्ति से जबरन और मुफ्त दोनों तरह के काम लेना अपराध है।

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लेकिन यह खंड राज्य को लोक प्रयोजन के लिए अनिवार्य सिविल या सैनिक सेवा प्राप्त करने से नहीं रोकता। इसी प्रकार दंड स्वरूप कराया जाने वाला बलात् श्रम गैरकानूनी नहीं होगा। (अनुच्छेद 23/2)

बच्चों का कारखानों आदि संकटमय नियोजन से निषेध

संविधान के में बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय किए गए हैं। अनुच्छेद 24 के अनुसार चौदह वर्ष से कम आयु के कारखाने या खदान या किसी अन्य संकटपूर्ण कार्यों में नहीं लगाया जा सकता।

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