सिन्धु घाटी की सभ्यता

सिन्धु घाटी की सभ्यता

  • सिन्धु सभ्यता का कालक्रम 2350 – 1750 ईसा पूर्व।
  • क्षेत्रफल 1299600 वर्ग किमी।
  • आकार त्रिभुजाकार।

नगर नियोजन :

हड़प्पाकालीन विभिन्न स्थलों के नगर नियोजन में एकरूपता दिखाई देती है। सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं जिससे नगर कई चौकोर खंडों में बंट जाता था। जाल पद्धति पर आधारित इस प्रकार के नगर नियोजन को आक्सफोर्ड सरकस नाम दिया गया है।

मकान बनाने में पकी हुई ईंटों का इस्तेमाल होता था। मकान और भवन एक से अधिक मंजिलों के भी होते थे। प्रत्येक घर में आंगन और स्नानागार अवश्य होते थे। मकान सभी आकार के होते थे। मकानों के दरवाजे और खिड़कियां सामने सड़क की ओर नहीं खुल कर पीछे गलियों में खुलती थीं। खिड़कियां ऊंचाई पर होती थीं। संभवतः धूल, शोर आदि के प्रदूषण से बचने अथवा सुरक्षा कारणों से ऐसा किया जाता था। लेकिन लोथल में दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे। मकानों के निर्माण में उपयोगिता और मजबूती का ख्याल रखा जाता था। सुंदरता और अलंकरण की प्रवृत्ति नहीं पायी जाती।

स्नानागार :

मोहनजोदड़ो का प्रमुख सार्वजनिक स्थल है दुर्ग या किले में स्थित विशाल स्नानागार। यह 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है। संभवतः इस विशाल स्नानागार का उपयोग अनुष्ठानिक स्नान के लिए होता था।


जल निकास प्रणाली :

मोहनजोदड़ो की जल निकास प्रणाली बहुत ही अच्छी थी। घरों में कुंए थे। घरों का पानी छोटी नालियों द्वारा बाहर सड़कों के किनारों की बड़ी नालियों में गिरता था। कई बार ये नालियां ढकी होती थीं। सड़कों की नालियों में मेनहोल (नरमोखे) भी बनाए गए थे ताकि इकट्ठे हुए गंदगी को साफ किया जा सके।

अनाज गोदाम :

मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत है यहां स्थित धान्य कोठार या अन्नागार। यह 45.71 मीटर लंबा और 15.23 मीटर चौड़ा है। लेकिन हड़प्पा के दुर्ग में 12 की संख्या में अनाज गोदाम मिले हैं जो 6+6 की संख्या में दो कतारों में हैं। इनका सम्मिलित क्षेत्रफल मोहनजोदड़ो के एक अकेले बड़े अन्नागार के क्षेत्रफल के बराबर है। हड़प्पा के अनाज गोदामों के दक्षिण में खुले फर्श में पत्थर से बनी गोल चबूतरा नुमा संरचना है जिनका उपयोग फसल से अनाज अलग करने के लिए किया जाता रहा होगा क्योंकि फर्श की दरारों में गेहूं और जौ के दाने मिले हैं।

कृषि :

जौ और गेहूं हड़प्पा संस्कृति की मुख्य फसलें थीं। धान का भी उत्पादन होता था लेकिन केवल गुजरात क्षेत्र में। रंगपुर और लोथल से चावल के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सिंधु सभ्यता के लोग कपास पैदा करने वाले सबसे पुराने लोग हैं। खजूर, तरबूज, मटर, तिल, सरसों, राई (ब्रासुका जुंसी) अन्य फसले थीं। जमीन या खेतों की जुताई लकड़ी के हलों से की जाती थी। जुताई या हल के कूंड़ का निशान कालीबंगा में मिला है। फसल काटने के लिए पत्थर के हंसियों का इस्तेमाल होता था।

पशुपालन :

बैल, भैंस, भेंड़, बकरी, सुअर, कुत्ता, बिल्ली, गधा, ऊंट, हाथी आदि पशु पाले जाते थे। घोड़े का अवशेष केवल सुरकोतदा से मिला है।

तकनीकी :

हड़प्पा सभ्यता के निवासी शांतिप्रिय लोग थे। उनके औजारों के अवशेष पर्याप्त संख्या में प्राप्त हुए हैं लेकिन हथियारों के बहुत ही कम। हड़प्पा सभ्यता के औजार और हथियार पत्थर, तांबे और कांस्य से बनते थे। हड़प्पा सभ्यता में लोहे का ज्ञान नहीं था। यद्यपि सोना, चांदी, टिन, सीसा, तांबा आदि से परिचित थे। हड़प्पा सभ्यता प्रागैतिहासिक कांस्य-युगीन सभ्यता थी। मनके बनाने का उद्योग लोथल और चंहुदड़ो में प्रचलित था। हड़प्पा काल में मिट्टी के लाल पके काले रंग के डिजाइन वाले बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता था।

लिपि :

सिंधु लिपि में लगभग 400 चिन्ह हैं जो अक्षरसूचक नहीं होकर भावचित्रात्मक हैं। दायीं से बायीं लिखी जाती थी लेकिन अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

धार्मिक विश्वास :

सिंधु सभ्यता में मूर्ति पूजा होती थी। मातृदेवी, पशुपति, लिंग पूजा और अग्नि पूजा के साक्ष्य मिले हैं। कूबड़वाला बैल या सांड भी पूजनीय माना जाता था। लेकिन मंदिर आदि पूजा स्थलों की कोई जानकारी नहीं मिलती। पीपल का वृक्ष पूजनीय माना जाता था। योग का प्रचलन था। लिंग पूजा होती थी परन्तु लिंग और योनि साथ साथ नहीं मिले हैं। अग्निकुंड या हवनकुंड के अवशेष कालीबंगा (राजस्थान) और लोथल (गुजरात) में पाए गए हैं। अग्निकुंडों की कतारों के साथ अनुष्ठानिक (धार्मिक या कर्मकांडीय) स्नान की व्यवस्था कालीबंगा में पायी गयी है। मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार भी संभवतः अनुष्ठानिक स्नान के लिए था। मोहनजोदड़ो से स्वास्तिक के निशान पर्याप्त संख्या में मिले हैं जो दाहिने और बायें दोनों ओर से हैं। सिंधु सभ्यता कालीन किसी भी मुहर में गाय के चित्र नहीं मिलते। मुहरों का वाणिज्यिक उपयोग के साथ-साथ अनुष्ठानिक प्रयोग भी किया जाता था।

अवशेष और उनकी प्राप्ति स्थल

  • हल से जमीन की जुताई (कूंड़) का निशान कालीबंगा (राजस्थान) में मिला है।
  • काले रंग की चूड़ियां – कालीबंगन से।
  • कफन – मोहनजोदड़ो से।
  • मातृदेवी की मूर्ति – मोहनजोदड़ो।
  • कांसे की नर्तकी – मोहनजोदड़ो से।
  • कांसे से बना भैंसा और बकरा – मोहनजोदड़ो।
  • तांबे की इक्का गाड़ी – मोहनजोदड़ो से।
  • कपास का वस्त्र – मोहनजोदड़ो से।
  • ऊनी वस्त्र – कालीबंगा।
  • अन्नभंडार – मोहनजोदड़ो और हड़प्पा।
  • दाढ़ी वाले मनुष्य या पुजारी की मूर्ति का सिर – मोहनजोदड़ो।
  • किर्च या दोधारी तलवार : मोहनजोदड़ो।
  • सीप का पैमाना या स्केल या मापदंड – मोहनजोदड़ो से।
  • हाथीदांत का पैमाना – लोथल से।
  • बंदरगाह या गोदीबाड़ा – लोथल से।
  • फारस की खाड़ी प्रकार की विदेशी मुद्रा – लोथल से।
  • युगल शवाधान – लोथल से।
  • तांबे का कुत्ता – लोथल से।
  • गेंहू पीसने की चक्की – लोथल से।
  • सुई जिसमें नोंक की ओर छेद है – लोथल से।
  • घोड़े की हड्डियां – सुरकोतदा। घोड़े के साक्ष्य लोथल से भी मिले हैं लेकिन बाद के समय के हैं।

और पढ़ें: ऋग्वैदिक काल

अन्य तथ्य

  • हड़प्पा सभ्यता का विस्तार गेंहू उत्पादक क्षेत्रों में था। इसकी सीमाएं उत्तर में जम्मू में मंडा या मांडा, दक्षिण में दैमाबाद, पूर्व में मेरठ के पास आलमगीरपुर तथा पश्चिम में सुतकांगेडोर तक फैली थीं।
  • सबसे बड़ा हड़प्पा कालीन स्थल धौलावीरा (गुजरात) था जबकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जनसंख्या की दृष्टि से बड़े नगर थे।
  • हड़प्पा सभ्यता के लोगों का सबसे अधिक घनिष्ठ संबंध मेसोपोटामिया से था। मेसोपोटामिया में सिंधु डिजाइन वाली मुहरें मिलीं हैं। मेसोपोटामिया का यूनानी में अर्थ है- दो नदियों के बीच का क्षेत्र। मेसोपोटामिया में दजला और फरात नदियों के बीच का क्षेत्र आता था। आज के इराक, उत्तर पूर्वी सीरिया, दक्षिण पूर्वी तुर्की तथा इरान का कजेस्तान क्षेत्र मेसोपोटामिया के अंतर्गत आते थे। मेसोपोटामिया के विवरणों में मेलुहा के साथ व्यापारिक संबंध की चर्चा है, मेलुहा शब्द का प्रयोग सिंधु क्षेत्र के लिए किया गया है। इसी संदर्भ में दिलमुन का भी उल्लेख हुआ है। दिलमुन की पहचान फारस की खाड़ी में बहरीन नामक द्वीप से की जाती है जो मेसोपोटामिया और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच मध्यवर्ती व्यापारिक केंद्र था।
  • तौलने के बाट शुरू में 16 के गुणज में है फिर वजन बढ़ने के साथ 10 के गुणा में हैं। इस प्रकार सिंधु सभ्यता के लोगों को दशमलव प्रणाली का ज्ञान हो चुका था
  • स्त्री पुरुष दोनों गहने और आभूषण धारण करते थे। स्त्रियां बाली, हार, चूड़ियां आदि पहनती थीं लेकिन नाक के गहनों का प्रमाण नहीं मिला है।
  • अधिकतर मुहरें चौकौर (वर्गाकार) होती थीं।
  • अधिकतर मुहरों पर गेंडा जैसे एकसिंगी (यूनीकार्न) बैल का चित्र अंकित है।
  • हड़प्पा सभ्यता के निवासी मुख्यत: द्रविड़ एवं भूमध्य सागरीय थे।

हड़प्पा सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल

    1. हड़प्पा : पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित प्रमुख नगर। हड़प्पा स्थल की खोज 1921 में दयाराम साहनी और माधवस्वरूप वत्स ने की।
    2. मोहनजोदड़ो : मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ है मृतकों का टीला। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के किनारे पर स्थित प्रमुख सिंधु सभ्यता स्थल। इसकी खोज 1922 ई० में राखालदास बनर्जी ने की। यहां पर नगर निर्माण के नौ चरण मिले हैं। अर्थात् उसी बुनियाद पर नौ बार निर्माण हुआ है।
    3. चन्हुदड़ो : पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित। मनके बनाने का कारखाना।
    4. कोट दीजी : पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित।
    5. अलीमुराद : सिंध प्रांत।
    6. रोपड़ : भारत के पंजाब प्रांत में सतलज नदी के किनारे स्थित। यहां पूर्व हड़प्पा कालीन अवशेषों के साथ साथ हड़प्पा कालीन अवशेष मिले हैं।
    7. कालीबंगा : राजस्थान में घग्गर नदी के किनारे स्थित। काले रंग की चूड़ियां, हल से जुताई के निशान, अग्निकुंड के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। यहां भी हड़प्पा पूर्व सभ्यता के साथ हड़प्पा कालीन अवशेष मिले हैं।
    8. बनावली : हरियाणा राज्य के हिसार जिले में स्थित। उन्नत किस्म की जौ की प्राप्ति हुई है। यहां पर भी पूर्व हड़प्पा कालीन अवशेषों की प्राप्ति हुई है।
    9. राखीगढ़ी : हरियाणा।
    10. आलमगीरपुर : मेरठ के पास उत्तर प्रदेश में हिण्डन नदी के किनारे स्थित।
    11. लोथल : गुजरात राज्य के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के तट पर स्थित। यहां से बंदरगाह और चावल के अवशेष मिले हैं। मनके बनाने का कारखाना। अग्निकुंड।
    12. रंगपुर : गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित। यहां से भी चावल के अवशेष मिले हैं।
    13. धौलावीरा : गुजरात। सबसे बड़ा सिंधु सभ्यता स्थल।
    14. सुतकांगेडोर : बलूचिस्तान।
    15. मांडा : जम्मू।

सिन्धु सभ्यता के प्रमुख केंद्र

केंद्रनदी तटवर्तमान राज्य
हड़प्पारावीपंजाब (पाकिस्तान)
मोहनजोदड़ो सिन्धुसिन्ध (पाकिस्तान)
चन्हूदड़ो सिन्धुसिन्ध (पाकिस्तान)
कोटदीजी सिन्धुसिन्ध (पाकिस्तान)
रंगपुरभोगवागुजरात
लोथलभोगवागुजरात
धौलावीरागुजरात
बनावलीरंगोईहरयाणा
कालीबंगांघग्गरराजस्थान
रोपड़सतलजपंजाब
डाबर कोटसिन्ध (पाकिस्तान)
सुतकागेंडोरदाश्कबलूचिस्तान (पाकिस्तान)
आलमगीरपुरहिण्डनउत्तर प्रदेश
सुरकोटदागुजरात
  • सिंधु सभ्यता का एक प्रमुख स्थल लोथल गुजरात में है। लोथल से गोदीबाड़ा (बंदरगाह) का अवशेष भी मिला है। इसका आकार 216×36×3 मीटर है। यहां पर विदेशी जहाजों का भी आना जाना होता था।
  • लोथल से ही मनका बनाने का कारखाना एवं कपास के सबूत मिले हैं।
  • मोहनजोदड़ो का अर्थ है – मुर्दों का टीला।
  • मोहनजोदड़ो से विशाल स्नानागार के साक्ष्य मिले है।
  • मोहनजोदड़ो से नर्तकी की कांस्य प्रतिमा मिली है।
  • सिन्धु सभ्यता की अधिकांश मूर्तियाँ मातृदेवी की है, वे लोग कूबड़ वाले सांड, तथा पशुपति शिव की भी पूजा करते थे।
  • रंगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं।
  • सिन्धु सभ्यता के लोग गाय तथा घोड़े के महत्व से परिचित नहीं थे।
  • सुरकोतदा से घोड़े की हड्डियाँ मिली हैं।
  • सिन्धु सभ्यता समाज चार भागों में बटा था –
    1. व्यापारी
    2. विद्वान
    3. श्रमिक
    4. सैनिक
  • मेसोपोटामिया के लोग सिन्धु क्षेत्र को मेलुहा कहते थे।
  • अंतिम संस्कार का सबसे प्रचलित तरीका शवाधान (दफनाना) था।
  • नगर एवं घरों का विन्यास ग्रिड पद्धति पर आधारित था।
  • भारतीय गेंडे का प्रमाण आमरी से मिला।
  • मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार (अनाज गोदाम) संभवतः सबसे बड़ी ईमारत थी।
  • हड़प्पा स्थल के दक्षिणी भाग मे एक कब्रिस्तान मिला है जिसे “R-37” नाम दिया गया है।

खनिज/रत्न और उनके स्रोत

खनिज/रत्नस्रोत
ताम्बाखेतरी
टिनअफगानिस्तान
लाजवर्द मणिकश्मीर/अफगानिस्तान
नील मणिबदख्शाँ
सोनाअफगानिस्तान
चाँदीअफगानिस्तान, ईरान
सीसादक्षिण भारत
कार्नेलियनगुजरात, सिन्ध
फिरोजामध्य एशिया
गोमेदसौराष्ट्र
शंख एवं कौड़ियांसौराष्ट्र

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