स्तूप

स्तूप की उत्पत्ति एवं विकास

महात्मा बुद्ध के निर्वाण के बाद भारत और अफगानिस्तान में बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण प्रारंभ हुआ। सम्राट अशोक ने ही लगभग 84000 स्तूपों का निर्माण करा कर बौद्ध धर्म के प्रति अपनी असीम श्रद्धा का प्रदर्शन किया। शुंग एवं सातवाहन काल में ब्राह्मण धर्म का बोलबाला रहा फिर भी स्तूप निर्माण की परंपरा लगातार चलती रही। ‌इस निर्माण का जो भी उद्देश्य रहा हो लेकिन कला की दृष्टि से इनका खास महत्व है। सांची, सारनाथ, भरहुत आदि के स्तूप भारतीय वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं।

स्तूप की उत्पत्ति

स्तूप निर्माण की परंपरा बहुत पुरानी है। वैदिक काल में शव-समाधियों को मिट्टी के थूहों या टीलों के रूप में बनाया जाता था। इन्हीं शव-समाधियों स्तूपों का आदि-प्रारूप माना जाता है। पहले इसका उद्देश्य मात्र अस्थि संचय था। बाद में इनका विकास स्मारक के रूप में हुआ। स्तूप निर्माण की परंपरा का वास्तविक इतिहास बौद्ध और जैन धर्म के साथ शुरू होता है। जैन स्तूप नष्टप्राय हो चुके हैं; लेकिन बौद्ध धर्म से संबंधित स्तूप आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी कह रहे हैं। हिंदु-समाधि का स्तूप के रूप में विकास क्यों नहीं हो पाया? यह भी एक प्रश्न हो सकता है।

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बौद्ध परंपरा के अनुसार स्तूप स्मारक के रूप में बनाए जाते थे। बौद्ध ग्रंथ महापरिनिर्वाणसूत्र में चार प्रकार के स्तूपों का उल्लेख किया गया है।

  1. तथागत के स्मारक
  2. बुद्ध के विभिन्न रूपों के स्मारक
  3. मुख्य बौद्ध भिक्षुओं के स्मारक
  4. चक्रवर्ती नरेशों के स्मारक

सम्राट अशोक के पहले की मात्र दो बौद्ध समाधियां अथवा स्तूप अब तक प्राप्त हुए हैं।

  1. नंदनगढ़ में मिट्टी के असंख्य टीले मिले हैं। इनका निर्माण संभवतः शव-समाधियों के रूप में किया गया था।
  2. बस्ती जिले में पिपरहवा नाम के स्थान पर सबसे पहले मौर्य यगीन स्तूप का पता चला। यह संभवत महात्मा बुद्ध के कुछ समय बाद ही निर्मित किया गया प्रतीत होता है।

स्तूप की संरचना

स्तूप की संरचना में एक गुम्बद होता है। इसके आधार पर प्रदक्षिणा मार्ग होता है। स्तूप के चारों ओर घेरा या रेलिंग होती है जिसे वेदिका भी कहा जाता है।

स्तूप का अर्थ ही थूहा या टीला होता है। स्तूप के प्रारंभिक रूप चैत्य कहलाता था। चैत्य का शाब्दिक अर्थ है चिता संबंधी। चैत्य या स्तूपों में बुद्ध या महान भिक्षुओं के शारीरिक अवशेष रखे गए हैं। इस तरह स्तूप मूलतः शव-समाधि हैं। चूंकि बड़ी संख्या में स्तूपों का निर्माण किया गया इसलिए सभी स्तूपों में महात्मा बुद्ध या प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षुओं के पूरे शारीरिक अवशेष नहीं रखे जा सकते थे। अतः बाल, दांत या कुछ अस्थियां आदि शारीरिक अंश ही रखे गए।

स्तूप के शिखर पर अस्थियां आदि शारीरिक अवशेषों को रखने का एक स्थान होता है। कभी-कभी स्तूप के गर्भ में भी अस्थियों को रखा जाता था।

प्रमुख स्तूप

वास्तुकला की दृष्टि से निम्नलिखित स्तूप महत्वपूर्ण और प्रख्यात हैं:-

  • सांची के स्तूप
  • सारनाथ का स्तूप
  • भरहुत का स्तूप
  • बंगाल का स्तूप
  • पिपरहवा का स्तूप
  • गांधार क्षेत्र के स्तूप

सांची के स्तूप

सांची का मुख्य स्तूप

सांची विदिशा से लगभग 6 मील (10 किमी) की दूरी पर है। सांची में तीन स्तूप हैं। इनकी खोज कनिंघम ने की थी। सांची का मुख्य स्तूप पहाड़ी के पश्चिमी भाग में बना है। इसे सम्राट अशोक के द्वारा निर्मित माना जाता है। इसके दक्षिणी द्वार पर एक स्तंभ में अशोक का लेख उत्कीर्ण है। यह स्तूप मूलतः ईंटों का बना था तथा इसके चारों ओर पत्थरों का घेरा लगा हुआ था। शुंग काल में सांची के स्तूप में परिवर्तन और परिवर्धन हुआ। इस काल में स्तूप को पत्थरों से मढ़ दिया गया और लकड़ी के दरवाजों की जगह पत्थरों के तोरणद्वार बनवाए गए। इसी तरह सातवाहन नरेश शातकर्णि के समय उसके स्थपति ने सांची के स्तूप के दक्षिणी द्वार के एक हिस्से का निर्माण कराया और एक अन्य द्वार का निर्माण विदिशा के हाथीदांत शिल्पकारों द्वारा कराया गया। सांची के तीनों स्तूपों की वेदिका और तोरणों पर कुल मिलाकर 827 लेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से 387 लेख जो कि दानलेख हैं, मुख्य स्तूप की वेदिका और तोरणों पर अंकित हैं। इन लेखों की लिपि ब्राह्मी है।
मुख्य स्तूप का व्यास 120 फुट और ऊंचाई 154 फुट बताई जाती है। स्तूप का समस्त भाग लाल पत्थरों से ढका हुआ है। इन पत्थरों को चूने से जोड़ा नहीं गया है बल्कि पत्थरों के ऊपर 4 इंच का लेप लगा कर उसे मजबूती प्रदान की गई है। भरहुत के समान सांची का स्तूप भी अर्धगोलाकार है।

इसके चारों ओर का पाषाण घेरा (वेष्टिनी) अत्यंत साधारण है। यह घेरा चार भागों में बंटा हुआ है। इनमें चार प्रवेश द्वार बने हुए हैं। प्रवेश द्वार और उनके ऊपर निर्मित तोरण बहुत ही सुन्दर और अलंकृत हैं। द्वारों के स्तंभों की ऊंचाई 14 फुट और तोरणों की ऊंचाई 34 फुट है। तोरणों पर जातक कथाओं के अंकन के साथ-साथ महात्मा बुद्ध के भस्मीभूत पार्थिव अवशेषों की प्राप्ति के लिए हुए युद्ध का सजीव चित्रण हुआ है। स्तम्भों के ऊपर लगी बड़ेरियों में बुद्ध के पूर्व जीवन की घटनाएं, धर्मचक्र, त्रिरत्न, सिंह, हस्ति, हिरण, मोर आदि चित्रित हैं। स्तम्भों के नीचे भाग द्वार रक्षक यक्षों, यक्षणियों, बौनों तथा हाथियों से सुसज्जित है।

सांची का दूसरा स्तूप

सांची का द्वितीय स्तूप एक छोटे चबूतरे पर बनाया गया है। इसकी ऊंचाई 37 फुट तथा व्यास 47 फुट है। इस स्तूप में तीन वेदिकाएं बनी हैं। सबसे नीचे की वेदिका में 88 स्तम्भ थे।

सांची का तीसरा स्तूप

सारिपुत्र तथा महामोग्गलायन के अस्थि-अवशेषों के ऊपर सांची का तीसरा स्तूप बनाया गया है। यह दोनों महात्मा बुद्ध के प्रमुख शिष्य थे। इस स्तूप की ऊंचाई 35 फुट 4 इंच तथा व्यास 49 फुट 6 इंच है। इस स्तूप में केवल एक तोरणद्वार है जिसकी ऊंचाई 17 फुट है। इसमें अंकित चित्रों में गजलक्ष्मी, देवसभा तथा मालाधारी यक्ष के चित्र प्रशंसनीय हैं।

सांची में प्राप्त तीनों स्तूपों में से पहला जो अशोक निर्मित है सबसे अधिक प्राचीन है। स्तूप संख्या 2 और 3 शुंग कालीन अर्थात् बाद के बताए जाते हैं।

सारनाथ का स्तूप

सारनाथ बनारस के समीप स्थित है। यहां मौर्य सम्राट अशोक ने एक विशाल स्तूप का निर्माण कराया था। सारनाथ के स्तूप का अब केवल तल भाग ही शेष है। अवशिष्ट तल को देखकर यह अनुमान लगाया जाता है कि स्तूप लगभग 60 फुट व्यास का रहा होगा।

सारनाथ का धामेख स्तूप

धामेख स्तूप गुप्त कालीन स्तूपों का सबसे उत्कृष्ट नमूना है।

भरहुत का स्तूप

मध्य प्रदेश के सतना से लगभग 9 मील (15 किमी) की दूरी पर भरहुत स्थित है। जहां पर अशोक ने स्तूप बनवाया था। स्तूप ईंटों से बना था। इसके चारों ओर पत्थरों का घेरा था। चहारदीवारी के अवशेष पर ‘सुगन्ध रजे’ वाक्यांश उत्कीर्ण है। इससे ज्ञात होता है कि इस चहारदीवारी को शुंग काल में बनाया गया। इसका व्यास लगभग 68 फुट था। इसके चार प्रकोष्ठ और इतने ही भव्य तोरणद्वार थे। पाषाण घेरे पर विभिन्न प्रकार की मूर्तियां खुदी हुई है जिनमें बोधि वृक्ष, धर्म चक्र, स्तूप तथा भगवान बुद्ध के जन्म संबंधी अनेक कथानक चित्रित हैं। वेष्टिनी (घेरे) के द्वार स्तंभों या तोरणों पर जातक कथाओं का प्रदर्शन है। इन से अधिक सुंदर तथा उत्कृष्ट नमूने कहीं अन्य नहीं मिलते। वेष्टिनी के स्तंभों पर हाथ में चंवर या कमल लिए यक्ष की मूर्तियां दिखाई पड़ती है। अधिकतर बामन मनुष्यों (बौनों) की पीठ पर खड़ी यक्षी परिचारिका की मूर्ति मिलती है। स्तूप एवं पाषाण घेरे के बीच में एक प्रदक्षिणा मार्ग था। यह प्रदक्षिणा पथ 10 फुट 4 इंच चौड़ा था। इस तक पहुंचने हेतु छः सोपान बने थे। स्तूप में छोटे-छोटे आले भी बने हुए थे। इन आलों की संख्या लगभग 125 थी।

बंगाल का स्तूप

बंगाल प्रांत के स्तूप का नाम जरासंध की बैठक है। स्तूप का व्यास 28 फुट तथा ऊंचाई 21 फुट है। आधार 4 फुट है। यह लगभग 500 ईसवी में बनाया गया था।

पिपरहवा का स्तूप

पिपरहवा नामक स्थान नेपाल की सीमा पर बस्ती जिले में है। यहां से प्राप्त स्तूप को सबसे अधिक पुराना माना जाता है। इसका समय बुद्ध के निर्वाण के तुरंत बाद निर्धारित किया गया है। यह ईंटों से निर्मित है।

गांधार क्षेत्र के स्तूप

कनिष्क ने गांधार क्षेत्र में अनेक स्तूपों का निर्माण कराया था लेकिन आज वे उपलब्ध नहीं हैं।

तक्षशिला के स्तूप का निर्माण अपने पुत्र कुणाल की स्मृति में सम्राट अशोक ने कराया था। इस स्तूप को कुणाल स्तूप कहा जाता था। बाद में इसे धर्म राजिका स्तूप कहा जाने लगा।

अमरावती का स्तूप

अमरावती गुंटूर जिले के कृष्णा नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। अमरावती का स्तूप अपने मूल रूप में ईंटों से बना हुआ था लेकिन शक सातवाहन काल में उसे संगमरमर की चित्रित पट्टियों से ढक दिया गया।

नागार्जुनकोण्डा

यह भी गुंटूर जिले के अमरावती से 60 मील (100 किमी) दूर है। यह इक्ष्वाकु शासकों की राजधानी थी। यहां के स्तूप को किसी इक्ष्वाकु रानी द्वारा बनवाने का अनुमान लगाया जाता है। नागार्जुन कोण्डा का स्तूप अपनी मूर्ति कला और उत्कीर्णित पट्टियों की सुंदरता और अंतर्वस्तु के लिए प्रख्यात है।

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