1857 का विद्रोह

1857 का विद्रोह:

भारत में अंग्रेजी शासन की स्थापना के साथ ही उसका विरोध शुरू हो गया था। शायद ही ऐसा कोई साल बीता हो जब देश की जनता ने कंपनी और अंग्रेजों का विरोध नहीं किया हो। बंगाल में संन्यासी विद्रोह, खानदेश (गुजरात) में किसान असंतोष तथा कोल, मुंडा, खासी, गोंड, हलबा आदि जनजाति समूहों के द्वारा सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से अंग्रेजों के लिए दिक्कतें पैदा की गईं। परंतु ये सभी विरोध स्थानीय किस्म के थे तथा अंग्रेजों के लिए किसी खास परेशानी का कारण नहीं बन पाए। परंतु 1857 में पहली बार भारत की जनता के विभिन्न वर्गों या समूहों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह किया गया जो प्रादेशिक विस्तार तथा प्रभाव में कहीं बड़ा था।

विद्रोह के कारण

राजनीतिक कारण:

ईस्ट इंडिया कंपनी की विस्तारवादी नीति के कारण, विशेषकर डलहौजी के विलय के सिद्धांत (Doctrine of lapse) के कारण पूरे भारत में संदेह, चिंता और विद्रोह का वातावरण पैदा हो गया था। पंजाब,बर्मा और सिक्किम विजय के द्वारा मिला लिए गए। सतारा ,जौनपुर संबलपुर, बघाट ,झांसी और नागपुर डलहौजी की विलय नीति के अंतर्गत कंपनी के राज्यक्षेत्र में मिला लिए गए, जबकि अवध पर कुशासन का आरोप लगाकर विलय किया गया।

प्रशासनिक एवं आर्थिक कारण:

रियासतों के विलय के कारण सामंती वर्ग अधिकारों से वंचित हो गया था। नये तरह की प्रशासनिक व्यवस्था में उनके लिए कोई जगह नहीं थी। सेना और प्रशासन में कोई भी भारतीय उच्च पद पर नहीं जा सकता था।
भूमिकर व्यवस्था से किसान, रैयत और पारंपरिक जमींदार सभी असंतुष्ट थे। अनेक स्तरों पर बिचौलियों पर आधारित स्थायी बंदोबस्त में परंपरागत जमींदारों का स्थान नये जमींदारों ने ले लिया जिनका रैयत से कोई लगाव नहीं होता था। लगान की दर बहुत ऊंची होती थी तथा कड़ाई से वसूली होती थी।
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी। अंग्रेजों ने संरक्षणवादी नीति अपनाई। भारत को कच्चा माल पैदा करने वाले उपनिवेश तथा इंग्लैंड में उत्पादित माल के बाजार में तब्दील कर दिया गया। इससे यहां के दस्तकार तबाह हो गए।

सामाजिक एवं धार्मिक कारण:

अंग्रेजों ने सती प्रथा, कन्यावध, बाल विवाह आदि के विरुद्ध कानून बनाए। ईसाई मिशनरियों के धर्म परिवर्तन संबंधी उत्साह के कारण भी लोगों को संदेह हुआ कि अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं। इससे शिक्षित मध्यम वर्ग छोड़ कर शेष भारतीय रूष्ट हो गये।

सैनिक कारण:

सैनिकों का वेतन बहुत कम था,  पदोन्नति के अवसर बहुत ही सीमित थे, कोई भी भारतीय अधिक से अधिक सूबेदार रैंक तक पहुंच पाता था। सेना के अधिकारी यूरोपीय होते जो सैनिकों से प्रजातीय भेदभाव तथा अपमान जनक व्यवहार करते थे। 1854 में सैनिकों को दी जाने वाली नि:शुल्क डाक की सुविधा समाप्त कर दी गई। 1856 में सामान्य सेना भर्ती अधिनियम द्वारा सैनिकों को कहीं भी सेवा ​देना आवश्यक बना दिया गया तथा देश से बाहर जाने पर भी अतिरिक्त भत्ता दिया जाना बंद कर दिया गया। सेना में सभी जातियों के लोग एक साथ मिलकर रहते थे इसलिए कई बार सैनिकों को गांवों में जाति बहिष्कृत भी कर दिया जाता था। 1856 में नयी एनफील्ड रायफल सेना में लायी गई जिसके कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी लगी होती थी। इस्तेमाल करते समय कारतूस की पैकिंग को दांतों से काट कर गोली निकाली पड़ती थी​, जिससे हिंदू और मुसलमान दोनों सैनिकों में धर्मभ्रष्ट होने का भय घर कर गया और उनमें से कुछ ने बगावत का बिगुल फूंक दिया।
इस तरह भारत में अंग्रेजी राज के शोषणकारी चरित्र से सभी वर्गों के लोग असंतुष्ट थे। जैसे ही सैनिकों ने बगावत शुरू किया उसमें किसान​, मजदूर, जमींदार एवं जागीरदार तथा रजवाड़े भी शामिल हो लिए।

विद्रोह का आरंभ

29 मार्च, 1857 को बैरकपुर (पश्चिम बंगाल) में सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया। एक सैनिक मंगल पांडे ने अपने सार्जेंट पर हमला कर उसकी हत्या कर दी। 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडे की फांसी दे दी गई। 34वीं देशी पैदल सेना रेजिमेंट को भंग कर दिया गया। मई, 1857 में मेरठ छावनी में 85 सैनिकों ने इन कारतूसों को प्रयोग करने से इंकार कर दिया। 10 मई को मेरठ छावनी के सैनिकों ने खुला विद्रोह कर दिया और अपने अफसरों पर गोलियां चलाईं। अपने साथियों को मुक्त करा कर वे लोग दिल्ली की ओर चल दिए। 11 मई को दिल्ली को कब्जे में कर लिया। बहादुर शाह द्वितीय को भारत का बादशाह घोषित कर दिया। परंतु वास्तव में नेतृत्व सैनिक नेता बख्त खां ने किया।

विद्रोह का विस्तार एवं मुख्य घटनाएं

  • विद्रोह जल्दी ही समस्त उत्तरी तथा मध्य भारत में फैल गया। जून 1857 में ग्वालियर, भरतपुर, झांसी, इलाहाबाद, फैजाबाद, सुल्तानपुर, लखनऊ आदि क्षेत्रों में विद्रोह हुआ।
  • जुलाई 1857 में इंदौर, महू, सागर और स्यालकोट जैसे कुछ स्थानों पर विप्लव हुए।
  • सितंबर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली फिर से कब्जे में ले लिया। कैप्टन हडसन ने यहां विद्रोह पर नियंत्रण किया।
  • कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब (धोंधू पंत) ने किया। इनके सहयोगी तात्या टोपे बड़ी बहादुरी और चतुराई से अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई लड़े।
  • कानपुर में जनरल हैवलॉक ने विद्रोह को दबाया।
  • लखनऊ में विद्रोहियों का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। उसने अपने बेटे बिरजिश कादिर को लखनऊ का नवाब घोषित किया।
  • जनरल हैवलॉक एवं आउट्रम ने लखनऊ में विद्रोह को शांत किया।
  • झांसी एवं ग्वालियर में विद्रोहियों का नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई ने बहुत ही बहादुरी से किया। रानी 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कालपी में जनरल ह्यूरोज के साथ लड़ती हुई शहीद हुईं।
  • बिहार में विद्रोह का नेतृत्व जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह ने किया। यहां विद्रोह को विलियम टेलर और मेजर विसेंट आयर ने दबाया।
  • बनारस में विद्रोह को कर्नल नील द्वारा दबाया गया।

इस प्रकार यह विद्रोह देश के बहुत बड़े भाग फैला तथा उसे जनसाधारण का समर्थन प्राप्त हुआ। परंतु ग्वालियर के सिंधिया, इंदौर के होल्कर, हैदराबाद के निजाम, जोधपुर के राजा, नाभा, जींद तथा कश्मीर के शासकों​, नेपाल के राजाओं ने विद्रोह को दबाने में सक्रिय भूमिका निभाई।

विद्रोह की असफलता के कारण

विद्रोह बिना पर्याप्त तैयारी के विद्रोही सैनिकों द्वारा शुरू किया गया था।
संगठन का अभाव, ताल-मेल में कमी, अंग्रेजों के मुकाबले कम साजो-सामान, आधुनिक अस्त्र-शस्त्र की कमी, संपर्क एवं संचार के साधनों की कमी आदि के कारण विद्रोहियों का पक्ष शुरू से कमज़ोर था।
इसके विपरीत अंग्रेजों के पास अस्त्र-शस्त्र,डाक तार, रेलवे आदि संचार एवं यातायात के अत्याधुनिक साधन थे।
यद्यपि विद्रोहियों के नेता व्यक्तिगत रूप से अच्छे लड़ाके थे तथा अपने आदर्शों के लिए उनमें से बहुत शहीद भी हुए, परंतु अंग्रेजों के पास रणनीति और कूटनीति में माहिर विश्वस्तर के दर्जनों सेनानायक थे।

विद्रोह का स्वरूप

बहुत से इतिहासकार 1857 के विद्रोह को आधुनिक अर्थों में राष्ट्रीय नहीं मानते।उस समय तक भारत देश में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं हो पाई थी। विद्रोह के नेताओं का एक ही एक ही उद्देश्य था विदेशियों को बाहर निकालना। विद्रोह के सामंती नेता अपने अपने राज्य क्षेत्र वापस लेे के लिए या क्षेत्रीय स्वार्थों के लिए काम कर रहे थे।वे विदेशियों को बाहर कर अंग्रेजों के आगमन से पहले का खंडित भारत वापस लाना चाहते थे,या शायद दिल्ली के सम्राट के अधीनस्थ सामंती राज्यों का संघ बनाना चाहते थे।

विद्रोह के स्वरूप के बारे में कुछ विशिष्ट मत:

  • सैनिक विद्रोह- जान लारेंस और सीले के अनुसार यह विद्रोह पूर्णतया सैनिक विद्रोह था, परंतु उपर्युक्त विचार स्वीकार नहीं किया जा सकता। विद्रोह का आरंभ सैनिकों ने जरूर​ किया था परंतु इसमें इसमें आम लोगों ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया। अधिकतर स्थानों में इनका नेतृत्व रजवाड़ों के प्रमुखों ने तथा ज़मींदारों ने किया जो समय अपनी प्रजा के स्वभाविक नेता माने जाते थे।
  • ईसाइयों के विरुद्ध धर्म युद्ध – एल ई आर रीज का यह कथन भी युक्तिपूर्ण नहीं है।
  • अंग्रेजों के खिलाफ हिंदू और मुसलमानों का षड्यंत्र-सर जेम्स आउट्रम और डब्ल्यू टेलर।
  • राष्ट्रीय विद्रोह-अशोक मेहता, बेंजामिन डिजरैली ने भी इसे राष्ट्रीय विद्रोह मानते हुए कहा है कि साम्राज्यों का उत्थान पतन चर्बी वाले कारतूस के मामले नहीं होते।सुनियोजित स्वतंत्रता संग्राम-वीर सावरकर।

परंतु वास्तव में जैसा कि आर सी मजुमदार ने कहा है:

यह न तो राष्ट्रीय था,न तो प्रथम था और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।

विद्रोह बिना किसी योजना के अचानक शुरू हुआ। उस समय देश में राष्ट्रीयता की भावना का सर्वथा अभाव था। सभी विद्रोही व्यक्तिगत हितों के लिए लड़ रहे थे।

विद्रोह का महत्त्व

इस विद्रोह के परिणाम स्वरूप भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया तथा देश ब्रिटिश सम्राट् के अधीन आ गया। अंग्रेजों ने भारत में नये क्षेत्र जीतने की नीति को त्याग दिया। यद्यपि यह असफल रहा परंतु बाद के समय में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसने देशभक्ति मूलक प्रेरणा का काम किया। यह विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने की भारतीय जनता की इच्छा का प्रतीक बन गया। कुछ लोगों ने इसे स्वतंत्रता की भावी सफल लड़ाई का पूर्वाभ्यास माना। 1857 में भारत के इतिहास में पहली बार कार्यत: यह सिद्ध हुआ कि हिंदू मुस्लिम में व्यापक एकता संभव है।

विद्रोह के बाद संवैधानिक और प्रशासनिक परिवर्तन

भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर ब्रिटिश सम्राट् का शासन प्रारंभ हो गया। गवर्नर जनरल को अब वायसराय (सम्राट् का प्रतिनिधि) कहा जाने लगा। अब रियासतों को अंग्रेजी क्षेत्र में मिलाने की नीति का परित्याग कर दिया गया। सेना में भारतीयों की संख्या कम रखने के लिए एक तिहाई यूरोपीयों की भर्ती का कानून बनाया गया। सेना की इकाइयों का गठन जाति और क्षेत्रों के आधार पर किया गया।

 

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