1857 के पहले हुए लोकप्रिय विद्रोह

पूर्वी भारत

सन्यासी विद्रोह (1763-1800)

यह विद्रोह बंगाल (और बिहार) में हुआ। यह मूलतः कृषक विद्रोह था जिसकी अगुवाई सन्यासियों ने किया। किसानो के साथ-साथ दस्तकार तथा मुग़ल साम्राज्य के पूर्व सैनिक इसमें शामिल थे। मजनू शाह, चिराग अली, भवानी पाठक, देवी चौधरानी इस विद्रोह के मुख्य नेता थे। बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का सन 1882 में रचित उपन्यास आनन्द मठ इसी विद्रोह की घटना पर आधारित है।

चुआर विद्रोह (1766-1772, 1795-1816) 

आकाल, बढे हुए भूमि कर तथा अन्य आर्थिक कारणों से मिदनापुर जिले के चुआर आदिवासियों ने हथियार उठा लिए।


हो विद्रोह (1820-1822, 1831) 

छोटा नागपुर तथा सिंहभूमि जिले के हो जनजाति द्वारा।

कोल विद्रोह (1820-1836) 

छोटा नागपुर के कोल लोगो द्वारा।

संथाल विद्रोह (1855) 

बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहारसंथाल विद्रोह के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार, महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार संथाली जनता
ने एकबद्ध होकर उनके विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे संथाल विद्रोह या संथाल हुल कहते हैं। संताली भाषा में ‘हूल’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘विद्रोह’। यह उनके विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। सिधु, कानु और चाँद इस आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता थे।

अहोम विद्रोह (1828, 1830)

असम के अहोम क्षेत्र के लोगो ने 1828 में गोमधर कुँवर को अपना राजा घोषित कर विद्रोह कर दिया जिसे कंपनी की सेना ने दबा दिया। 1830 में दूसरे विद्रोह की योजना बनी इस बार कंपनी ने शांतिपूर्ण तरीके काम लिया, उत्तरी असम के प्रदेश महाराज पुरंदर सिंह को दे दिया।

खासी विद्रोह (1829-1833) 

बाहरी लोगों (अंग्रेजी, बंगाली) के विरुद्ध तीरत सिंह के नेतृत्व में जयंतिया एवं गारो पहाड़ियों के गारो, खासी तथा सिंहपो लोगो ने दीकू लोगों को (बाहरी लोगों को) निकालने का प्रयत्न किया।

पागल पन्थी विद्रोह (1825-1850) 

पागल पंथ नामक संप्रदाय उत्तरी बंगाल में करम शाह द्वारा चलाया गया उसके पुत्र टीपू शाह धार्मिक तथा राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित थे। यह जोतदारों का जमींदारो के विरुद्ध विद्रोह था।

पश्चिमी भारत

भील विद्रोह (1812-1819, 1825, 1831, 1846)

खानदेश (गुजरात) के पश्चिमी तट के भीलों ने कंपनी सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। 1825 में सेवरम के नेतृत्व में पुनः विद्रोह हुआ।

रामोसी विद्रोह (1822-1829)

पश्चिमी घाट के रामोसी आदिवासियों ने चित्तरसिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तथा सतारा के आसपास के क्षेत्र को लूट लिया।

दक्षिणी भारत

दीवान वेलू थम्पी का विद्रोह (1805) 

ट्रावनकोर के राजा के समर्थन में उसके दीवान वेलु थम्पी ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।

वहाबी आंदोलन

यह प्रतिक्रियावादी तथा पुनरुत्थानवादी आंदोलन था। इसका उद्देश्य भारत को काफिरों के देश (दार-उल-हर्ब) से मुसलमानों के देश (दार-उल-इस्लाम) बनाना था। भारत में इसका मुख्य केंद्र पटना था। सैयद अहमद राय बरेलवी (1786-1831) इसके प्रवर्तक थे।


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