चार्वाक दर्शन का सुखवादी नीतिशास्त्र

चार्वाक दर्शन का सुखवादी नीतिशास्त्र

चार्वाक दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष ही एकमात्र ज्ञान का साधन है। जिसका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता उसका अस्तित्व भी नहीं है। चूंकि अनश्वर आत्मा, अलौकिक परमात्मा, स्वर्ग-नरक आदि हमारे इंद्रियों के किसी विषय के रूप में नहीं आते इसलिए ये सब कपोल कल्पित हैं और धूर्त्त व्यक्तियों की मनगढ़ंत रचना है। न तो स्वर्ग है, न ही अपवर्ग (मोक्ष) है। पारलौकिक आत्मा भी नहीं है। चार महाभूतों से यह शरीर बनता है। यह शरीर मृत्यु के बाद भस्मीभूत हो जाता है। राख बन जाता है, तो यह फिर से वापस कैसे आ सकता है। इस तरह पुनर्जन्म का सिद्धांत भी कोरी कल्पना है।

चार्वाक दर्शन का भौतिक वाद इहलौकिकवाद में फलित होता है। सब कुछ भूतों (मैटर) से बना है। जो कुछ भी है यहीं इसी दुनिया में है। इससे अलग कुछ भी नहीं है। इसलिए चार्वाक का उपदेश है जब तक जीना है सुख से जीओ उधार करके भी घी पीओ। यह सुखवादी आचारशास्त्र है। चार्वाक ने उसी सुख को प्राथमिकता दी है जो नजदीक हो। कल के मयूर से आज का कबूतर अच्छा है। ‘वरमद्य कपोत: श्वो मयूरात्।”

चार्वाक का कहना है कि इसी जीवन में अच्छा भोजन, ऐन्द्रिय सुख, सुंदर वस्त्र, सुगंधित पुष्प एवं अन्य पदार्थ तथा सुख और आरामदायक वस्तुओं उपभोग करना ही स्वर्ग है। ये सब वास्तविक सुख हैं। इनसे वंचित रहना दुख का कारण है। दूसरे जीवन में या अगले जन्म में आनंद की कामना करना मूर्खता है।

चार्वाक का यह कहना कि भविष्य के संभावित सुख के लिए वर्तमान के सुख को नहीं टालना चाहिए। जो सुखदायक है वही शुभ है। जो अधिक सुखकर है वह अधिक शुभ है।

चार्वाक के अनुसार धर्म का नैतिक जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं है। धर्म का उपयोग चालाक पुजारियों के द्वारा साधारण लोगों को मूर्ख बना कर अपनी आजीविका चलाना है। वेद और उपनिषद विरोधाभासी कथनों से भरे पड़े हैं। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क की अवधारणा सर्वसाधारण को भयभीत करने के लिए है। देवी-देवता तथा यज्ञ आदि विशेष वर्ग ने अपने लाभ के लिए बनाए हैं। यदि यज्ञ में बलि दिया हुआ पशु स्वर्ग को जाता तो पुजारी अपने पिता की बलि क्यों नहीं देता?

सुखवादी दर्शन के कारण चार्वाक दर्शन की काफी आलोचना की गई। लेकिन सुख की आकांक्षा आलोचना और उपहास का विषय नहीं होना चाहिए। विशेषकर तब जब हमारे देश में सुखवाद ऋग्वैदिक काल से चला आ रहा हो। ऋग्वेद में सोमरस पान, धन, यश, काम आदि को बहुत अधिक महत्व दिया गया है लेकिन इसे किसी ने हेय दृष्टि से नहीं देखा। क्योंकि यह आत्मकेंद्रित और स्वार्थपूर्ण नहीं है। चार्वाक दर्शन की कटु आलोचनाओं का मुख्य कारण उनका सुखवाद न होकर उनका घोर अधार्मिक होना प्रतीत होता है। समस्त कर्मकांडों को एक ही झटके में उस युग में चुनौती देना बहुत ही क्रांतिकारी साबित हो सकता था इसलिए इसकी कटु आलोचना की गई।

कुछ लोग धूर्त चार्वाक और सुशिक्षित चार्वाक में भेद करते हैं। ऐसा कहा जाता है सुशिक्षित चार्वाक उत्कृष्ट सुखों का अनुसरण करते थे तथा सीमित सुखवाद के हिमायती थे ताकि समाज में व्यवस्था कायम रहे। वैसे भी चार्वाक दर्शन में ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत‘ कहा गया है; उधार लेकर घी पीने के लिए कहा गया है, न कि चोरी-डकैती करके।

इस तरह चार्वाक ज्ञानमीमांसा में प्रत्यक्षवादी, तत्त्वमीमांसा में भौतिकवादी और आचार मीमांसा में सुखवादी थे। चार्वाकों के विचार भारतीय दर्शन के बहुविध होने का सबल प्रमाण है। उनको अपने विचारों को गोपनीय रूप से प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं थी। वे लोकायत थे, लोकप्रिय थे। इस प्रकार यह घोर भौतिकवादी दर्शन पद्धति भारत में आदिकाल से ही विचारों की और आचरण की स्वतंत्रता का परिचायक है।

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