भक्ति आन्दोलन
भक्ति आन्दोलन

भक्ति आन्दोलन

मध्यकालीन इतिहास का ऐसा दौर जहाँ इस्लाम धर्म अनेक हिन्दुओं द्वारा अपनाया जा रहा था, हिन्दू धर्म व समाज की स्थिति का स्तर भी अधोगति की ओर अग्रसर थी। उसी समय भक्ति का विकास हुआ।

उद्भव

प्राचीनकाल से ही मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्गो का ज्ञान था – कर्म, ज्ञान और भक्ति। प्राचीन समय में केवल कर्म, ज्ञान की ही अनुसरण किया गया। किन्तु जब परिस्थितियों में सामाजिक व धार्मिक गिरावट देखने को मिली, तभी भक्ति का उदय हुआ। जिसमे ईश्वर के प्रति प्रेम व श्रद्धा को उजागर किया गया। मनुष्य को समझाया गया कि ईश्वर हृदय में निवास करते है। स्वयं को ईश्वर के प्रति समर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति होगी। उनके प्रति समर्पण की भावना को प्रेरित किया गया।

भक्ति आन्दोलन का आरम्भ दक्षिण भारत में आलवार एवं नयनार संतों द्वारा हुआ जो पुरे दक्षिण एशिया फैला। इसमें कई संतो ने प्रचार किया। इस आन्दोलन के मुख्य कारण में मुस्लिम शासन की स्थापना, हिन्दुओं की सामाजिक व धार्मिक स्थिति की दुर्दशा, अनेक हिन्दुओं का दबाव में आकर इस्लाम अपनाना, इत्यादि रहें।

इस आन्दोलन के प्रचार हेतु संतो द्वारा दो प्रकार के उपदेश दिए गये –

  1. सकारात्मक उपदेश – ईश्वर पर विश्वास और उसकी आराधना पर जोर दिया, गुरुसेवा, भाईचारे व समानता पर जोर दिया गया। लोगों के मन से भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया गया।
  2. नकारात्मक उपदेश – मूर्ति पूजा, कर्मकांड, यज्ञ, पुरोहित अन्य आडम्बर का विरोध किया गया। छुआछुत का विरोध किया गया।

इन उपदेशो के कारण बहुत से प्रभाव दिखे और यह आन्दोलन 6 वी सदी से 18 वी सदी तक चलता रहा।

भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संत

दक्षिण भारत के संत

मुख्यतः इस आन्दोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से हुयी जिसके प्रमुख नेता शंकराचार्य थे।

रामानुजाचार्य – दक्षिण भारत के प्रथम संत थे। जो शुरुआत में शंकराचार्य मत के अनुयायी थे। अंततः उन्होंने वैष्णव धर्म को अपनाया व विशिष्टद्वेतावाद दर्शन का प्रचार किया। रामानुजाचार्य को दक्षिण भारत में विष्णु का अवतार माना जाता है।

निम्बार्काचार्य – इन्होने सनक संप्रदाय की स्थापना कर द्वैताद्वैत दर्शन का प्रचार किया। जो द्वैतवाद व अद्वैतवाद के मध्य समन्वय करता है।

मध्वाचार्य – इन्होने ब्रह्मा संप्रदाय की स्थापना कर द्वैतावाद दर्शन का प्रचार किया।

उत्तर भारत के संत

दक्षिण भारत से भक्ति आन्दोलन को उत्तर भारत लाने का श्रेय रामानंद को जाता है.

रामानंद – इन्होने बैरागी संप्रदाय की स्थापना की व राम की आराधना पर बल दिया। इन्होने स्त्री के लिए मोक्ष का मार्ग खोला, जातिगत भेदभाव का विरोध किया। इनके द्वारा ही कहा गया:

जात पात पूछे नहीं कोई , हरि को भजे सो हरि का होई।

कबीरदास – यह रामानंद के शिष्य थे। यह निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। इन्होंने सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया जैसे,  मूर्तिपूजा, कर्मकांड इत्यादी। इनके अनुयायी कबीरपंथी कहलाए। उनकी वाणी का सार बीजक नामक ग्रन्थ में संकलित है।

गुरुनानक – यह बाबर के समकालीन थे। गुरुनानक ने नानक पंथ की स्थापना की जो बाद में सिख संप्रदाय में परिवर्तित हो गया।

वल्लभाचार्य – इनका जन्म छत्तीसगढ़ के चम्पारण में हुआ था। इनके भक्ति मार्ग को पुष्टिमार्ग कहा जाता है। इन्होने शुद्धाद्वैतवाद दर्शन का प्रतिपादन किया।

सूरदास – ये वल्लभाचार्य के शिष्य थे। जो कि सगुण कृष्ण भक्ति शाखा के अनुयायी थे।  इन्होने सूरसागर की रचना की।

इसके अतिरिक्त चैतन्य प्रभु, मीराबाई, तुलसीदास, ज्ञानेश्वर, रामदास, दादूदयाल (अकबर के समकालीन) तुकाराम आदि इससे संबंधित रहे।

विकास

भक्ति आन्दोलन दो भागो में बटा –

  1. निर्गुण भक्ति जिसमे प्रेम व ज्ञान के द्वारा लोगो में प्रचार हुआ
  2. सगुण भक्ति – जिसमे भगवान की उपस्थिति को बताया गया व यह व् दो भागो में बटा –
    1. कृष्णा भक्ति – इसके प्रमुख वल्लभाचार्य, सूरदास, मीराबाई, रसखान जैसे संत हुए।
    2. रामभक्ति – इसके अनुयायी तुलसीदास, अग्रदास, नाभादास जैसे संत हुए।

कुछ संबधित तथ्य –

  • रामदास महाराष्ट्र के महान संत कवि थे। यह शिवाजी के अध्यात्मिक गुरु थे। ये धरकारी सम्प्रदाय से सम्बंधित थे।
  • तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस की रचना की तथा रामभक्ति को प्रसिद्धि दिलायी। विनयपत्रिका, दोहावली जानकीमंडल इनकी अन्य रचनाये हैं।
  • महाराष्ट्र के इस्लाम धर्म से प्रभावित संत नामदेव ने बरकरी संप्रदाय की स्थापन की।
  • भक्ति आंदोलन का प्रभाव इस्लाम के अनुयायियों  पर भी पड़ा। रहीम और सैयद इब्राहिम रसखान जैसे संतों ने भी हिन्दू  देवी-देवताओं एवं निर्गुण ब्रह्म की उपासना की।
  • भक्ति आन्दोलन में प्रचार का प्रमुख साधन क्षेत्रीयता रही। क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषाओं जैसे अवधि, ब्रज आदि में साहित्य रचना हुईं।
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