भारत छोड़ो आन्दोलन

भारत छोड़ो आन्दोलन‘ या ‘अगस्त क्रान्ति’ भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन  की अन्तिम महान् लड़ाई थी, जिसने ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया और भारत को आजादी देनी ही पड़ी।

परिस्थितियां

दूसरे विश्वयुद्ध  के कारण परिस्थितियाँ अत्यधिक गम्भीर होती जा रही थीं। जापान सफलतापूर्वक सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर क़ब्ज़ा कर भारत की ओर बढ़ने लगा, दूसरी ओर युद्ध के कारण तमाम वस्तुओं के दाम बेतहाशा​ बढ़ रहे थे जिससे अंग्रेज़ सत्ता के ख़िलाफ़ भारतीय जनमानस में असन्तोष व्याप्त होने लगा था। जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व  को देखकर 5 जुलाई, 1942 ई. को गाँधी जी ने हरिजन में लिखा “अंगेज़ों! भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।

क्रिप्स मिशन का आगमन

मित्र देश, अमेरिका, रूस व चीन ब्रिटेन पर लगातार दबाव डाल रहे थे कि इस संकट की घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन प्राप्त करने के लिए पहल करे। ब्रिटेन ने इसी उद्देश्य से स्टेफ़ोर्ड क्रिप्स को मार्च, 1942 ई. में भारत भेजा। ब्रिटिश सरकार भारत को पूर्ण स्वतंत्रता देना नहीं चाहती थी। वह भारत की सुरक्षा अपने हाथों में ही रखना चाहती थी और साथ ही गवर्नर-जनरल के वीटो अधिकारों को भी पहले जैसा ही रखने के पक्ष में थी। भारतीय प्रतिनिधियों ने क्रिप्स मिशन के सारे प्रस्तावों को एक सिरे से ख़ारिज कर दिया। गाँधीजी ने तो क्रिप्स प्रस्ताव को  पोस्ट डेटेड चेक कहा ।

वर्धा प्रस्ताव

गाँधी जी ने वर्धा के कांग्रेस अधिवेशन में ‘अँगरेजों भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस को अपने प्रस्ताव को न स्वीकार किये जाने की स्थिति में चुनौती देते हुए कहा कि “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दूंगा।” अंतत: 14 जुलाई, 1942 ई. में कांग्रेस कार्यसमिति की वर्धा बैठक में गाँधी जी के इस विचार को पूर्ण समर्थन मिला कि भारत में संवैधानिक गतिरोध तभी दूर हो सकता है जब अंग्रेज़ भारत से चले जायें। इसमें यह निर्णय लिया गया कि अंग्रेज़ों को हर हाल में भारत छोड़ना ही पड़ेगा। भारत अपनी सुरक्षा स्वयं ही करेगा और साम्राज्यवाद तथा फ़ाँसीवाद के विरुद्ध रहेगा। यदि अंग्रेज़ भारत छोड़ देते हैं, तो अस्थाई सरकार बनेगी अन्यथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ‘नागरिक अवज्ञा आन्दोलन’ छेड़ा जाएगा और इसके नेता गांधी जी होंगे।

पंडित नेहरू तब भी सशंकित थे। 01अगस्त, 1942 ई. को इलाहाबाद में ‘तिलक दिवस’ मनाया गया। इस अवसर पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा- “हम आग से खेलने जा रहे हैं। हम दुधारी तलवार का प्रयोग करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टी हमारे ऊपर भी पड़ सकती है।”


अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक

आन्दोलन के दौरान 8 अगस्त, 1942 ई. को ‘अखिल भारतीय कांग्रेस’ की बैठक बम्बई के ऐतिहासिक ‘ग्वालिया टैंक’ मैदान में हुई। गाँधी जी के ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ को कांग्रेस कार्यसमिति ने कुछ संशोधनों के बाद 8 अगस्त, 1942 ई. की स्वीकार कर लिया। युद्ध की तेयारी में सहयोग देने के प्रस्ताव के साथ-साथ सरकार को तत्काल क़दम उठाने की चुनौती दी गयी। कहा गया कि “भारत की स्वतंत्रता की घोषणा के साथ एक अस्थायी सरकार गठित हो जायगी और स्वतंत्र भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का एक मित्र बनेगा।” मुस्लिम लीग से वायदा किया गया कि ऐसा संविधान बनेगा, जिसमें संघ में शामिल होने वाली इकाइयों को अधिकाधिक स्वायत्तता मिलेगी और बचे हुए अधिकार उसी के पास रहेंगें। प्रस्ताव का अंतिम अंश था- “देश ने साम्राज्यवादी सरकार के विरुद्ध अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी है। अब उसे उस बिन्दु से लौटाने का बिल्कुल औचित्य नहीं है। अतः समिति अहिंसक ढंग से, व्यापक धरातल पर गाँधी जी के नेतृत्व में जनसंघर्ष शुरू करने का प्रस्ताव स्वीकार करती है।”

मूलमंत्र ‘करो या मरो’

इस ऐतिहासिक सम्मेलन में महात्मा गाँधी ने लगभग 70 मिनट तक भाषण दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि “मैं आपको एक मंत्र देता हूँ, करो या मरो, जिसका अर्थ था- भारत की जनता देश की आज़ादी के लिए हर ढंग का प्रयत्न करे। गाँधी जी के बारे में बी पट्टाभि सीतारामैया ने लिखा है कि “वास्तव में गाँधी जी उस दिन अवतार और पैगम्बर की प्रेरक शक्ति से प्रेरित होकर भाषण दे रहे थे।” ‘वह लोग जो कुर्बानी देना नहीं जानते, वे आज़ादी प्राप्त नहीं कर सकते।’ भारत छोड़ो आन्दोलन का मूल भी इसी भावना से प्रेरित था। गाँधी जी वैसे तो अहिंसावादी थे, मगर देश को आज़ाद करवाने के लिए उन्होंने ‘करो या मरो’ का मूल मंत्र दिया। अंग्रेज़ी शासकों की दमनकारी, आर्थिक लूट-खसोट, विस्तारवादी एवं नस्लवादी नीतियों के विरुद्ध उन्होंने लोगों को क्रमबद्ध करने के लिए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ छेड़ा था। गाँधी जी के इन शब्दों ने भारत की जनता पर जादू-सा असर डाला और वे नये जोश, नये साहस, नये संकल्प, नई आस्था, दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। देश के कोने-कोने में ‘करो या मरो’ की आवाज़ गुंजायमान हो उठी।

गिरफ़्तारियां

ऑपरेशन जीरो ऑवर

9 अगस्त को रात में सुबह होने से पहले ही ‘ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर’ के तहत कांग्रेस के सभी महत्त्वपूर्ण नेता गिरफ्तार कर लिये गये। गाँधी जी को पूना के ‘आगा ख़ाँ महल’ में तथा कांग्रेस कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों को अहमदनगर के दुर्ग में रखा गया। कांग्रेस को अवैधानिक संस्था घोषित कर ब्रिटिश सरकार ने इस संस्था की सम्पत्ति को जब्त कर लिया और साथ में जुलूसों को प्रतिबंधित कर दिया।

आंदोलन का प्रभाव

सरकार के इस कृत्य से जनता में आक्रोश व्याप्त हो गया। जनता ने स्वयं अपना नेतृत्व संभाल कर जुलूस निकाला और सभाऐं कीं। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान यह पहला आन्दोलन था, जो नेतृत्व विहीनता के बाद भी उत्कर्ष पर पहुँचा। सरकार ने जब आन्दोलन को दबाने के लिए लाठी और बंन्दूक का सहारा लिया तो आन्दोलन का रूख बदलकर हिंसात्मक हो गया। अनेक स्थानों पर रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं और स्टेशनों में आग लगा दी गई। बम्बई, अहमदाबाद एवं जमशेदपुर में मज़दूरों ने संयुक्त रूप से विशाल हड़ताल कीं। संयुक्त प्रांत में बलिया एवं बस्ती, बम्बई में सतारा, बंगाल में मिदनापुर एवं बिहार के कुछ भागों में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के समय अस्थायी समानांतर सरकारों की स्थापना की गयी।

इस आन्दोलन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र थे- बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास एवं बम्बई। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया एवं अरुणा असिफ़ अली जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया।

बम्बई में उषा मेहता एवं उनके कुछ साथियों ने कई महीने तक कांग्रेस रेडियो का प्रसारण किया। राममनोहर लोहिया नियमित रूप से रेडियो पर बोलते थे। नवम्बर 1942 ई. में पुलिस ने इसे खोज निकाला और जब्त कर लिया।

आंदोलन की समाप्ति

भारत छोड़ो आन्दोलन‘ मूल रूप से एक जनांदोलन था, जिसमें भारत का हर जाति वर्ग का व्यक्ति शामिल था। इस आन्दोलन ने युवाओं को एक बहुत बड़ी संख्या में अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। युवाओं ने अपने कॉलेज छोड़ दिये और वे जेल का रास्ता अपनाने लगे।

जून 1944 ई. में जब विश्वयुद्ध समाप्ति की ओर था, गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया गया। इसी समय 1945 ई. में ब्रिटेन में ‘लेबर पार्टी’ की सरकार बन गई। यह सरकार पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में थी। उसी समय वायसराय लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों का आयोजन किया।

आन्दोलन की आलोचना

‘साम्यवादी दल’ ने इस आन्दोलन की आलोचना की क्योंकि उनका आका देश सोवियत संघ नाजीवादियों के खिलाफ युद्ध रत है।

मुस्लिम लीग ने भी ‘भारत में छोड़ो आन्दोलन’ की आलोचना करते हुए कहा कि “आन्दोलन का लक्ष्य भारतीय स्वतन्त्रता नहीं, वरन भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना करना है, इस कारण यह आन्दोलन मुसलमानों के लिए घातक है।”

उदारवादियों को भी यह आन्दोलन नहीं भाया। सर तेज़बहादुर सप्रू ने इस प्रस्ताव को ‘अविचारित तथा असामयिक’ बताया।

भीमराव अम्बेडकर ने इसे ‘अनुत्तरदायित्व पूर्ण और पागलपन भरा कार्य’ बताया। ‘

हिन्दू महासभा’ एवं ‘अकाली आन्दोलन’ ने भी इसकी आलोचना की।

आंदोलन का महत्व

भारत छोड़ो आंदोलन आजादी की लड़ाई का अंतिम और काफी हद तक सफल आंदोलन था। इतना सफल कि देश की आजादी के लिए इसके बाद किसी दूसरे आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ी।

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