मथुरा कला शैली

मथुरा कला

मथुरा कला शैली गांधार शैली के समान ही कुषाण काल में प्रचलित थी। मथुरा इस शैली का एक विशाल केंद्र था। यहां असंख्य मूर्तिकार कार्य करते थे। मथुरा शैली दो शैलियों के मिश्रण से उत्पन्न हुई थी; भरहुत शैली और सांची शैली

मुख्य कलाकृतियां

मथुरा कला (शैली) में विभिन्न धर्मों से संबंधित देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई गईं। प्रमुख प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्व महात्मा बुद्ध की मूर्तियों का है। सारनाथ, श्रावस्ती एवं कौशांबी में मथुरा कला शैली की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैंं‌। इन प्रतिमाओं में महात्मा बुद्ध को खड़े हुए दर्शाया गया है। बुद्ध का बांया हाथ कमर पर रखा हुआ है तथा दाया हाथ कंधे तक अभय मुद्रा में उठा हुआ है। पद्मासन वाली प्रतिमाओं में पैरों के मध्य सिंह की प्रतिमा है। महात्मा बुद्ध का सिर मुुंडित है। शरीर का ऊपरी भाग उत्तरीय विधि से चादर से ढका हुआ है तथा अधोवस्त्र कमर पर मेखला की गांठ से बंधा हुआ है। महात्मा बुद्ध की कुछ मूर्तियों में सिर के पीछे चक्र फलक बना हुआ है।

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मथुरा कला महात्मा बुद्ध

मथुरा संग्रहालय में महात्मा बुद्ध, कनिष्क एवं कुबेर की प्रतिमाएं सुरक्षित हैं।

रामनगर (मथुरा) से प्राप्त महात्मा बुद्ध की आदमकद मूर्ति

मथुरा कला

कुषाण काल की मूर्तिकला का सुंदर उदाहरण है- रामनगर (मथुरा) से प्राप्त महात्मा बुद्ध की आदमकद मूर्ति। इस प्रतिमा में महात्मा बुद्ध का दाया हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है उनके दाएं हाथ की हथेली में अलंकृत चक्र तथा उंगलियों के आगे के भाग पर स्वास्तिक का चिन्ह साफ-साफ दिखाई दे रहा है। केेश मुंडे हुए हैं। कपड़ों में सलवटों का अंकन अत्यंत सूक्ष्मता से किया गया है। महात्मा बुद्ध के नेत्र गोलाकार हैं तथा दोनों भौहों के मध्य ऊर्णा उत्कीर्ण हैं। गौतम बुध का संपूर्ण मुखमंडल प्रभावी दिखाई देता है।

कनिष्क की सिर विहीन प्रतिमा

मथुरा कला कनिष्क

मांट से प्राप्त कुषाण नरेश कनिष्क की मूर्ति भी बहुत महत्वपूर्ण है। यह खंडित अवस्था में मिली है। इस मूर्ति का सिर गायब है। इसमें ब्राम्ही लिपि में एक लेख है जिसमें ‘महाराजा राजातिराजा देवपुत्रो कनिष्को’ लिखा हुआ है। इसी से कनिष्क के रूप में इसकी पहचान की जाती है। प्रतिमा में कनिष्क को एक योद्धा के रूप में दिखाया गया है। उसके दाहिने हाथ में गदा तथा बाएं हाथ में म्यान में बंद तलवार है। पैरों में भारी जूते पहने हुए है। प्रतिमा में कनिष्क को लंबा कोट एवं सलवार पहने हुए दिखाया गया है।

सुरापान करते हुए कुबेर की प्रतिमा

मथुरा संग्रहालय में एक अन्य प्रतिमा है सुरापान करते हुए कुबेर की। कुबेर का पेट बड़ा है। वह चट्टान पर बैठा हुआ सुरापान में व्यस्त है। उसके निकट ही तीन सुंदरियां खड़ी हुई हैं जो हाथों में मदिरा से भरे चषक(कप) ली हुई हैं। कुबेर को भी हाथों में चषक लिए हुए दिखाया गया है। सुंदरियां ईरानी वेशभूषा धारण की हुई हैं। लेकिन कुबेर ने जो धोती पहनी हुई है वह पूरी तरह से भारतीय है।

प्रसाधिका की प्रतिमा

मथुरा कला प्रसाधिका
प्रसाधिका (ब्यूटिशियन)

काशी कला भवन में सुरक्षित प्रसाधिका (ब्यूटीशियन) की प्रतिमा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिमा में प्रसादिका को अत्यंत सुसज्जित दिखाया गया है। इसका मुंह गंभीर, प्रसन्न एवं सुंदर है। आंखों में चंचलता है। संपूर्ण अंग अत्यंत सुडौल है तथा खड़े होने का ढंग भी सरल और स्वभाविक है। वह दाएं हाथ में सिंगारदानी रखी हुई है। बायें हाथ में एक पिटारी है जिसका ढक्कन थोड़ा खुला हुआ है तथा फूलों की एक माला थोड़ी बाहर निकली हुई है। यह नारी किसी रानी या धनाढ्य महिला का श्रृंगार करने के लिए जाने की मुद्रा में है।

वस्त्र धारण करती हुई नारी

मथुरा संग्रहालय की एक नारी मूर्ति अत्यंत सजीव है जिसमें स्नान के बाद वस्त्र धारण करती हुई महिला को दर्शाया गया है।

स्तंभ कला

मथुरा से कुषाण काल की कुछ वेदिका स्तंभ भी मिले हैं। इन पर महात्मा बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं के दृश्य अंकित हैं। कुछ अन्य स्तंभों पर महाभारत के प्रसंग उत्कीर्ण हैं। कुछ स्तंभों को लताओं, फूलों,पशु-पक्षियों के चित्रों से सजाया गया है। जबकि अन्य कुछ पर लोक-जीवन के दृश्य उकेरे गए हैं; जैसे, नृत्य करती नारियां, बगीचे में फूल चुनती स्त्री आदि।

मथुरा कला की विशेषताएं

उपरोक्त वर्णन से मथुरा कला की निम्नलिखित विशेषताएं स्पष्ट होती हैं:

  1. हालांकि मथुरा कला में धार्मिक प्रसंगों को भी लिया गया है लेकिन इसमें मुख्य रूप से लोक जीवन का प्रतिपादन किया गया है।
  2. मथुरा कला में श्रृंगार रस का पर्याप्त चित्रण हुआ है।
  3. मथुरा कला में भरहुत की लोक कला शैली और सांची की नागर कला शैली का सुंदर समन्वय हुआ है।
  4. संभवतः मथुरा कला में ही व्यक्ति विशेष की प्रतिमाओं का सर्वप्रथम निर्माण हुआ ।
  5. मूर्तियों के निर्माण में चित्तीदार पत्थर का उपयोग हुआ है।
  6. मथुरा कला शैली भावना प्रधान, आदर्शवादी और प्रतीकात्मक है।
  7. मथुरा कला में मनुष्य को प्रकृति की सुन्दर पृष्ठभूमि में दर्शाया गया है।
  8. बुद्ध की प्रतिमाएं भारी शरीर वाली हैं।
  9. मथुरा शैली में बुद्ध को मुंडित सिर दिखाया गया है।
  10. अधीकांश प्रतिमाओं में आभामंडल दिखाया गया है।

गांधार कला शैली और मथुरा शैली में अंतर

  1. गांधार कला शैली में अंग सौष्ठव और परिधान-सौंदर्य पर जोर दिया गया है जबकि मथुरा कला में भावनात्मक सुंदरता और आध्यात्मिकता पर बल दिया गया है।
  2. गांधार कला यथार्थवादी है जबकि मथुरा कला आदर्शवादी।
  3. गांधार कला पर बहुत अधिक यूनानी प्रभाव है। इसके विपरीत मथुरा कला पर विदेशी प्रभाव बहुत कम है।
  4. गांधार कला का मुख्य प्रतिपाद्य बुद्ध और बौद्ध धर्म है जबकि मथुरा कला का विषय काफी व्यापक है। इसमें बौद्ध धर्म के साथ साथ हिंदु धर्म के प्रसंगों का भी चित्रण किया गया है।
  5. गांधार कला में लोक जीवन और प्राकृतिक दृश्यों की कमी है लेकिन मथुरा कला में लौकिक और प्राकृतिक विषयों से संबंधित कला कृतियों की भरमार है।
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