मौर्योत्तर काल के प्रमुख राजवंश

शुंग वंश

  • वृहद्रथ अंतिम मौर्य शासक था. उसे उसके ब्राह्मण मंत्री और सेनानायक पुष्यमित्र शुंग ने मारकर 185 ई.पू. में शुंग वंश की स्थापना की.
  • शुंग वंश के 9 वें शासक भागभद्र (भागवत) के दरबार में तक्षशिला के शासक एनटिअलकिडस का राजदूत हेलियोडोरस आया था. उसने ‘वासुदेव‘ (श्री कृष्ण) के सम्मान में बेसनगर (विदिशा) में गरुड़ध्वज की स्थापना की तथा अपने को भागवत कहा.

कण्व वंश

  • शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था, जिसे उसके मंत्री वासुदेव ने मारकर कण्व वंश की स्थापना की.

बक्ट्रिया के यूनानी

  • प्रथम इन्डोग्रीक शासक डेमेट्रिअस था.
  • यूनानियों में सबसे मशहूर शासक मीनेन्डर (165-145 ई.पू.) था.
  • इसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था.
  • बौद्ध ग्रन्थ मिलिंद पन्हों (मिलिंद प्रश्न) में मीनेन्डर तथा बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच वार्तालाप का पर्श्नोत्तर शैली में उल्लेख है.
  • यवनों का उल्लेख गार्गीसंहिता (ज्योतिष ग्रन्थ) में हुआ है. भारतीयों ने ज्योतिष और खगोल के बारे में कुछ तथ्य यूनानियों से प्राप्त किया.
  • गंधार और मथुरा की बुद्ध मूर्तियों पर यूनानी कला का प्रभाव है.
  • भारत में पहली बार यूनानियों ने सोने के सिक्के जारी किये जबकि ज्यादा संख्या में सोने के सिक्के कुषाणों द्वारा जारी किया गया.

शक (सीथियन)

  • प्रथम शक राजा मौस अथवा मोग था.
  • 57 या 58 ई.पू में उज्जैन के एक शासक विक्रमादित्य ने शकों को हराया जिसके उलक्ष्य में विक्रम संवत शुरू किया.
  • भारत में सबसे प्रसिद्ध शक शासक रुद्रदामन था. वह उज्जैन का क्षत्रप था.
  • सुदर्शन झील जिसे चन्द्रगुप्त मौर्य के समय बनाया गया था और जिसकी मरम्मत अशोक ने करवाई थी, रुद्रदामन के समय दूसरी बार ठीक कराई गयी. तीसरी मरम्मत स्कंदगुप्त के समय में हुयी.
  • जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत में है जिसे रुद्रदामन ने उत्कीर्ण करवाया था.

पार्थियन (पह्लव)

  • इन राजाओं में गोन्डोफर्नेस सबसे ज्यादा प्रसिद्ध था. इसके समय में सेंट थॉमस ईसाई धर्म प्रचार करने भारत आया.

कुषाण वंश

  • कुषाण चीन के यूची कबीले से थे.
  • इनका पहला शासक कुजुल कडफिसस था.
  • दूसरा शासक वीम कडफिसस था.
  • कुषाणों का सबसे प्रसिद्ध शासक कनिष्क था.
  • कनिष्क के राज्याभिषेक की तिथि 78 ई. थी, इसी तिथि से शक संवत प्रारंभ हुआ.
  • इसकी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी.
  • कनिष्क ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया.
  • उसने कश्मीर में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन करवाया, इसमें वसुमित्र अध्यक्ष थे.
  • अश्वघोष, नागार्जुन जैसे विद्वान और प्रख्यात चिकित्सक चरक उनकी सभा में थे.

सातवाहन वंश

सातवाहन वंश की स्थापना आंध्र (गोदावरी और कृष्णा नदियों की घाटी) में सिमुक नामक व्यक्ति ने लगभग 60 ईसवी पूर्व में की। उसकी राजधानी प्रतिष्ठान या पैठन नामक नगरी थी। इस वंश को आंध्र/आंध्र भृत्य के नाम से भी जाना जाता है। सातवाहन ब्राह्मण थे। लेकिन उन्होंने जैन तथा बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दिया। सिमुक का राज्यकाल लगभग 60 ईसवी पूर्व से 37 ईसवी पूर्व माना जाता है। सिमुक के बाद उसका भाई कृष्ण शासक हुआ। सिमुक ने 23 वर्ष तथा कृष्ण ने 18 वर्ष तक शासन किया।

  • सातवाहन वंश के प्रथम प्रतापी नरेश के रूप में शातकर्णी प्रथम का नाम नाणेघाट अभिलेख से ज्ञात होता है। शातकर्णी प्रथम ने शुंगों पर विजय के उपरांत अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञ करवाया तथा पूरे दक्षिण में अपनी सार्वभौम सत्ता की स्थापना की। शातकर्णी ने कुल 9 वर्ष शासन किया। उसने मालवा पर विजय प्राप्त की। शातकर्णी प्रथम को उसकी रानी नायानिका या नागनिका के नाणेघाट या ननेघाट अभिलेख में ‘दक्षिणापथ का स्वामी’ एवं ‘अप्रतिहत रथ का एक चालक’ की उपाधि दी गयी है। नाणेघाट पूणे के पास पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला में स्थित है।
  • सातवाहनों का इतिहास शातकर्णी प्रथम की मृत्यु के बाद अंधकार में है। शातकर्णी प्रथम की मृत्यु के बाद शकों के आक्रमणों के कारण सातवाहनों की शक्ति का ह्रास होने लगा और महाराष्ट्र में शक क्षत्रप वंश का शासन आरंभ हुआ जो पश्चिमी क्षत्रप कहलाए।
  • हाल (20-24 ई.) सातवाहन वंश का 17वां राजा था। वह कवि भी था। गाहा सतसई (गाथा सप्तशती) की रचना सातवाहन नरेश हाल के द्वारा की गई। कातंत्र का लेखक सर्ववर्मन भी हाल की राज्यसभा में था। कातंत्र एक व्याकरण ग्रन्थ है।

गौतमीपुत्र शातकर्णी

सातवाहन वंश के 23वें शासक के रूप में गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम तथा उसकी उपलब्धियों का वर्णन नासिक अभिलेख से मिलता है। गौतमी पुत्र शातकर्णी सातवाहन वंश का सबसे प्रतापी शासक था। गौतमी पुत्र शातकर्णी के अधीन सातवाहन सत्ता का पुनरभ्युदय हुआ। उसे शकों, पहलवों और यवनों का विनाशक कहा गया है। उसने शक शासक नहपान के क्षहरात वंश का अंत किया। उसने 24 वर्षों तक शासन किया तथा शकों से मधुर संबंध बनाने महाक्षत्रप रुद्रदामन के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित की। नासिक जिले के वेनकटक नामक नगर का निर्माण करवाया था । उसने बड़ी संख्या में चांदी के सिक्के चलाए। उसका साम्राज्य विदर्भ से लेकर दक्षिण में बनवासी ( या वैजयन्ती कर्नाटक) तक फैला था। उसने त्रि-समुद्र-तोय-पिता-वाहन की उपाधि धारण की जिसका अर्थ है तीनों समुद्रों तक फैले क्षेत्र का स्वामी। उसकी मृत्यु के बाद उसकी माता गौतमी बालाश्री ने अपने नासिक अभिलेख में उसके कार्यों का उल्लेख किया है।

  • गौतमीपुत्र शातकर्णी की मृत्यु के बाद वशिष्ठी पुत्र पुलुमावी शासक बना। उसने सातवाहन साम्राज्य का विस्तार किया। उसके समय में सातवाहनों की नौसैनिक शक्ति का विकास हुआ। विख्यात भूगोल शास्त्री टालेमी ने भी पुलुमावी की कीर्ति का उल्लेख किया है।
  • पुलुमावी के 24 वर्षीय शासन के पश्चात उसका भाई शिवश्री शातकर्णी राजा बना जिसने 7 वर्ष शासन किया।
  • सातवाहन वंश के 27वें शासक यज्ञश्री शातकर्णी ने उज्जैनी के शक क्षत्रपों से अपने पूर्वजों के कुछ क्षेत्रों पर फिर से अधिकार प्राप्त कर लिया। यह सातवाहन वंश का अंतिम प्रतापी शासक था। यज्ञश्री की कुछ मुद्राओं में जलयान अंकित है इससे प्रतीत होता है कि उसका राज्य समुद्रों तक विस्तृत था। वह अपने वंश का अंतिम महान शासक था। इसने लगभग 27 वर्ष शासन किया।
  • यज्ञ श्री के पश्चात इस वंश का पतन हो गया। चतुर्थ पुलुमावी को इस वंश का अंतिम राजा कहा गया है। तीसरी शताब्दी आते-आते सातवाहन वंश का साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया।
  • सातवाहनों ने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि अनुदान दिए। साथ ही वे पहले शासक थे जिन्होंने ब्राह्मणों को भूमि दान में दिए। इस प्रकार की भूमि को अग्रहार कहा जाता था।
  • सातवाहन सामाजिक ढांचा मातृसत्तात्मक अर्थात वंश परंपरा में मां प्रधान थी। कुछ रानियों ने अभिभावक के रूप में शासन कार्य भी संभाला परंतु ध्यान रखने की बात है कि सातवाहन राजवंश पितृसत्तात्मक था क्योंकि राज्य शासन का उत्तराधिकारी पुरुष सदस्यों में से होता था।
  • सातवाहनों के समय जिले को अशोक के साम्राज्य की तरह अहार ही कहा जाता था और अधिकारियों को को अमात्य और महामात्य।
  • इस काल में भारत का रोमन साम्राज्य से व्यापार होता था । इस व्यापार से सबसे ज्यादा लाभ सातवाहनों को होता था क्योंकि इनका क्षेत्र समुद्र तट तक फैला था। व्यापार में निर्यात होने वाली वस्तुओं थी हाथी दांत और विलासिता की वस्तुएं और मसाले। रोमन लोगों में काली मिर्च की बहुत ज्यादा मांग थी इसलिए प्राचीन काल में काली मिर्च को यावनप्रिया कहा। चीन से रेशम के धागे आयातित किए जाते थे तथा उससे बने हुए कपड़ों का रोमन साम्राज्य को निर्यात होता था। रोम से गेंहू, सीसा, तांबा, टिन आदि मंगाया जाता।
  • सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी थी। सातवाहनों ने ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षु को करमुक्त गांव अनुदान में दिया तथा उस गांव को सभी तरह के क्षेत्र से हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया इस कारण सातवाहन काल में बौद्ध धर्म के बहुत उन्नति हुई। आंध्र प्रदेश के नागार्जुनकोंडा और अमरावती सातवाहन काल के प्रसिद्ध बौद्ध केंद्र थे।

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