हीगेल का प्रत्ययवाद, निरपेक्ष प्रत्ययवाद या द्वंद्ववाद : Hegelianism [Mains दर्शनशास्त्र]

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हीगेल का प्रत्ययवाद, निरपेक्ष प्रत्ययवाद या द्वंद्ववाद

जर्मन दर्शनशास्त्री हीगेल का विचार निरपेक्ष प्रत्ययवाद कहलाता है। प्रत्ययवाद नाम से ही स्पष्ट है कि इसके अनुसार विश्व का मूलभूत कारण कोई भौतिक पदार्थ न होकर चेतना या विचार या प्रत्यय (आइडिया) है। हीगेल के अनुसार यह विश्व निरपेक्ष प्रत्यय की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।

वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद

हीगेल का प्रत्ययवाद वस्तुनिष्ठ है, आत्मगत नहीं है। बर्कले आदि आत्मगत प्रत्ययवादियों के अनुसार यह विश्व दृष्टा के मन-मस्तिष्क की उपज है। कोई वस्तु इसलिए है क्योंकि उसे देखने वाला है। परंतु हीगेल के अनुसार यह जगत् निरपेक्ष प्रत्यय की वास्तविक अभिव्यक्ति है। इसलिए मनोबाह्य और वास्तविक है।

शंकराचार्य से भिन्नता

हीगेल का शंकराचार्य से भी विरोध है। शंकराचार्य के अद्वैतवाद के अनुसार केवल ब्रह्म सत्य है और यह जगत् जो माया के प्रभाव से आभासित होता है, वह मिथ्या है। हीगेल के अनुसार जगत् परम सत्ता का विवर्त मात्र न होकर वास्तविक अभिव्यक्ति है।

रामानुज से समानता

हीगेल इस संबंध में रामानुजाचार्य के करीब हैं। रामानुजाचार्य के अनुसार जगत् ईश्वर की सृष्टि का वास्तविक परिणाम है। हीगेल के अनुसार भी जगत के सभी चर-अचर परम सत्ता की अभिव्यक्तियां हैं। ये सब वास्तविक हैं। लेकिन एक अंतर यहां भी है। रामानुजाचार्य का ईश्वर जीव और जगत् से विशिष्ट है, इसलिए विशिष्टाद्वैतवाद हुआ; परंतु हीगेल का परम सत् निरपेक्ष प्रत्यय है।

सत् तार्किक है, तार्किक सत् है

हीगेल में बुद्धिवाद का चरम रूप दिखाई देता है। हीगेल के अनुसार परम सत्ता या निरपेक्ष प्रत्यय तार्किक या बौद्धिक भी है। तत्त्वमीमांसा और तर्कशास्त्र में कोई अंतर नहीं है क्योंकि जो सत्ता की कोटियां हैं वही बुद्धि की कोटियां हैं। इसलिए जो तार्किक है वह सत् है और जो सत् है वह तार्किक है।

कांट के अज्ञेयवाद का विरोध

बुद्धि की क्षमता के बारे में हीगेल का कांट से भिन्न मत है। इमैनुएल कांट के अनुसार हम बाह्य जगत की वस्तुओं को उनसे प्राप्त संवेदनाओं के द्वारा जानते हैं। वस्तुओं की संवेदनाएं हमें देश और काल के सांचों में ढल कर प्राप्त होती हैं। इन्हें बुद्धि अपनी कोटियों के अनुरूप ज्ञान में बदलती है। इस तरह हमें जो ज्ञान होता है वह संवेदना, देश, काल और बुद्धि की कोटियों की सीमाओं ही होता है। इनके माध्यम से हम ‘हमारे लिए वस्तुएं’ (थिंग्स फार अस) को ही जान सकते हैं। ‘अपने आप में वस्तुएं’ (थिंग्स इन देमसेल्व) कैसी हैं?

हमारी सीमित बुद्धि के परे है। हम केवल वस्तुओं के प्रपंच (फेनोमेना) को जानते हैं हीगेल ने कांट के इस अज्ञेयवाद को ठुकरा दिया। हीगेल के अनुसार वस्तुएं, उनकी संवेदनाएं, देश, काल, बुद्धि की कोटियां आदि सभी निरपेक्ष प्रत्यय की तार्किक अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जो तार्किक है वह सत् है और जो सत् है वह तार्किक और बौद्धिक है।

द्वंद्ववाद

परम प्रत्यय स्वाभाविक रूप से विकास के नियमों के अनुसार विकसित होता रहता है। यह विकास द्वंद्वात्मक पद्धति से होता है। जिसमें वाद, प्रतिवाद और संवाद होता है। विकास की प्रक्रिया में एक विचार ‘वाद’ (थीसिस) बनता है, फिर उसका विरोधी विचार ‘प्रतिवाद’ (एंटी थीसिस) के रूप में आता है और दोनों के संघर्ष और समन्वय से ‘संवाद’ (सिंथेसिस) स्थापित होता है, जो दोनों से बेहतर होता है। कुछ समय के बाद संवाद स्वयं वाद का रूप ले लेता है क्योंकि देर सबेर इसका भी प्रतिवाद होता है। यह द्वंद्वात्मक गति निरंतर चलती रहती है। परंतु हीगेल के यहां द्वंद्वात्मक विकास चेतना का गुण है, न कि पदार्थ का।

समीक्षा

कार्ल मार्क्स ने हीगेल के प्रत्ययवाद की आलोचना की है। लेकिन उसने विकास के वस्तुगत नियम के रूप में द्वंद्ववाद को पल्लवित कर आगे बढ़ाया। मार्क्स ने द्वंद्ववाद को विचारों के क्षेत्र से आगे बढ़कर ऐतिहासिक विकास को समझने में तथा सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की व्याख्या करने में भी इस्तेमाल किया। मार्क्स ने द्वंद्ववाद को प्रत्ययवाद से अलग करके भौतिकवाद से संयुक्त किया। इस तरह मार्क्स की मानें तो उसने हीगेल के द्वंद्ववाद को जो सिर के बल उलटा खड़ा था, उसे सीधा पैरों के बल कर दिया। इसे बहुत से विचारक मार्क्स का बड़बोलापन भी मान सकते हैं।

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