अनुच्छेद 371 : विशेष राज्य का दर्जा

अनुच्छेद 371 : विशेष राज्य का दर्जा

भारत विवधताओं से भरा देश है और हमारा संविधान यह सुनिश्चित करता है कि इस देश की सैकड़ों संस्कृतियों, भाषाओं, बोलियों, रीति-रिवाजों और सारे धर्मों को अपनी आस्था और स्वतंत्रता के साथ जीने का पूरा-पूरा हक़ मिले।

इतनी विविधता पूरे विश्व में शायद ही कहीं दिखने को मिलेंगी। भारत के विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थितियों में काफ़ी असमानता है। जिसके चलते संविधान में उनके लिए विशेष प्रावधान किये गए हैैं। संविधान के भाग 21 में अनुच्छेद 371 से 371-J तक 12 राज्यों के लिए विशेष प्रावधान किये गए हैैं।

विशेष राज्य का दर्जा का मापदंड

कुछ इस प्रकार की स्थिति जैसे राज्यों का आर्थिक पिछड़ापन, दुरूह भौगोलिक स्थिति, सामाजिक समस्याएं, पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र, कम घनत्त्व आबादी, अधिक जनजातीय आबादी, अंतराष्ट्रीय सीमा से सटे राज्य, सामरिक क्षेत्र में स्थित होना, आर्थिक और आधारभूत संरचना में पिछड़ापन, आय की प्रकृति का निर्धारित न होना आदि मापदंड किसी राज्य के लिए जरुरी है जिससे विशेष राज्य का दर्जा दिया जा सकता है।

विशेष राज्य का दर्जा होने के फायदे:

  • केंद्रीय सहायता में बढ़ोत्तरी,
  • योजनाओं को लागु करने के लिए वित्तीय मदद,
  • राज्य को 70% कर्ज और 30% मदद के तौर पर वित्तीय मदद मिलती है पर विशेष राज्य को 10% कर्ज और 90% मदद के तौर पर वित्तीय सहायता मिलता है। विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त राज्यों को मदद में 60% बढ़ोत्तरी हो जाती है।
  • निजी पूंजी निवेश में सहयोग, उद्योग कारखाना स्थापित करने में सहयोग मिलता है, केंद्र से करों और शुल्कों में विशेष छूट मिलती है, करों से छूट से राज्य में पूंजी निवेश में वृद्धि होती है, रोजगार के अवसरों में बढ़ोत्तरी होती है।

अनुच्छेद 371 से 371-J एवं लागु होने वाले राज्य

संविधान के भाग 21 में अनुच्छेद 371 से 371-J तक विशेष प्रावधान है जो 12 राज्यों में लागु हैं।

ये राज्य हैं:

  1. महाराष्ट्र,
  2. गुजरात,
  3. नागालैंड,
  4. असम,
  5. मणिपुर,
  6. आंध्र प्रदेश,
  7. तेलंगाना,
  8. सिक्किम,
  9. मिजोरम,
  10. अरुणाचल प्रदेश,
  11. गोवा और
  12. कर्नाटक।

अनुच्छेद 371

यह विशेष उपबंध महाराष्ट्र और गुजरात के लिए है जिसके तहत राजयपाल द्वारा महाराष्ट्र में विदर्भ मराठवाड़ा और शेष महाराष्ट्र के लिए साथ ही गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ के इलाके के लिए अलग विकास बोर्ड बनाना तथा बोर्ड का काम।

इन इलाकों के विकास के लिए समान राजस्व का वितरण करना होगा साथ ही राज्य सरकार के अंतर्गत तकनिकी शिक्षा, रोजगार परक शिक्षा और मौके प्रदान करना है।

371-A

इस का प्रावधान नागालैंड राज्य के लिए है जिसमे संसद नागालैंड की विधानसभा की मंजूरी के बिना नागा धर्म से जुड़ी हुई सामाजिक परम्पराओं, पारम्परिक नियमों, कानूनों, नागा परम्पराओं द्वारा किये जाने वाले न्यायों और नागाओं की जमीन के मामले में क़ानून नहीं बना सकती।

371-B

अनुच्छेद 371-B में असम राज्य के लिए विशेष प्रावधान किया गया है जिसके तहत राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा की समितियों के और कार्यों के लिए राज्य के जनजातीय क्षेत्र से चुने गए सदस्यों को शामिल करने का अधिकार दिया गया है।

371-C

मणिपुर राज्य के लिए प्रावधान है कि राष्ट्रपति को पहाड़ी क्षेत्र से निर्वाचित विधानसभा सदस्यों की एक समिति का गठन और कार्य करने कि शक्ति प्रदान कर सकते है।

371-D

आंध्र प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान 32वे संविधान संसोधन के बाद जोड़ा गया था। पहले ये बस आंध्र के लिए था। साल 2014 के तेलंगाना बनने के दोनों राज्यों के लिए है। जिसके तहत राष्ट्रपति को राज्य के अलग अलग हिस्से के लोगों के लिए पढ़ाई और रोजगार के लिए समान अवसर प्रदान करने का अधिकार है।

371-E

ये प्रवधान भी आंध्र और तेलंगाना के लिए था जिसमे रोजगार और विश्वविद्यालय खोलने की बात कि गई थी बाद में ये प्रावधान अप्रासंगिक हो गई।

371-F

अनुच्छेद 371-F को संविधान में 36वें संविधान संशोधन 1975 में जोड़ा जो तब भारत में जुड़े नये राज्य सिक्किम के लिए प्रावधान करता है।

सिक्किम में विधानसभा बनाना, सिक्किम को संसदीय क्षेत्र बनाना।

371-G

मिजोरम के लिए विशेष प्रावधान है। संसद मिजोरम कि विधानसभा की मंजूरी के बिना मिजो समुदाय से जुड़े रीति रिवाजों, उनके शासन और न्याय के तरीकों, जमीन से जुड़े मसलों पर क़ानून नहीं बना सकेगी।

371-H

अरुणाचल प्रदेश के लिए है जिसके तहत राज्यपाल के पास मंत्री मंडल से चर्चा करने के बाद क़ानून व्यवस्था से जुड़े मसलों पर फैसला लेने का अधिकार है।

371-I

गोवा के लिए विशेष प्रबंध है जिसके तहत गोवा में कम से कम 30 सदस्यों की विधानसभा बनाने का नियम बनाया गया हालांकि समय के बाद ये आप्रासंगिक हो गए।

371-J

कर्नाटक के लिए प्रबंध है जिसके तहत हैदराबाद और कर्नाटक के सीमा इलाकों के कुछ जिलों के विकास के लिए एक अलग से विकास बोर्ड बनाना था।

शेष भारत में कुछ नियम और प्रबध समय के साथ आप्रसंगिक हो गए किन्तु उत्तर पूर्व भारत के राज्यों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन शैली के कारण ये प्रावधान आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

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